आजाद के जन्म दिवस पर चर्चा “आजाद और आजादी” आज और कल : खोसला।

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नई दिल्ली :- भीम ब्रिगेड ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव जोली खोसला ने आजादी से दीवाने चंद्रशेखर आजाद के 120 में जन्म दिवस के उपलक्ष में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया जिसमे समाज के प्रबुद्ध लोग, समाजसेवी, पूर्व सैन्य अधिकारी,बुध्दिजीवी वर्ग उपस्थित रहा विषय था ‘आजाद और आजादी’ आज और कल,।

मुख्य संरक्षक अंकित भीम सिंह जी की अध्यक्षता में शहजादा बाग दया बस्ती नई दिल्ली में रखा गया कार्यक्रम जिसमें प्रसिद्ध विश्व के पहले सरदार जादूगर जितेंद्र सिंह बब्बर और प्रसिद्ध संगीतकार सुरेंद्र पुष्करण जी और सोलो एक्टर हितेश शर्मा ,सरदार हरविंदर सिंह ,इरशाद कुरैशी, मोहम्मद इशाक खान, ऐ जै राजन, मंजू शर्मा ,परमजीत कौर ,चंद्र सैनी ,दक्ष गोयल आदि भी मौजूद रहे और चंद्रशेखर आजाद जी पर सोलो एक्ट भी प्रस्तुत किया और देश की आजादी जैसे गंभीर विषयों पर परिचर्चा की गयी, बेरोजगार युवाओं,नौजवानों के गुमराह होने से बचाने के लिए एक होकर आवाज उठाने की बात की गयी वही,युवाओं को शादी से घबराने के विषय में भी सवाल उठाए गए रिपोर्ट के आधार पर आज युवाओं को अपनी शादी की नहीं कॅरियर की ज्यादा चिंता रहती है, नशा विरोधी अभियान चलाने के साथ के सभी धर्म के एकजुट होकर राष्ट्र उत्थान की बात पर सभी ने सहयोग देने की अपील का समर्थन किया।

खोसला ने बताया भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक एवं लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। आजाद का जन्मस्थान भाबरा अब ‘आजादनगर’ के रूप में जाना जाता है। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था। उनके पिता ईमानदार, स्वाभिमानी, साहसी और वचन के पक्के थे। यही गुण चंद्रशेखर को अपने पिता से विरासत में मिले थे। आजाद 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया था। 1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए। जहां उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया। उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वंदे मातरम्’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का स्वर बुलंद किया। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए। जब क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ, तब आजाद उस तरफ खिंचे और ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी’ से जुड़े। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी षड्यंत्र (1925) में सक्रिय भाग लिया और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए।17 दिसंबर, 1928 को चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्यों ही जे.पी. साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकले तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी, जो साण्डर्स के माथे पर लग गई वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया।इतना ना ही नहीं लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। उनके इस कदम को समस्त भारत के क्रांतिकारियों खूब सराहा गया।
और 1931 में अंग्रेजों का मुकाबला करते हुए अंतिम गोली स्वयं को मार कर शहीद हो गए क्योंकि वह कहते थे मैं आजाद हूं आजाद, ही जिऊंगा और आजाद ही मारूंगा आज भारत के हर नौजवान को राष्ट्र उत्थान के लिए क्रांतिकारी वीरों की गाथाएं पढ़ कर उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलना चाहिए ना कि अराजकता फैलाने वाले असमाजिक लोगों की बातों में आकर गुमराह हो क्योंकि राष्ट्र विरोधी ताकते आजादी के बाद से सक्रिय हैं धर्म के, जाति के नाम पर लड़ाई करवाना नशा फैलाना इन सब से हमें सावधान रहना चाहिए कार्यक्रम में उपस्थित राष्ट्र भक्तों ने कसम खाई हम हमेशा सभी को राष्ट्र प्रथम की और बढ़ाएंगे और जय हिंदी बोलेंगे जय हिंद ही बुलवाएंगे।

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