

– lदेश में राजनीति केवल नीतियों से नहीं चलती, प्रतीकों से भी चलती है। कभी स्वच्छता अभियान, कभी सेल्फी विद डॉटर, कभी हर घर तिरंगा और अब “एक पेड़ मां के नाम”। यह एक ऐसा भावनात्मक अभियान है जिससे असहमत होना मुश्किल है। मां के प्रति सम्मान और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलताl दोनों को एक साथ जोड़ने वाला यह विचार सुनने में जितना सुंदर लगता है, उतने ही असहज सवाल तब खड़े होते हैं जब इसके समानांतर सरकारी फैसलों पर नजर डाली जाती है।

हाल ही में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने वन भूमि के दूसरे उपयोग के लिए आए 288 प्रस्तावों में से 242 को मंजूरी दी। इन मंजूरियों के परिणामस्वरूप 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई का रास्ता साफ हुआ। इनमें सबसे अधिक पेड़ खनन परियोजनाओं के लिए काटे गए, जबकि पनबिजली परियोजनाएं दूसरे स्थान पर रहीं। यानी एक तरफ देश को पेड़ लगाने का संदेश दिया जा रहा है और दूसरी तरफ लाखों पेड़ों को काटने की स्वीकृति भी दी जा रही है। सवाल यह नहीं है कि पेड़ लगाने का अभियान गलत है। सवाल यह है कि क्या सरकार जनता को पूरी तस्वीर दिखा रही है? दरअसल, आज पर्यावरण संरक्षण भी राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बन चुका है। कैमरे के सामने पौधा लगाते हुए तस्वीर खिंचवाना आसान है। सोशल मीडिया पर हरियाली के संदेश देना आसान है। लेकिन जंगलों को बचाने के लिए आर्थिक और राजनीतिक दबावों का सामना करना कठिन है। यही वह जगह है जहां सरकारों की असली परीक्षा होती है।
प्राकृतिक जंगल और वृक्षारोपण में जमीन-आसमान का अंतर होता है। एक प्राकृतिक जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता। वह पक्षियों, जानवरों, कीटों, जल स्रोतों, मिट्टी और स्थानीय समुदायों का जीवित संसार होता है। उसे विकसित होने में दशकों नहीं, कई बार सदियां लग जाती हैं। इसके विपरीत किसी खाली जमीन पर पौधे लगा देना पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत तो हो सकती है, लेकिन जंगल का विकल्प नहीं।
विडंबना यह है कि जिन परियोजनाओं के लिए जंगलों को साफ किया जा रहा है, उनका सबसे बड़ा हिस्सा खनन क्षेत्र से जुड़ा है। देश को कोयला चाहिए, खनिज चाहिए, बिजली चाहिए—इसमें दो राय नहीं हो सकती। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि विकास और विनाश को एक-दूसरे का पर्याय नहीं बनाया जा सकता। यदि विकास का हर मॉडल जंगलों की कीमत पर ही खड़ा होगा तो उसका पर्यावरणीय और सामाजिक मूल्य भी चुकाना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। वहां लाखों पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई। जिन क्षेत्रों में जंगल काटे जा रहे हैं, वहां केवल पेड़ नहीं हैं। वहां आदिवासियों की संस्कृति है, जल स्रोत हैं, जैव विविधता है और पीढ़ियों से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में जीने का अनुभव है। लेकिन फाइलों में यह सब अक्सर “वन भूमि” नाम के एक कॉलम में सिमट जाता हैl और सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई परियोजनाओं के दस्तावेजों में पेड़ों की वास्तविक संख्या तक स्पष्ट नहीं थी। कुछ मामलों में पर्यावरणीय प्रभाव को “न्यूनतम” बताया गया, जबकि उसी रिपोर्ट में वन्यजीवों के विस्थापन, मिट्टी के कटाव और जल स्रोतों पर असर की आशंका भी दर्ज थी। यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जिसमें पर्यावरणीय चिंताओं को अक्सर औपचारिकता समझ लिया जाता है।
सरकार दावा करती है कि उसने करोड़ों पौधे लगाए हैं। हो सकता है यह दावा सही हो। लेकिन जनता को यह भी जानने का अधिकार है कि इसी अवधि में कितने जंगल समाप्त हुए, कितनी वन भूमि का गैर-वानिकी उपयोग हुआ और कितने पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई। पर्यावरण का मूल्यांकन केवल लगाए गए पौधों से नहीं, बचाए गए जंगलों से भी होना चाहिए। आज पूरी दुनिया जलवायु संकट से जूझ रही है। तापमान बढ़ रहा है, बारिश का चक्र बदल रहा है, शहर गर्म होते जा रहे हैं और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे समय में जंगल केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गए हैं। वह अर्थव्यवस्था, कृषि, जल सुरक्षा और मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुके हैं।
यही कारण है कि “एक पेड़ मां के नाम” से पहले शायद यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि “एक जंगल देश के नाम” बचाने के लिए क्या किया जा रहा है? क्योंकि मां के नाम पर लगाया गया एक पौधा भावनात्मक संतोष दे सकता है, लेकिन कॉरपोरेट परियोजनाओं, खनन कंपनियों और तथाकथित विकास योजनाओं के नाम पर कटते हुए जंगल आने वाली पीढ़ियों से उनका प्राकृतिक अधिकार छीन सकते हैं। मुद्दा पेड़ लगाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या सरकार जंगल बचाने को भी उतनी ही गंभीरता से ले रही है जितनी गंभीरता से उसके विज्ञापन और अभियान चलाए जा रहे हैं? यदि जवाब हां है तो आंकड़े कुछ और कहानी क्यों कहते हैं? और यदि जवाब नहीं है, तो फिर यह मान लेना चाहिए कि “एक पेड़ मां के नाम” केवल एक भावनात्मक नारा है, जबकि 28 लाख पेड़ों की कटाई हमारी वास्तविक पर्यावरण नीति का आईना।

