
भारत में कैंसर का जल्दी पता लगना हमेशा जल्दी इलाज क्यों नहीं बन पाता
भारत में हाल के वर्षों में कैंसर की जांच और जागरूकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आधुनिक डायग्नोस्टिक तकनीकों और स्वास्थ्य अभियानों के चलते अब अधिक लोग शुरुआती चरण में कैंसर का पता लगा पा रहे हैं। हालांकि, जल्दी निदान हमेशा समय पर इलाज में परिवर्तित नहीं होता, जो एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।
कैंसर का प्रारंभिक चरण में पता लगना बेहतर उपचार परिणामों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत में कई बाधाएं इस प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं। जांच सुविधाएं छोटे शहरों तक पहुंच गई हैं, फिर भी उन्नत उपचार केंद्र मुख्यतः बड़े शहरों में केंद्रित हैं। इससे मरीजों को इलाज के लिए यात्रा करनी पड़ती है, जिससे देरी होती है।
आर्थिक कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कैंसर के इलाज में सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन जैसे कई चरण शामिल होते हैं, जिनकी लागत अधिक होती है। बीमा के बावजूद कई परिवारों को उपचार शुरू करने से पहले वित्तीय व्यवस्था करनी पड़ती है।
उहापो (UHAPO) की रिपोर्ट के अनुसार, 69% मरीजों को एक सप्ताह के भीतर निदान मिल जाता है, लेकिन 85% मरीज सही अस्पताल या डॉक्टर चुनने में संघर्ष करते हैं। यह दर्शाता है कि निदान के बाद मार्गदर्शन की कमी एक बड़ी समस्या है।
विवेक शर्मा – सोशल एंटरप्रेन्योर और फाउंडर, उहापो हेल्थ सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, के अनुसार, मरीजों को समय पर सही दिशा और समन्वित देखभाल उपलब्ध कराना आवश्यक है ताकि निदान और उपचार के बीच की दूरी कम हो सके।
इसके अलावा, अस्पतालों में भीड़, विशेषज्ञों की कमी और सामाजिक कलंक जैसे कारक भी उपचार में देरी करते हैं।
इस अंतर को कम करने के लिए एकीकृत स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर मार्गदर्शन और सुलभ इलाज जरूरी हैं। तभी प्रारंभिक निदान वास्तव में मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकेगा।

