WCOG 2026 में भारत में कम उम्र में होने वाले कोलोरेक्टल कैंसर, गॉलब्लैडर कैंसर और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल देखभाल में AI की बढ़ती भूमिका पर चर्चा

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2050 तक GI कैंसर के मामले लगभग दोगुने होने की आशंका, WCOG 2026 में बचाव और समय पर जांच पर जोर

नई दिल्ली, अक्टूबर 2026: दुनिया भर में होने वाले कैंसर के कुल मामलों में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (GI) कैंसर की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई है, जबकि कैंसर से होने वाली मौतों में इसका योगदान लगभग एक-तिहाई है। 2050 तक इसका बोझ लगभग दोगुना होने का अनुमान है। नई दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (WCOG) 2026 में इस बढ़ते बोझ को लेकर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने रोकथाम और बीमारी की जल्द पहचान के साथ-साथ एंडोस्कोपी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कम चीरे वाली आधुनिक उपचार तकनीकों में हो रही प्रगति पर भी जोर दिया।

कांग्रेस में सामने आए महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक ऊपरी GI एंडोस्कोपी की गुणवत्ता और उसकी अवधि तथा कैंसर की पहचान के बीच संबंध से जुड़ा था। कम से कम सात मिनट तक की गई एंडोस्कोपी में गैस्ट्रिक कैंसर और डिस्प्लेशिया का पता चलने की संभावना लगभग 3.4 गुना अधिक पाई गई। यह दर्शाता है कि व्यवस्थित जांच, पेट की अंदरूनी परत को पर्याप्त रूप से देखने और सही तरीके से उसका दस्तावेजीकरण करने से शुरुआती बीमारी की पहचान में मदद मिल सकती है।

डॉ. प्रमोद गर्ग, प्रोफेसर एवं प्रमुख, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं ह्यूमन न्यूट्रिशन विभाग, AIIMS, नई दिल्ली; अध्यक्ष, इंडियन सोसाइटी ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और को-चेयर, स्टीयरिंग कमेटी, WCOG 2026, ने कहा, “बीमारी की जल्द पहचान के लिए यह जरूरी है कि हम जोखिम वाले लोगों की पहचान करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करें कि जांच की प्रक्रियाएं उच्चतम मानकों के अनुसार की जाएं। उच्च गुणवत्ता वाली एंडोस्कोपी से बीमारी को उस शुरुआती चरण में पहचानने का महत्वपूर्ण अवसर मिल सकता है, जब इलाज अधिक प्रभावी हो सकता है।”

भारत में कैंसर के बदलते स्वरूप पर भी प्रमुखता से चर्चा हुई। कम उम्र में होने वाले कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों और इसके पीछे संभावित कारणों पर विशेष ध्यान दिया गया। WCOG 2026 में प्रस्तुत शोध में आनुवंशिक कारकों, पर्यावरणीय प्रभावों और आंतों के माइक्रोबायोम की संभावित भूमिका पर चर्चा हुई। इससे यह सवाल भी सामने आया कि कम उम्र के लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों के साथ रोकथाम और बीमारी की पहचान से जुड़ी रणनीतियों में किस तरह बदलाव की जरूरत है।

गॉलब्लैडर कैंसर ने भी कैंसर से जुड़ी चर्चा में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू जोड़ा। विशेषज्ञों ने पित्त की पथरी और लंबे समय तक रहने वाली सूजन से कैंसर तक बीमारी के बढ़ने की प्रक्रिया पर चर्चा की। इसमें बड़ी या अधिक जोखिम वाली पित्त की पथरी, लंबे समय तक रहने वाले संक्रमण और पर्यावरणीय कारणों की संभावित भूमिका भी शामिल रही। गॉलब्लैडर की दीवार में संदिग्ध बदलावों के प्रति जागरूकता, उचित इमेजिंग और समय पर विभिन्न विशेषज्ञों की संयुक्त जांच से बीमारी की पहचान में होने वाली देरी को कम करने में मदद मिल सकती है।

लिवर की बीमारी का बदलता बोझ भी चर्चा का एक प्रमुख विषय रहा। मेटाबॉलिक और शराब से जुड़ी लिवर बीमारी के जोखिम वाले लोगों की पहचान के लिए बिना चीरा लगाए की जाने वाली जांच तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है। चर्चा में भारत में लिवर कैंसर के बदलते कारणों पर भी प्रकाश डाला गया, जहां संक्रमण के साथ-साथ मेटाबॉलिक कारण भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं।

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और लिवर संबंधी बीमारियों के इलाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका भी कई चर्चाओं में सामने आई। AI का उपयोग बीमारी के जोखिम का अनुमान लगाने, निदान और उपचार संबंधी निर्णय लेने तक किया जा रहा है। अब चर्चा केवल AI की संभावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके क्लिनिकल इस्तेमाल के लिए जरूरी प्रमाणों पर भी केंद्रित हो रही है। डेटा की गुणवत्ता, अलग-अलग परिस्थितियों में तकनीक की विश्वसनीयता, निर्णय प्रक्रिया को समझाने की क्षमता, जवाबदेही और क्लिनिकल वर्क फ्लो में इसका सही एकीकरण महत्वपूर्ण विषय रहे।

डॉ. गोविंद मखारिया, प्रोफेसर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं ह्यूमन न्यूट्रिशन विभाग, AIIMS, नई दिल्ली और चेयरमैन, लोकल ऑर्गनाइजिंग कमेटी, WCOG 2026 , ने कहा, “AI गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में निदान और उपचार संबंधी निर्णयों को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, जबकि एडवांस्ड एंडोस्कोपी कम चीरे वाली तकनीकों के जरिए जटिल बीमारियों के इलाज की संभावनाओं को बढ़ा रही है। अगला कदम यह सुनिश्चित करना है कि इन तकनीकों के पीछे मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण हों और इन्हें क्लिनिकल प्रैक्टिस में जिम्मेदारी के साथ शामिल किया जाए।”

रोकथाम से जुड़ी चर्चा केवल कैंसर तक सीमित नहीं रही। H. pylori, जो दुनिया भर की अनुमानित 40% आबादी को प्रभावित करता है, गैस्ट्रिक एट्रोफी और गैस्ट्रिक कैंसर की ओर बढ़ने वाली प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक बना हुआ है। ऐसे में संक्रमण की समय पर जांच, इसका इलाज और इलाज के सफल होने की पुष्टि करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

डॉ. बैरी मार्शल, फिजियोलॉजी या मेडिसिन में नोबेल पुरस्कार विजेता और गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट, ने कहा, “H. pylori केवल अल्सर का कारण बनने वाला संक्रमण नहीं है। अगर यह संक्रमण कई वर्षों तक बना रहता है, तो यह पेट में लंबे समय तक सूजन पैदा कर सकता है और गैस्ट्रिक कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है। यह हमारे लिए एक अवसर भी है, क्योंकि यह कैंसर का एक संभावित रूप से रोका जा सकने वाला कारण है।”

मार्शल ने संक्रमित लोगों की समय रहते पहचान करने और संक्रमण को खत्म करने के बाद यह सुनिश्चित करने के महत्व पर भी जोर दिया कि इलाज सफल रहा है। एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध के कारण इसका इलाज अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। उनकी यह बात गैस्ट्रिक कैंसर की रोकथाम के लिए H. pylori की “स्क्रीन-एंड-ट्रीट” रणनीति को लेकर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चर्चा के बीच सामने आई है।

रोकथाम योग्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमणों का बोझ भी काफी बड़ा है। दुनिया भर में लगभग हर चार में से एक व्यक्ति आंतों में होने वाले कृमि संक्रमण से प्रभावित है, जिसका पोषण, विकास और मानसिक क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। ऐसे में स्वच्छता, पोषण और निवारक स्वास्थ्य सेवाएं भी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल स्वास्थ्य से जुड़ी चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती हैं।

इलाज के क्षेत्र में WCOG 2026 में POEM, एंडोस्कोपिक सबम्यूकोसल डिसेक्शन, थर्ड-स्पेस एंडोस्कोपी, एंडोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रोप्लास्टी, थेरेप्यूटिक EUS, एडवांस्ड ERCP और कोलैंजियोस्कोपी जैसी तकनीकों में हुई प्रगति को भी प्रदर्शित किया गया। इन तकनीकों से जटिल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों के कम चीरे वाली तकनीकों से इलाज की संभावनाएं बढ़ी हैं। हालांकि, एडवांस्ड एंडोस्कोपी, लिवर ट्रांसप्लांट और नई तकनीकों तक पहुंच अभी भी समान नहीं है। बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता और इलाज की लागत यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि इन आधुनिक उपचारों का लाभ किन मरीजों तक पहुंच पाता है।

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल स्वास्थ्य के भविष्य पर चर्चा में डॉक्टरों की भलाई भी एक महत्वपूर्ण विषय रही। तनाव और बर्नआउट के साथ-साथ बीमारी के बढ़ते बोझ, तकनीक की बढ़ती जटिलता और क्लिनिकल प्रैक्टिस की चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। मरीजों के लिए चिकित्सा क्षेत्र में हो रही प्रगति का वास्तविक लाभ तभी संभव है जब उन्हें प्रशिक्षित विशेषज्ञों, गुणवत्तापूर्ण जांच और प्रभावी उपचार तक उचित पहुंच मिले।

30 सितंबर से 3 अक्टूबर तक आयोजित चार दिवसीय WCOG 2026 का विषय “Transforming Gastrointestinal Health, Preserving Nature” था। कांग्रेस को 1,156 एब्स्ट्रैक्ट प्राप्त हुए और पहली बार भारत में वैश्विक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी समुदाय एक साथ आया। यहां प्रस्तुत शोध और क्लिनिकल चर्चाओं की व्यापकता ने यह दर्शाया कि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बीमारी की रोकथाम, जल्द पहचान, तकनीक और समान स्वास्थ्य पहुंच अब मरीजों के बेहतर परिणामों को तय करने वाले आपस में जुड़े महत्वपूर्ण पहलू बन चुके हैं।

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