

अलोक गौड़, वरिष्ठ लेखक, संपादक।
नई दिल्ली l हाँ, जी हज़ूर…
मैं भी इस अपराध में बराबर का भागीदार हूँ। मैंने भी इस देश को नारों के हवाले किया।
मैं भी उस भीड़ में शामिल था। मैंने भी “हिंदुत्व खतरे में है”, “देश बदल रहा है”, “विश्वगुरु बनेंगे” जैसे जुमलों पर आँख मूँदकर भरोसा किया।
मैंने भी सवाल पूछने वालों को देशद्रोही समझा।
मैंने भी तर्क की जगह भावनाओं को वोट दिया।
और आज जब हमारे बच्चे राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) जैसी परीक्षाओं के नाम पर टूट-टूट कर मर रहे हैं, तब समझ आ रहा है कि गलती कहाँ हुई थी। गलती यह थी कि हमने देश चलाने के लिए एक प्रशासक नहीं, एक प्रचारक चुन लिया। हमने शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और संस्थाओं की मजबूती की जगह भाषण, इवेंट और कैमरों की चमक को विकास मान लिया। हमने सोचा था कि धर्म के नाम पर सत्ता सौंप देने से राष्ट्र महान हो जाएगा।
लेकिन हुआ यह कि विश्वविद्यालय कमजोर हो गए, संस्थाएँ बिक गईं, परीक्षाएँ दलालों के हवाले हो गईं और बच्चे फाँसी के फंदों तक पहुँच गए। दिल्ली की अंशिका पांडे मर गई।
उत्तर प्रदेश का रितिक मिश्रा मर गया। गोवा का 17 साल का बच्चा हार गया। सीकर का प्रदीप माहिच जिंदगी से हार गया। लेकिन सच यह है कि इन बच्चों ने आत्महत्या नहीं की है बल्कि देश की भृष्ट शिक्षा व्यवस्था ने इनकी हत्या की है।
हत्या उस भ्रष्ट व्यवस्था ने की है जिसने शिक्षा को नीलाम कर दिया। हत्या उस शासन ने की है जिसे बच्चों की मेहनत से ज्यादा अपनी छवि की चिंता है।
हत्या उस तंत्र ने की है जिसने पेपर लीक माफिया को इतना ताकतवर बना दिया कि अब परीक्षा देने वाला छात्र नहीं, बल्कि नकल माफिया तय करता है कि भविष्य किसका बनेगा। देश में अब हर परीक्षा एक जुए की तरह हो गई है।
पढ़ाई करो या मत करो, मेहनत करो या मत करो, कोई भरोसा नहीं कि पेपर लीक नहीं होगा। कोई भरोसा नहीं कि परीक्षा रद्द नहीं होगी। कोई भरोसा नहीं कि ईमानदार छात्र का हक बचा रहेगा।
लेकिन सत्ता के चेहरे पर शिकन नहीं है। क्योंकि यह वही शासन है जो हर त्रासदी को इवेंट मैनेजमेंट में बदल देता है। बच्चे मर रहे हैं और मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं।
माँ-बाप रो रहे हैं और अफसर नोटशीट आगे बढ़ा रहे हैं। करोड़ों युवाओं का भविष्य अंधेरे में है और टीवी चैनल अभी भी “विश्वगुरु” का भजन गा रहे हैं।
सबसे भयावह बात यह है कि इस देश में अब असफल सरकार से ज्यादा दोषी मेहनती छात्र महसूस करने लगा है।
जिस बच्चे ने दो-दो साल कमरे में बंद होकर तैयारी की, जिसने सोशल मीडिया छोड़ा, जिसने दोस्तों से दूरी बनाई, जिसके पिता ने खेत गिरवी रखेl जिसकी माँ ने अपने गहने बेचे, उसे अचानक बताया जाता है कि “परीक्षा रद्द।” उस पल सिर्फ परीक्षा ही रद्द नहीं होती l उस बच्चे का भरोसा रद्द हो जाता है।
उसका आत्मविश्वास रद्द हो जाता है। उसे लगने लगता है कि इस देश में मेहनत नहीं, संपर्क और सिस्टम जीतता है, और फिर यही व्यवस्था उसे धीरे-धीरे आत्महत्या की तरफ धकेल देती है।
लेकिन बच्चों, सुनो…
गलती तुम्हारी नहीं है।
तुम कमजोर नहीं हो।
कमजोर यह व्यवस्था है जो पेपर लीक नहीं रोक सकती।
निकम्मी यह सरकार है जो शिक्षा माफिया के सामने घुटनों पर बैठी है।
बीमार यह राजनीति है जिसने युवाओं को नौकरी नहीं, नफरत दी है।
तुम्हारी जान किसी परीक्षा से बड़ी है।
तुम्हारा जीवन किसी रैंक से ज्यादा कीमती है।
तुम्हारे मरने से किसी मंत्री का बेटा कोचिंग जाना बंद नहीं करेगा।
किसी अफसर के घर का चूल्हा नहीं बुझेगा। किसी नेता की सुरक्षा कम नहीं होगी, लेकिन तुम्हारे घर में जिंदगी भर मातम रहेगा।
तुम्हारी माँ हर सुबह तुम्हारी किताबों को देखकर रोएगी।
तुम्हारा पिता जिंदगी भर यह सोचकर टूटेगा कि काश उसने तुम पर इतना दबाव न डाला होता, और हमें भी सच स्वीकार करना होगा।
सिर्फ सत्ता दोषी नहीं है,
दोषी हम भी हैं।
हमने हर नाकामी पर ताली बजाई। हमने हर सवाल पूछने वाले को गाली दी।
हमने बेरोजगारी पर चुप्पी साध ली।
हमने शिक्षा की बर्बादी पर धर्म का शोर भारी होने दिया।
हम मंदिर-मस्जिद में उलझे रहे और उधर हमारे बच्चों का भविष्य चोरी होता रहा।
आज अगर छात्र आत्महत्या कर रहे हैं तो यह सिर्फ व्यक्तिगत अवसाद नहीं है, यह राष्ट्र की सामूहिक विफलता है।
यह उस राजनीति का परिणाम है जिसने युवाओं को डिग्री नहीं, भीड़ बनने की ट्रेनिंग दी।
जिसने विश्वविद्यालयों को शोध केंद्र नहीं, वैचारिक अखाड़ा बना दिया।
जिसने शिक्षा को अधिकार नहीं, कारोबार बना दिया।
और सबसे बड़ा अपराध यह है कि अब बच्चों को यह यकीन ही नहीं रहा कि मेहनत से भविष्य बदल सकता है।
यह देश तब तक विश्वगुरु नहीं बन सकता जब तक उसके छात्र पंखों से लटकते रहेंगे।
जब तक परीक्षाएँ माफियाओं के हवाले रहेंगी।
जब तक सत्ता जवाबदेही से भागती रहेगी, और जब तक जनता भावनाओं के नशे में सच देखने से इंकार करती रहेगी। अब भी वक्त है।
बच्चों को बचाइए।
शिक्षा को बचाइए।
संस्थाओं को बचाइए।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी।
वह लिखेंगी कि एक दौर ऐसा भी था जब इस देश के लोग नारों पर इतने पागल हो गए थे कि उन्होंने अपने ही बच्चों का भविष्य भीड़ के शोर में कुचल दिया।

