मुद्दे की बात:आवाज दबाकर लोकतंत्र नहीं बचाया जा सकता:-लेखक वरिष्ठ संपादक :- :आलोक गौड़

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नई दिल्ली। लोकतंत्र में सरकारें जनता को बचाने के लिए होती हैं या जनता को चुप कराने के लिए? सवाल सीधा है, लेकिन जवाब उतना ही असुविधाजनक। सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से आधी रात के बाद जबरन उठाकर अस्पताल ले जाने की घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने खड़ा कर दिया है कि आखिर किसी नागरिक के विरोध का अधिकार कहां खत्म होता है और राज्य की जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है?
सोनम वांगचुक पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर थे। वह कोई हिंसक आंदोलन नहीं कर रहे थे। उन्होंने किसी सरकारी इमारत पर कब्जा नहीं किया था। किसी सड़क को आग के हवाले नहीं किया था। किसी को धमकी नहीं दी थी। वह अपने शरीर को ही विरोध का माध्यम बनाकर सरकार से सवाल पूछ रहे थे। सरकार के पास उनके सवालों का जवाब था तो वह जवाब दे सकती थी। जवाब नहीं था तो बातचीत कर सकती थी। लेकिन सरकार ने तीसरा रास्ता चुना। उन्हें वहां से हटा दिया।


क्यों? क्योंकि भूख हड़ताल सरकार के लिए इसलिए असुविधाजनक होती है कि इसमें न लाठी चलाने का बहाना मिलता है, न आंसू गैस छोड़ने का। सामने बैठा व्यक्ति अपने शरीर को ही सवाल बना देता है और सरकार के पास उसका जवाब देने के अलावा बहुत कम रास्ते बचते हैं। लेकिन जब सरकार जवाब देने के बजाय अनशनकारी को ही उठा ले जाती है तो सवाल और बड़ा हो जाता है। क्या किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल ले जाना उसके जीवन की रक्षा है या उसके विरोध के अधिकार में हस्तक्षेप?
सरकार कह सकती है कि अनशन से स्वास्थ्य बिगड़ रहा था। डॉक्टर कह सकते हैं कि शरीर में पोटैशियम का स्तर कम हो गया था। परिवार चिंता जता सकता है। चिकित्सा विज्ञान अपनी सलाह दे सकता है। इन सभी चिंताओं का सम्मान होना चाहिए। किसी व्यक्ति को मरने के लिए छोड़ देना किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आदर्श नहीं हो सकता। लेकिन क्या जीवन बचाने के नाम पर व्यक्ति की इच्छा को पूरी तरह समाप्त कर देना भी लोकतंत्र का आदर्श है?
यही वह महीन रेखा है जिसे सरकारें अक्सर सुविधा के लिए मिटा देती हैं। किसी नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपने शरीर और अपने जीवन के बारे में निर्णय ले। दूसरी तरफ राज्य का यह दायित्व भी है कि वह किसी नागरिक को जानबूझकर मौत के मुंह में जाने से बचाए। लेकिन इन दोनों के बीच लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है—सहमति।
यदि कोई व्यक्ति बेहोश है, निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है या उसकी मानसिक क्षमता पर गंभीर प्रश्न है तो राज्य और चिकित्सकों की भूमिका अलग हो सकती है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति पूरी समझ और चेतना के साथ राजनीतिक विरोध के रूप में भूख हड़ताल करता है तो उसे बिना बातचीत, बिना सहमति और बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के उठा ले जाना कई सवाल खड़े करता है।
यहां एक और सवाल है। अगर सरकार को सचमुच सोनम वांगचुक की सेहत की चिंता थी तो क्या उनके परिवार और उनके स्वास्थ्य पर नजर रखने वाले डॉक्टरों को साथ लेकर कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता था? क्या उनसे बातचीत नहीं की जा सकती थी? क्या उन्हें यह भरोसा नहीं दिया जा सकता था कि उनका आंदोलन समाप्त नहीं किया जा रहा, बल्कि उनकी जान बचाने के लिए चिकित्सा सहायता दी जा रही है?
लेकिन जब उनकी पत्नी यह कहती हैं कि उनकी सहमति के बगैर मुंह या नसों के माध्यम से कोई दवा या तरल पदार्थ न दिया जाए तो मामला केवल चिकित्सा का नहीं रह जाता। यह भरोसे का मामला बन जाता है। और सरकार तथा नागरिक के बीच भरोसा पहले ही बहुत कमजोर है।
आज सरकारें हर असहमति को कानून-व्यवस्था का सवाल मानने लगी हैं। कोई सवाल पूछे तो वह विरोधी है। कोई प्रदर्शन करे तो वह साजिश है। कोई धरने पर बैठे तो वह यातायात के लिए खतरा है। कोई भूख हड़ताल करे तो वह अपने जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहा है।
लेकिन लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होता। वह सवाल पूछने वाला भी होता है। वह विरोध करने वाला भी होता है। वह सरकार की नीतियों से असहमति जताने वाला भी होता है। यदि सरकार हर असहमति को प्रशासनिक आदेश से समाप्त करने लगेगी तो फिर लोकतंत्र और प्रशासनिक नियंत्रण में अंतर क्या रह जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि विरोध करने वाले की पहचान बदलते ही सरकार का रवैया क्यों बदल जाता है? जब सत्ता के समर्थक उपवास करते हैं तो उसे त्याग कहा जाता है। जब राजनीतिक दलों के नेता उपवास करते हैं तो उसे सत्याग्रह कहा जाता है। जब सरकार के पक्ष में कोई व्यक्ति घंटों, दिनों या हफ्तों तक धार्मिक या राजनीतिक अनुष्ठान करता है तो उसे आस्था और समर्पण का प्रतीक बताया जाता है। लेकिन जब कोई नागरिक सरकार से सवाल पूछते हुए भूख हड़ताल करता है तो अचानक उसकी चिंता सरकार को सताने लगती है।
यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
सरकार का काम यह तय करना नहीं हो सकता कि कौन-सा उपवास पवित्र है और कौन-सा उपवास कानून-व्यवस्था के लिए खतरा। सरकार का काम यह भी नहीं हो सकता कि वह तय करे कि किस नागरिक को विरोध करने का अधिकार है और किसे नहीं।
हां, यदि कोई व्यक्ति अपनी जान गंवाने की वास्तविक स्थिति में पहुंच रहा है तो सरकार और चिकित्सकों को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। लेकिन यह हस्तक्षेप भी पारदर्शी, अनुपातिक और मानवीय होना चाहिए। किसी आंदोलनकारी को रात के अंधेरे में उठाकर अस्पताल पहुंचा देना और फिर जनता को केवल इतना बता देना कि उसकी सेहत की चिंता थी l यह लोकतंत्र में पर्याप्त जवाब नहीं हो सकता।
क्योंकि सवाल सिर्फ सोनम वांगचुक का नहीं है।
आज एक व्यक्ति को अनशन से उठाया गया है। कल किसी और को धरने से उठाया जाएगा। परसों किसी को प्रदर्शन से, फिर किसी को भाषण से। और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब सरकार यह तय करने लगे कि नागरिक को कौन-सा सवाल पूछने की अनुमति है और कौन-सा नहीं।
लोकतंत्र में सरकारें बहुमत से बनती हैं, लेकिन लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस अल्पमत की आवाज का भी नाम है जो सत्ता को असुविधाजनक लगती है।
सोनम वांगचुक के सवाल सही हैं या गलत, इसका फैसला सरकार कर सकती है, जनता कर सकती है, अदालत कर सकती है। लेकिन सवाल पूछने के अधिकार का फैसला सरकार अकेले नहीं कर सकती।
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि सरकार को लगता है कि सोनम वांगचुक का आंदोलन गलत है तो उसे उन्हें हटाने की नहीं, उन्हें जवाब देने की जरूरत है।
अनशनकारी को अस्पताल पहुंचाकर सरकार शायद एक व्यक्ति की सेहत बचा ले, लेकिन अगर उसके सवालों का जवाब नहीं दिया गया तो वह सवाल अस्पताल से बाहर आ जाएगा। तब वह केवल सोनम वांगचुक का सवाल नहीं रहेगा।
तब सवाल यह होगा कि लोकतंत्र में सरकार नागरिक की जान बचाने के नाम पर उसकी आवाज भी बचाएगी या उसकी आवाज ही छीन लेगी?
क्योंकि भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को अस्पताल ले जाना आसान है। मुश्किल यह है कि जिस सवाल ने उसे भूख हड़ताल पर बैठाया है, उसका जवाब दिया जाए।

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