

– किसी सरकार की सबसे बड़ी हार चुनाव हारना नहीं होती। सरकार तब हारती है, जब एक गरीब बाप अपने बच्चे का हाथ पकड़कर सरकारी स्कूल के फाटक से लौट जाता है। उस दिन वह सिर्फ स्कूल ही नहीं बदलता, बल्कि वह व्यवस्था पर अपना भरोसा भी बदल देता है।
यह फैसला एक दिन में नहीं होता। यह वर्षों की उपेक्षा, अधूरे वादों और टूटते विश्वास का परिणाम होता है। एक गरीब आदमी निजी स्कूल की फीस नहीं खरीदता, वह अपने बच्चे का भविष्य खरीदने की कोशिश करता है। वह अपनी जरूरतें कम कर देता है, त्योहार फीके मना लेता है, नया मोबाइल नहीं खरीदता, लेकिन किसी तरह फीस भर ही देता है। क्योंकि उसे लगता है कि मुफ्त सरकारी शिक्षा से ज्यादा सुरक्षित उसका भविष्य महंगी निजी शिक्षा में है। किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा आरोप शायद ही कोई हो सकता है।

नीति आयोग की ताज़ा रिपोर्ट इस टूटते भरोसे की सरकारी तस्दीक करती है। वर्ष 2005 में देश के 71 फीसद बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। आज यह संख्या घटकर 49.24 फीसद रह गई है। यानी पहली बार देश के अधिकांश बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यह महज़ एक आंकड़ा नहीं है। यह जनता का वह मौन फैसला है, जो किसी चुनाव में नहीं, हर नए शैक्षणिक सत्र में सुनाया जा रहा है।
एक समय था जब सरकारी स्कूल इस देश के सपनों की पहली सीढ़ी हुआ करते थे। किसान का बेटा डॉक्टर बनता था, मजदूर की बेटी अध्यापिका, छोटे दुकानदार का बेटा प्रशासनिक अधिकारी। सरकारी स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं थे, वह सामाजिक बराबरी की सबसे बड़ी प्रयोगशाला थे। वहां बच्चे जाति, धर्म, भाषा और हैसियत से ऊपर उठकर एक साथ बैठते थे। लोकतंत्र की पहली पाठशाला वही थी।
फिर ऐसा क्या हुआ कि वही स्कूल धीरे-धीरे गरीबों की मजबूरी और निजी स्कूल संपन्नता की पहचान बन गए?
उत्तर किसी बहस में नहीं, जमीनी सच्चाई में छिपा है।
नीति आयोग के अनुसार देश के लगभग 98 हजार सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं। एक लाख से अधिक स्कूलों में बिजली उपलब्ध नहीं है। हजारों विद्यालय केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। जिस शिक्षक को पढ़ाने के साथ चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वे, रिकॉर्ड और दर्जनों प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ें, उससे विश्वस्तरीय शिक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
रिपोर्ट यह भी बताती है कि कक्षा पाँच के बड़ी संख्या में विद्यार्थी आज भी कक्षा दो स्तर का पाठ सहजता से नहीं पढ़ पाते और सामान्य गणित के प्रश्न हल करने में कठिनाई महसूस करते हैं। यह बच्चों की विफलता नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता है, जिसने उन्हें सीखने का अवसर ही बराबरी से नहीं दिया। उत्तर प्रदेश की तस्वीर भी चिंता बढ़ाती है। राज्य में 9,508 सरकारी स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। पिछले एक दशक में लगभग 25 हजार प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय बंद या दूसरे विद्यालयों में समाहित कर दिए गए। सरकारी फाइलें इसे संसाधनों का बेहतर उपयोग कह सकती हैं, लेकिन गांव के उस बच्चे के लिए इसका अर्थ है कि रोज़ कई किलोमीटर अधिक पैदल चलना। और हमारे समाज की सच्चाई यह है कि दूरी बढ़ते ही सबसे पहले बेटियों की पढ़ाई पर असर पड़ता है।
विडंबना देखिए। हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं। नई शिक्षा नीति, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट क्लास और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित शिक्षा की घोषणाएं करते हैं। लेकिन जिन स्कूलों में बिजली नहीं, पर्याप्त शिक्षक नहीं और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, वहां तकनीक किसका भविष्य बदलेगी?
दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था ही उनकी ताकत है। वहां सरकारी स्कूल गरीबों की मजबूरी नहीं, पूरे समाज का भरोसा होते हैं। मंत्री और मजदूर के बच्चों के लिए शिक्षा की बुनियाद अलग-अलग नहीं होती। भारत में दुर्भाग्य यह है कि सरकारी और निजी शिक्षा के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। यह खाई केवल स्कूलों की नहीं, अवसरों की भी है।
सबसे असहज सवाल यह है कि क्या इस देश के जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ अधिकारी और शिक्षा व्यवस्था चलाने वाले लोग बड़ी संख्या में अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हैं? यदि जवाब ‘नहीं’ है, तो फिर जनता से यह अपेक्षा क्यों कि वह उसी व्यवस्था पर आंख मूंदकर भरोसा करे?
यह लेख निजी स्कूलों के विरोध में नहीं है। वह रहें, बेहतर हों, प्रतिस्पर्धा भी करें। लेकिन एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की आत्मा बाजार नहीं, उसकी सार्वजनिक व्यवस्था होती है। जब सरकार शिक्षा से पीछे हटती है, तब बाजार आगे आ जाता है। लेकिन बाजार अवसर बेचता है, समानता नहीं देता।
आज जरूरत केवल बजट बढ़ाने की नहीं है। जरूरत भरोसा लौटाने की है। हर स्कूल में शिक्षक हों, हर कक्षा में सीखने का माहौल हो, हर बच्चा सम्मान और सुरक्षा के साथ पढ़ सके। और सबसे बड़ी बात है कि एक गरीब पिता यह विश्वास कर सके कि उसके बच्चे का भविष्य सरकारी स्कूल में भी उतना ही सुरक्षित है, जितना किसी महंगे निजी स्कूल में।
सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या टूटी हुई दीवारें नहीं हैं, टूटा हुआ भरोसा है। दीवारें बजट से बन जाती हैं, भरोसा नहीं। और जिस दिन किसी देश का गरीब यह मान ले कि उसके बच्चे का भविष्य सरकार नहीं, बाजार लिखेगा, उसी दिन समझ लीजिए कि लोकतंत्र ने अपनी सबसे कठिन परीक्षा में अच्छे अंक नहीं पाए।
देश का भविष्य आज भी स्कूल की उसी घंटी से तय होता है, जो हर सुबह बच्चों को पढ़ने नहीं, बराबरी का सपना देखने के लिए बुलाती है। अगर वह सपना टूट गया, तो केवल स्कूल ही नहीं हारेंगे बल्कि पूरा समाज हार जाएगा।

