
नई दिल्ली l पांच जून आते ही देश में हरियाली का मौसम आ जाता है। सरकारें जाग जाती हैं। मंत्री सक्रिय हो जाते हैं। अफसरों की बैठकों में पर्यावरण प्रमुख विषय बन जाता है। विद्यालयों में भाषण प्रतियोगिताएं होने लगती हैं। सोशल मीडिया पर धरती माता की चिंता उमड़ पड़ती है। करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं। नए रिकॉर्ड बनाए जाते हैं। तस्वीरें खिंचती हैं। विज्ञापन छपते हैं। संकल्प लिए जाते हैं। और फिर पूरे आत्मविश्वास के साथ घोषित कर दिया जाता है कि पर्यावरण बचाने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम उठा लिया गया। लेकिन सवाल यह है कि यदि सब कुछ इतना शानदार है तो धरती हर साल और गर्म क्यों हो रही है? शहर कंक्रीट के तंदूर क्यों बनते जा रहे हैं? नदियां क्यों मर रही हैं? भूजल क्यों गायब हो रहा है? और हवा सांस लेने लायक क्यों नहीं बच रही? यही वह सवाल है जिससे पर्यावरण दिवस के चमकदार मंच अक्सर बचते दिखाई देते हैं। कल्पना कीजिए कि यदि कोई पेड़ बोल सकता तो वह आज क्या कहता? शायद वह यही कहता कि उसे कुल्हाड़ी से उतना डर नहीं लगता जितना पर्यावरण प्रेमियों से लगता है।

यह सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना भी यही है। कुल्हाड़ी कम से कम अपना इरादा नहीं छिपाती। वह सामने से आती है और एक ही वार में अपना काम कर देती है। लेकिन आधुनिक पर्यावरण प्रेम पहले गले लगता है, फिर फोटो खिंचवाता है और बाद में मरने के लिए छोड़ देता है। पांच जून को पौधा लगाया जाता है, छह जून को भुला दिया जाता है। यही वह पाखंड है जिसे पहचानने की जरूरत है। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां पर्यावरण संरक्षण एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारी कम तथा एक वार्षिक आयोजन अधिक बनता जा रहा है। पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन पेड़ नहीं बचाए जा रहे। रिकॉर्ड बनाए जा रहे हैं, लेकिन जंगल नहीं बनाए जा रहे। घोषणाएं बढ़ रही हैं, लेकिन छाया घट रही है।
हर साल लाखों और करोड़ों पौधे लगाए जाने के दावे किए जाते हैं। हर साल नए लक्ष्य तय होते हैं। हर साल उपलब्धियों के विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। लेकिन क्या कभी उतनी गंभीरता से यह बताया जाता है कि पिछले वर्षों में लगाए गए पौधों में से कितने आज भी जीवित हैं? यहीं से असली कहानी शुरू होती है।
सरकारी गाड़ियां आती हैं। गड्ढे पहले से खोदे जा चुके होते हैं। पौधे पहले से तैयार होते हैं। मीडिया पहले से बुलाया जा चुका होता है। भाषण पहले से लिखे जा चुके होते हैं। मंत्री और अधिकारी आते हैं। मिट्टी डालते हैं। कैमरे की तरफ मुस्कुराते हैं। पर्यावरण बचाने का संकल्प लेते हैं। तस्वीरें खिंचती हैं। वीडियो बनते हैं। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं।
और फिर सब अपने-अपने रास्ते निकल जाते हैं। उसके बाद उस पौधे का क्या होता है? यह प्रश्न शायद सबसे असुविधाजनक प्रश्न है।
कहीं उसे पानी नहीं मिलता। कहीं सुरक्षा नहीं मिलती। कहीं पशु उसे चट कर जाते हैं। कहीं रखरखाव नहीं होता। कुछ महीनों बाद वह मर जाता है। लेकिन सरकारी फाइलों में वह जीवित रहता है। हमारे यहां अक्सर पौधे धरती पर कम और कागजों पर ज्यादा जीवित पाए जाते हैं। यदि यह बात अतिशयोक्ति लगती है तो केवल अपने आसपास नजर घुमाकर देख लीजिए। अपने शहर, कस्बे या गांव में पिछले पांच वर्षों के पौधारोपण अभियानों की वास्तविक स्थिति का आकलन कर लीजिए। आपको जवाब मिल जाएगा।
प्रकृति बड़ी निर्मम होती है। वह प्रेस विज्ञप्तियां नहीं पढ़ती। वह विज्ञापन नहीं देखती। वह भाषण नहीं सुनती। वह केवल परिणाम देखती है। तापमान झूठ नहीं बोलता। सूखती नदियां झूठ नहीं बोलतीं। घटता भूजल झूठ नहीं बोलता। बढ़ता प्रदूषण झूठ नहीं बोलता।
दिल्ली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक तरफ हरित क्षेत्र बढ़ने के दावे किए जाते हैं। दूसरी तरफ मई और जून में राजधानी आग उगलती दिखाई देती है। एक तरफ करोड़ों पौधे लगाने की घोषणाएं होती हैं। दूसरी तरफ नागरिक सड़क पर छाया तलाशते फिरते हैं। एक तरफ पर्यावरण संरक्षण के अभियान चलते हैं। दूसरी तरफ वायु प्रदूषण की वैश्विक सूचियों में दिल्ली बार-बार शर्मनाक स्थान प्राप्त करती है। यदि दावे सच हैं तो परिणाम कहां हैं? यह प्रश्न केवल दिल्ली का नहीं, पूरे देश का है। असल समस्या यह है कि हमने पर्यावरण संरक्षण को पर्यावरण प्रबंधन में और पर्यावरण प्रबंधन को इवेंट मैनेजमेंट में बदल दिया है। अब पेड़ बचाने से ज्यादा महत्व पौधारोपण कार्यक्रम को मिलने लगा है। जंगल तैयार करने से ज्यादा महत्व रिकॉर्ड बनाने को मिलने लगा है। परिणामों से ज्यादा महत्व आयोजनों को मिलने लगा है।
आज पर्यावरण दिवस है।
कल योग दिवस होगा।
परसों स्वच्छता अभियान होगा। उसके बाद जल संरक्षण सप्ताह होगा।
फिर कोई और दिवस आ जाएगा। समस्याएं वहीं की वहीं खड़ी रहती हैं, लेकिन कार्यक्रम बदलते रहते हैं।
यह हमारे समय की सबसे बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक बीमारी बनती जा रही है कि समाधान से ज्यादा आयोजन। विडंबना देखिए।
जिस पेड़ को बचाने में कुछ सौ रुपये खर्च करने पर सौ बार सोचा जाता है, उसी पेड़ के कट जाने के बाद बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाई जाती हैं। पहले छाया समाप्त की जाती है, फिर कूलिंग सेंटर बनाए जाते हैं। पहले पेड़ काटे जाते हैं, फिर हीट एक्शन प्लान तैयार किए जाते हैं। पहले धरती को गर्म किया जाता है, फिर जलवायु परिवर्तन पर सेमिनार आयोजित किए जाते हैं।
यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति स्वयं अपना घर जलाए और बाद में अग्निशमन दिवस मनाकर अपनी संवेदनशीलता का प्रमाण देने लगे। लेकिन पूरी जिम्मेदारी केवल सरकारों पर डाल देना भी ईमानदारी नहीं होगी।
समाज भी उतना ही दोषी है।
जो व्यक्ति अपनी कार की पार्किंग के लिए पेड़ कटवाता है, वह भी जिम्मेदार है।
जो घर के सामने सीमेंट बिछाकर मिट्टी का अंतिम टुकड़ा भी खत्म कर देता है, वह भी जिम्मेदार है। जो वर्षा जल को सहेजने के बजाय नालियों में बहा देता है, वह भी जिम्मेदार है। जो पांच जून को पौधा लगाकर सेल्फी पोस्ट करता है और सात जून तक उसका स्थान भूल जाता है, वह भी जिम्मेदार है।
सच्चाई यह है कि पर्यावरण विनाश का यह अपराध सामूहिक है। अंतर केवल इतना है कि कुछ लोग इसे सत्ता के संरक्षण में करते हैं और कुछ लोग सुविधा के लिए। इसलिए पर्यावरण दिवस पर सबसे जरूरी काम नया पौधा लगाना नहीं, पुराना हिसाब मांगना है।
सरकारें बताएं कि पिछले दस वर्षों में लगाए गए पौधों में से कितने आज जीवित हैं।
नगर निकाय बताएं कि विकास परियोजनाओं के नाम पर काटे गए पेड़ों की वास्तविक भरपाई हुई या नहीं। वन विभाग बताए कि पौधारोपण के लिए खर्च किए गए धन का परिणाम क्या निकला। और समाज स्वयं से पूछे कि उसने पर्यावरण को बचाने के लिए वास्तव में क्या किया, सिवाय सोशल मीडिया पर चिंता व्यक्त करने के। पर्यावरण दिवस की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि पेड़ काटे जा रहे हैं। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि पेड़ों को बचाने का दावा करने वाले लोग ही पर्यावरण को एक वार्षिक उत्सव में बदल चुके हैं। पर्यावरण कोई कार्यक्रम नहीं है। पर्यावरण कोई विज्ञापन नहीं है।
पर्यावरण कोई फोटो अवसर नहीं है। पर्यावरण जीवन है।
और जीवन एक दिन का आयोजन नहीं होता।
जिस दिन पौधों की संख्या गिनने के बजाय जीवित पेड़ों की संख्या गिनी जाने लगेगी, जिस दिन कैमरे से ज्यादा महत्व पानी की बाल्टी को मिलेगा, जिस दिन पौधारोपण से ज्यादा चर्चा संरक्षण की होगी, जिस दिन पर्यावरण के नाम पर खर्च होने वाले धन का सामाजिक लेखा-जोखा मांगा जाएगा, उसी दिन पर्यावरण दिवस सार्थक होगा। अन्यथा हर साल करोड़ों पौधे कागजों पर उगते रहेंगे, भाषणों में जंगल खड़े होते रहेंगे, विज्ञापनों में धरती हरी होती रहेगी और वास्तविक दुनिया में गर्मी, प्रदूषण, जल संकट और पर्यावरणीय विनाश बढ़ता रहेगा। तब शायद किसी पेड़ की यह शिकायत बिल्कुल जायज लगे कि उसे कुल्हाड़ी से नहीं, पर्यावरण प्रेमियों से डर लगता है। क्योंकि कुल्हाड़ी एक बार मारती है।
पाखंड हर साल।

