
लोकतंत्र में चुनाव जनता का विश्वास जीतने के लिए लड़े जाते हैं, लेकिन यदि चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका सरकारी खजाना खोल देना बन जाए तो यह केवल राजनीतिक नहीं, आर्थिक चिंता का विषय भी है। कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा देना है, लेकिन यदि कल्याणकारी योजनाएं चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा हथियार बन जाएं, तो उनके दूरगामी परिणामों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है। महाराष्ट्र पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट इसी असुविधाजनक प्रश्न को देश के सामने रखती है।

कैग के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में महाराष्ट्र का राजस्व घाटा 29,994 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। राजकोषीय घाटा 1.20 लाख करोड़ रुपये और कुल देनदारियां 8.6 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गईं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि मुख्यमंत्री माझी ‘लाडकी बहन योजना’ पर बढ़े भारी खर्च के कारण महिलाओं के कल्याण का बजट एक वर्ष में 261.7 करोड़ रुपये से बढ़कर 33,554.3 करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उस आर्थिक सोच का संकेत है जिसमें तत्काल राजनीतिक लाभ और दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बिगड़ने का खतरा दिखाई देता है।
यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि गरीब महिलाओं, किसानों, बुजुर्गों, दिव्यांगों और अन्य जरूरतमंद वर्गों के लिए सहायता योजनाएं किसी भी संवेदनशील सरकार का दायित्व हैं। किसी भी लोकतंत्र में सामाजिक सुरक्षा को गलत नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सामाजिक सुरक्षा और चुनावी लोकलुभावन राजनीति में अंतर होता है। पहली व्यवस्था नागरिक को सम्मान के साथ खड़ा करने का प्रयास करती है, जबकि दूसरी कई बार मतदाता को तत्काल राहत देकर राजनीतिक लाभ सुनिश्चित करने का माध्यम बन जाती है।
सबसे बड़ा प्रश्न योजना का नहीं, उसकी वित्तीय क्षमता का है। क्या सरकारों ने यह आकलन किया कि इतनी बड़ी योजनाओं का खर्च अगले पांच या दस वर्षों तक कैसे उठाया जाएगा? क्या अतिरिक्त राजस्व का कोई स्थायी स्रोत तैयार किया गया? क्या यह पैसा विकास परियोजनाओं से हटाकर खर्च किया जाएगा या फिर कर्ज लेकर इसकी भरपाई होगी? यदि इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं है, तो चिंता केवल अर्थशास्त्रियों की नहीं, आम नागरिक की भी होनी चाहिए।
कैग की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि सामाजिक क्षेत्र पर खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जबकि पूंजीगत व्यय का हिस्सा अपेक्षाकृत सीमित रहा। अर्थशास्त्र की सामान्य भाषा में इसका अर्थ यह है कि सरकार ने तत्काल खर्च पर अधिक ध्यान दिया, जबकि भविष्य की उत्पादन क्षमता बढ़ाने वाले निवेश पर अपेक्षाकृत कम। सड़कें, पुल, सिंचाई परियोजनाएं, औद्योगिक गलियारे, अस्पताल, सरकारी स्कूल, तकनीकी संस्थान और सार्वजनिक परिवहन है l यह सभी पूंजीगत निवेश के उदाहरण हैं। इन पर खर्च कम होने का असर तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन कुछ वर्षों बाद विकास की गति अवश्य प्रभावित होती है।
आज देश के लगभग सभी राज्यों में चुनावी राजनीति का स्वरूप बदल चुका है। घोषणापत्रों में रोजगार, औद्योगिक नीति, कृषि सुधार और प्रशासनिक सुधारों की चर्चा पहले होती थी। अब उनकी जगह मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, नकद सहायता, मुफ्त यात्रा, मुफ्त सिलेंडर और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी घोषणाओं ने ले ली है। जनता को राहत मिलनी चाहिए, इसमें कोई विवाद नहीं। विवाद तब शुरू होता है जब राहत की जगह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ले लेती है।
यह भी विडंबना है कि सत्ता पक्ष विपक्ष को ‘रेवड़ी संस्कृति’ का दोषी बताता है और सत्ता बदलते ही स्वयं उसी रास्ते पर चल पड़ता है। कांग्रेस हो, भाजपा हो या क्षेत्रीय दलl लगभग सभी चुनावी प्रतिस्पर्धा में इसी फार्मूले का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी दल की नहीं, बल्कि राजनीति की बदलती प्रवृत्ति की है। लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, लेकिन यदि वह आर्थिक अनुशासन को कमजोर करने लगे तो उसकी समीक्षा भी आवश्यक हो जाती है। लोकतंत्र में हर चुनाव के साथ एक नया घोषणापत्र आता है। उसमें जनता से वादे किए जाते हैं। यह स्वस्थ परंपरा है। लेकिन क्या कभी किसी राजनीतिक दल ने यह भी बताया कि जिन योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होंगे, उनका पैसा आएगा कहां से? क्या कर बढ़ाए जाएंगे? क्या कर्ज लिया जाएगा? क्या दूसरे विकास कार्यों में कटौती होगी? या फिर आने वाली सरकारों और आने वाली पीढ़ियों पर यह बोझ छोड़ दिया जाएगा? यही वह सवाल है, जिससे देश की राजनीति लगातार बचती रही है।
विडंबना यह है कि चुनाव आयोग उम्मीदवारों के चुनावी खर्च पर तो कड़ी निगरानी रखता है, लेकिन राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में किए गए हजारों करोड़ रुपये के वित्तीय वादों की व्यवहार्यता पर कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं है। परिणाम यह है कि चुनावी प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे आर्थिक प्रतिस्पर्धा में बदलती जा रही है। एक दल यदि एक हजार रुपये देने का वादा करता है, तो दूसरा डेढ़ हजार का। तीसरा उससे भी अधिक। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि यह पैसा आखिर आएगा कहां से।
महाराष्ट्र की कैग रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने इसी आर्थिक असंतुलन की ओर संकेत किया है। यदि राजस्व व्यय लगातार बढ़ेगा और पूंजीगत निवेश घटेगा, तो विकास की गति पर असर पड़ना तय है। कर्ज लेकर कुछ समय तक योजनाएं चलाई जा सकती हैं, लेकिन कर्ज लेकर स्थायी समृद्धि नहीं बनाई जा सकती। आज लिया गया ऋण कल ब्याज सहित लौटाना ही पड़ता है। सरकारें बदलती हैं, लेकिन कर्ज नहीं बदलता। भारत जैसे विकासशील देश में पूंजीगत निवेश की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। स्कूल, कॉलेज,अस्पताल, सिंचाई परियोजनाएं, सार्वजनिक परिवहन, वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक ढांचा किसी भी राज्य की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता तय करते हैं। यदि इन क्षेत्रों की कीमत पर राजस्व व्यय बढ़ता है, तो उसका असर आने वाले वर्षों में रोजगार, उत्पादन और आय तीनों पर दिखाई देता है। तब सरकारें अधिक खर्च करती हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ती। यह भी याद रखना होगा कि हर नकद सहायता योजना गलत नहीं होती। महामारी, प्राकृतिक आपदा, अत्यधिक गरीबी या विशेष सामाजिक परिस्थितियों में प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्रभावी साधन सिद्ध हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है, जब असाधारण परिस्थिति के लिए बनाई गई व्यवस्था स्थायी चुनावी रणनीति बन जाए। लोकतंत्र का उद्देश्य नागरिकों को आजीवन सरकारी सहायता पर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का होना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और रोजगार पर निवेश इसलिए अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वह व्यक्ति को स्थायी रूप से सक्षम बनाते हैं।
अब समय आ गया है कि चुनावी घोषणापत्रों के लिए भी कुछ न्यूनतम वित्तीय मानक तय किए जाएं। जिस प्रकार सरकारें बजट प्रस्तुत करते समय आय और व्यय का पूरा विवरण देती हैं, उसी प्रकार बड़े चुनावी वादों के साथ भी उनके वित्तीय स्रोत और संभावित प्रभाव सार्वजनिक किए जाने चाहिए। इससे मतदाता अधिक जागरूक निर्णय ले सकेगा और राजनीतिक दल भी केवल लोकप्रियता के लिए अव्यावहारिक घोषणाएं करने से बचेंगे। लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल चंदे तक सीमित नहीं रह सकती; उसे चुनावी वादों तक भी पहुंचना होगा।
महाराष्ट्र की कैग रिपोर्ट किसी सरकार के खिलाफ अभियोग-पत्र नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए चेतावनी है। आज महाराष्ट्र है, कल कोई दूसरा राज्य हो सकता है। यदि समय रहते वित्तीय अनुशासन और चुनावी जवाबदेही पर गंभीर बहस नहीं हुई, तो राज्यों का बढ़ता कर्ज विकास की सबसे बड़ी बाधा बन सकता है।
भारत को कल्याणकारी राज्य चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं जो भविष्य गिरवी रखकर वर्तमान की लोकप्रियता खरीदे। राजनीति का दायित्व केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आर्थिक रूप से सक्षम राष्ट्र छोड़ना भी है। मतदाता को राहत देना सरकार का कर्तव्य है, लेकिन राहत और राजनीतिक लाभ के बीच की रेखा मिट गई तो सबसे बड़ा नुकसान जनता का ही होगा।
लोकतंत्र में चुनाव पांच साल के लिए जीते जाते हैं, लेकिन आर्थिक फैसलों का असर कई दशकों तक रहता है। इसलिए चुनावी वादों का मूल्य केवल तालियों से नहीं, उनकी आर्थिक कीमत से भी तय होना चाहिए। वरना एक दिन ऐसा आएगा जब चुनाव जीतने वाले बदलते रहेंगे, लेकिन खाली होता खजाना हर सरकार की सबसे बड़ी विरासत बन जाएगा।

