मुद्दे की बात :-जंगल, जनजाति और न्याय… क्या “विकास” अब केवल कॉरपोरेट मुनाफे का दूसरा नाम रह गया है? लेखक, वरिष्ठ सम्पादक आलोक गौड़


नई दिल्लीl मध्य प्रदेश के सिंगरौली में अडानी समूह की कोल ब्लॉक परियोजना को मिली वन मंज़ूरी में हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है। यह उस व्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है जिसमें जंगलों, आदिवासियों, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की चिंताओं से अधिक महत्व अब बड़े आर्थिक हितों को मिलता दिखाई दे रहा है।
अदालत ने कहा कि याचिका निर्धारित समय सीमा के बाद दायर की गई थी, इसलिए हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता। कानून की अपनी प्रक्रिया होती है और अदालतें उसी दायरे में निर्णय देती हैं। लेकिन इस फैसले ने एक बार फिर उस गहरे सवाल को सामने ला खड़ा किया है जिससे देश पिछले कई वर्षों से जूझ रहा है कि क्या भारत में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है?
सिंगरौली कोई सामान्य इलाका नहीं है। यह क्षेत्र पहले से ही खनन, प्रदूषण और औद्योगिक परियोजनाओं का भारी दबाव झेल रहा है। इसे देश की “ऊर्जा राजधानी” कहा जाता है, लेकिन वहां रहने वाले लाखों लोगों के लिए यह ऊर्जा नहीं बल्कि प्रदूषण, विस्थापन और बीमारियों की राजधानी बन चुका है।


वर्षों से स्थानीय लोग जहरीली हवा, दूषित पानी और खनन परियोजनाओं के दुष्प्रभाव झेल रहे हैं। अब जब फिर से हजारों हेक्टेयर वन भूमि और लाखों पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे ही। करीब चौदह सौ हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन कोई छोटी बात नहीं है। यह केवल जमीन का आंकड़ा नहीं है। यह जंगलों का विनाश है। यह वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर हमला है। यह हाथियों के पारंपरिक रास्तों को बाधित करने का खतरा है। यह उन आदिवासी समुदायों के अस्तित्व का प्रश्न है जिनकी पूरी जीवनशैली जंगलों पर आधारित है। लेकिन आज के भारत में सबसे कमजोर पक्ष वही है जिसकी आवाज सबसे कम सुनी जाती है।
कॉरपोरेट के पास संसाधन हैं, लॉबिंग है, कानूनी टीमें हैं, सत्ता के गलियारों तक पहुंच है।सरकारों के पास विकास का तर्क है। लेकिन आदिवासी के पास क्या है?
एक जंगलl जिसे अब “राष्ट्रीय हित” के नाम पर उससे छीना जा रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू पारदर्शिता और सूचना का है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि वन मंज़ूरी की सूचना केवल मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दी गई। स्थानीय लोगों तक इसकी जानकारी प्रभावी तरीके से नहीं पहुंची। यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संवेदनहीनता का उदाहरण है। दिल्ली और भोपाल में बैठे नीति निर्माता शायद यह मान लेते हैं कि वेबसाइट पर सूचना डाल देना ही पर्याप्त है। लेकिन जिन गांवों में आज भी इंटरनेट, शिक्षा और सरकारी संचार की स्थिति कमजोर है, वहां रहने वाला व्यक्ति मंत्रालय की वेबसाइट कैसे देखेगा? उसे तो तब पता चलता है जब जंगल में सर्वे शुरू होता है, पेड़ों पर निशान लगते हैं और बुलडोजर पहुंचने लगते हैं।
यही वह असमानता है जो आम नागरिक और सत्ता के बीच की दूरी को लगातार बढ़ा रही है। एक तरफ “डिजिटल इंडिया” का प्रचार है, दूसरी तरफ लाखों लोग अब भी बुनियादी सूचना तक समय पर नहीं पहुंच पाते।
आज पर्यावरणीय मंज़ूरियों की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
क्या जनसुनवाई वास्तव में निष्पक्ष होती हैं? क्या स्थानीय समुदायों की सहमति वास्तव में ली जाती है? क्या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्टें पूरी ईमानदारी से तैयार होती हैं?
या फिर यह सब केवल औपचारिकताएं बनकर रह गई हैं ताकि परियोजनाओं को वैधानिक रास्ता मिल सके? पिछले कुछ वर्षों में देश ने बार-बार देखा है कि बड़े औद्योगिक और खनन प्रोजेक्ट्स को तेजी से मंज़ूरियां मिलती हैं, जबकि स्थानीय समुदायों की चिंताओं को अक्सर विकास विरोधी बताकर किनारे कर दिया जाता है।
जो लोग जंगल बचाने की बात करते हैं उन्हें “प्रगति का दुश्मन” घोषित कर दिया जाता है। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि आखिर ऐसा कौन सा विकास है जिसमें सबसे पहले जंगल खत्म होते हैं और सबसे ज्यादा लाभ कुछ चुनिंदा समूहों को मिलता है? भारत पहले ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट का सामना कर रहा है।
अत्यधिक गर्मी, अनियमित बारिश, जल संकट, बाढ़ और प्रदूषण अब रोजमर्रा की वास्तविकता बन चुके हैं।
दिल्ली से लेकर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक लोग गर्मी के नए रिकॉर्ड देख रहे हैं।
वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि जंगलों की कटाई और कोयले पर निर्भरता आने वाले वर्षों में हालात को और भयावह बना सकती है।
विडंबना यह है कि एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन कम करने की बातें होती हैं, दूसरी तरफ जमीन पर जंगल काटकर कोयला परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जाता है।
जनता से कहा जाता है कि बिजली बचाइए, पेट्रोल कम खर्च कीजिए, पर्यावरण बचाइए। लेकिन बड़े उद्योगों के लिए हजारों हेक्टेयर वन भूमि उपलब्ध कराना “राष्ट्रीय विकास” कहलाता है। सवाल केवल अडानी समूह का नहीं है। सवाल उस पूरी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का है जिसमें कॉरपोरेट हितों और सरकारी नीतियों के बीच की दूरी लगातार कम होती दिखाई दे रही है।
आज आम नागरिक के मन में यह धारणा मजबूत हो रही है कि इस देश में कानून और प्रक्रियाएं सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं होतीं। गरीब आदमी अगर नियम तोड़े तो अपराधी।
लेकिन बड़े आर्थिक हितों के लिए नियमों की व्याख्या भी बदल जाती है और प्राथमिकताएं भी।
यह भी याद रखना होगा कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे जल स्रोतों की रक्षा करते हैं। वे तापमान नियंत्रित करते हैं। वे जैव विविधता को बचाते हैं।वे लाखों लोगों की आजीविका का आधार होते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वे आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व की गारंटी होते हैं।
अगर विकास की कीमत जंगलों के विनाश, आदिवासियों के विस्थापन और पर्यावरणीय संकट के रूप में चुकानी पड़े, तो फिर उस विकास की दिशा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है, अपराध नहीं।
आज जरूरत इस बात की है कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का दुश्मन मानने की सोच बदली जाए।
देश को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो ऊर्जा और उद्योग के साथ-साथ जंगलों और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करें।
वरना आने वाले समय में भारत आर्थिक रूप से भले शक्तिशाली दिखाई दे, लेकिन उसके जंगल खत्म हो चुके होंगे, नदियां जहरीली हो चुकी होंगी और आदिवासी समुदाय इतिहास की किताबों में सिमटते जा रहे होंगे।
और तब शायद देश को यह एहसास होगा कि सबसे बड़ी गलती जंगल काटने की नहीं थीl
सबसे बड़ी गलती उन आवाजों को नजरअंदाज करने की थी जो समय रहते चेतावनी दे रही थीं।

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