

– 25 जून भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की एक तारीख भर नहीं है। यह एक चेतावनी है। एक आईना है। एक ऐसा दिन, जो हर साल लौटकर पूछता है कि क्या हमने इतिहास से कुछ सीखा या केवल उसे राजनीतिक हथियार बना लिया।
1975 में जब आपातकाल लगाया गया था तो किसी को भ्रम नहीं था कि क्या हो रहा है। सत्ता ने खुद घोषणा की थी। अखबारों पर सेंसर था, विपक्षी नेता जेलों में थे, अदालतों की सीमाएं तय की जा रही थीं और नागरिक अधिकार सरकार की इच्छा के अधीन थे। लोकतंत्र पर हमला प्रत्यक्ष था, इसलिए उसका विरोध भी प्रत्यक्ष था।

लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह कभी अपने पुराने रूप में वापस नहीं आता। वह नए कपड़े पहनकर लौटता है। इसलिए यह मान लेना कि लोकतंत्र पर खतरा तभी होगा जब फिर से कोई राष्ट्रपति आधी रात को हस्ताक्षर करेगा, शायद इतिहास को बहुत सतही ढंग से समझना होगा। आज देश में आपातकाल नहीं है। चुनाव हो रहे हैं। सरकारें बदल रही हैं। अदालतें काम कर रही हैं। अखबार छप रहे हैं। टीवी चैनल चल रहे हैं। सोशल मीडिया पर लाखों लोग अपनी बात कह रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों को लेकर चिंता क्यों व्यक्त की जा रही है?
यह सवाल महत्वपूर्ण है।
क्योंकि लोकतंत्र केवल संस्थाओं के अस्तित्व का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस वातावरण का नाम है जिसमें संस्थाएं काम करती हैं। संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं है; वह एक संस्कृति भी है। यदि संस्कृति कमजोर पड़ जाए तो दस्तावेज बचा रह सकता है, लेकिन उसकी आत्मा घायल हो जाती है। यहीं से “घोषणा नहीं, माहौल का सवाल है” वाली बहस शुरू होती है।
किसी भी लोकतंत्र में सत्ता और नागरिक के बीच एक स्वाभाविक तनाव होता है। सत्ता नियंत्रण चाहती है, नागरिक स्वतंत्रता चाहता है। सत्ता प्रशंसा पसंद करती है, लोकतंत्र आलोचना की मांग करता है। सत्ता स्थिरता चाहती है, लोकतंत्र सवाल पूछता है। यही तनाव लोकतंत्र को जीवित रखता है। समस्या तब शुरू होती है जब सत्ता आलोचना को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, राजनीतिक दुश्मनी मानने लगती है। जब पत्रकार के सवाल को षड्यंत्र कहा जाने लगे। जब छात्र की असहमति को राष्ट्रविरोध से जोड़ दिया जाए। जब विपक्ष की आलोचना को लोकतांत्रिक दायित्व नहीं, विकास विरोधी राजनीति बताया जाने लगे।
जब नागरिक अपनी राय व्यक्त करने से पहले यह सोचने लगे कि उसके सामाजिक, आर्थिक या कानूनी परिणाम क्या होंगे।
तब सवाल कानून का नहीं, माहौल का होता है।
1975 में डर दिखाई देता था। आज अगर डर है तो वह अक्सर दिखाई नहीं देता, महसूस होता है। यही सबसे बड़ा अंतर है।
लोकतंत्र की हत्या हमेशा जेलों से शुरू नहीं होती। कई बार वह दिमागों में शुरू होती है। पहले लोग बोलना बंद करते हैं, फिर सवाल पूछना बंद करते हैं, फिर उन्हें चुप रहना सामान्य लगने लगता है। और जब चुप्पी सामान्य हो जाए तो लोकतंत्र की बीमारी गंभीर हो चुकी होती है। विडंबना यह भी है कि आज हर राजनीतिक दल आपातकाल का विरोध करता है। लेकिन क्या सभी दल आलोचना का सम्मान करते हैं? क्या सभी सरकारें अपने विरोधियों के अधिकारों की रक्षा करती हैं? क्या सभी राजनीतिक दल सत्ता में रहते हुए वही लोकतांत्रिक आदर्श अपनाते हैं जिनकी मांग वे विपक्ष में रहते हुए करते हैं? सच यह है कि आपातकाल केवल एक घटना नहीं थी । वह सत्ता के अहंकार की पराकाष्ठा थी । और सत्ता का अहंकार किसी एक दल, एक विचारधारा या एक परिवार की निजी संपत्ति नहीं होता। अवसर मिलने पर वह कहीं भी जन्म ले सकता है। इसलिए 25 जून का महत्व कांग्रेस की आलोचना में नहीं, सत्ता की प्रवृत्ति को समझने में है। आज तकनीक ने राज्य को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया है। सरकारें नागरिकों के बारे में पहले से अधिक जानती हैं। सूचना का प्रवाह पहले से अधिक नियंत्रित किया जा सकता है। नैरेटिव पहले से अधिक संगठित तरीके से बनाए जा सकते हैं। ऐसे समय में लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान नहीं करेगा। उसे नागरिक चेतना, स्वतंत्र मीडिया, मजबूत न्यायपालिका और निर्भीक विपक्ष की जरूरत होगी।
यही कारण है कि आपातकाल की बरसी पर असली सवाल यह नहीं है कि 1975 में क्या हुआ था।
असली सवाल यह है कि 2026 में हम लोकतंत्र को किस रूप में देखना चाहते हैं।
क्या ऐसा लोकतंत्र जिसमें नागरिक केवल वोटर हो?
या ऐसा लोकतंत्र जिसमें नागरिक प्रश्नकर्ता भी हो?
क्या ऐसा लोकतंत्र जिसमें सरकारें केवल लोकप्रिय हों?
या ऐसा लोकतंत्र जिसमें सरकारें जवाबदेह भी हों?
क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, आलोचना सुनने में होती है।
और शायद इसी वजह से 25 जून की चर्चा आज भी प्रासंगिक है। क्योंकि बहस किसी सरकारी घोषणा की नहीं है। बहस उस माहौल की है जिसमें लोकतंत्र सांस लेता है।
1975 में आपातकाल घोषित था, इसलिए देश उसे पहचान सका। आज अगर लोग उसकी आहट महसूस करने की बात कर रहे हैं, तो उस पर बहस को देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र का स्वास्थ्य परीक्षण समझा जाना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र तब नहीं मरता जब उसके दुश्मन ताकतवर हो जाते हैं।
लोकतंत्र तब मरता है जब उसके नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं।

