ज्ञान परम्परा तत्वाधान में रामचरित्रमानस:प्रसांगिकता, वर्तमान संदर्भ और भविष्य की दिशाएं :एसपीएम (W) DU संगोष्टी का आयोजन।

नई दिल्ली : श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, हिंदुस्तानी भाषा अकादमी और आकाशवाणी के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 23-24 मार्च की भारतीय ज्ञान परम्परा और रामचरितमानस : प्रासंगिकता, वर्तमान सन्दर्भ और भविष्य की दिशाएँ विषय पर द्वि दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

इस संगोष्ठी में देश भर से रामचरितमानस मानस के विशेषज्ञों ने भाग लिया। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व महामहिम राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जी, मुख्य वक्ता प्रोफेसर सुरेन्द्र दुबे, विशिष्ट वक्ता प्रोफेसर नरेंद्र मिश्र जी थे। अध्यक्ष हंसराज महाविद्यालय की प्रोफेसर रमा शर्मा ने की। पूर्व महामहिम राज्यपाल माननीय भगत सिंह कोश्यारी ने रामचरितमानस की पठनीयता पर बल दिया। उनका कहना था कि मानस में शास्त्र और लोक का सुंदर समन्वय है। यह भारत की संस्कृति और संस्कार का आधार है। प्रोफेसर रमा शर्मा ने जीवन में राम के चरित्र को उतारे जाने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं प्रोफेसर नरेंद्र मिश्र ने भारतीय ज्ञान परम्परा का निचोड़ रामचरितमानस को सिद्ध किया।
मानस के वैश्विक प्रभाव और उसके विशिष्ट महत्व को इस सत्र में रेखांकित किया गया।

संगोष्ठी के चार तकनीकी सत्रों में क्रमशः रामचरितमानस के भाषा वैशिष्ट्य और महाकाव्यत्व, रामचरितमानस और मर्यादा और समरसता के सोपान, तुलसी लोक प्रज्ञा और मानस और वैश्विक पटल पर रामचरितमानस: अनुवाद संस्कृति और भविष्य पर चर्चा की गई। जिनमें प्रोफेसर पूरनचंद टंडन, हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुधा सिंह, मोहम्मद फै़ज़ खान, प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र, प्रोफेसर चंदन कुमार, प्रोफेसर रामनाथ झा, प्रोफेसर राजकुमार शर्मा, प्रोफेसर सत्यकेतु सांकृत, प्रोफेसर प्रवीण कुमार, प्रोफेसर अवधेश कुमार, प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल, विषय विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित थे, जिन्होंने रामचरितमानस को आज की आवश्यकता सिद्ध किया। हिन्दी और रूसी भाषा विशेषज्ञ प्रोफेसर हेमचंद्र पांडे ने रामचरितमानस के रूसी अनुवाद पर चर्चा की। कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने प्रपत्र वाचन भी किया।

इस कार्यक्रम में संयोजक थी डॉ विभा नायक एवं सह-संयोजक थे डॉ विद्यासागर मौर्य।

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