मुद्दे की बात :-जनता साइकिल चलाए, सत्ता हवाई जहाज़ उड़ाए!

अलोक गौड़ :वरिष्ठ लेखक सम्पादक :-


नई दिल्ली 1 देश पर संकट आया नहीं कि सत्ता को सबसे पहले जनता की जेब दिखाई देने लगती है। इस बार भी वही हुआ। ढाई महीने तक ईरान-अमेरिका तनाव और तेल संकट पर आंख मूंदे बैठी सरकार को अचानक याद आया कि जनता पेट्रोल-डीजल बचाए, सोना न खरीदे, विदेश यात्रा पर न जाए, वर्क फ्रॉम होम करे और उर्वरकों का कम इस्तेमाल करे। यानी हर बार की तरह इस बार भी त्याग का ठेका जनता के माथे और मौज-मस्ती का लाइसेंस सत्ता के हाथ।
प्रधानमंत्री जनता को मितव्ययिता का उपदेश दे रहे हैं। अच्छा है। लेकिन देश पूछ रहा है कि क्या यह उपदेश प्रधानमंत्री कार्यालय और मंत्रिमंडल पर भी लागू होगा या केवल आम आदमी के लिए है?
जिस देश में प्रधानमंत्री का एक दौरा करोड़ों रुपये निगल जाता हो, वहां पेट्रोल बचाने की नसीहत सुनकर जनता हंसे या रोए? हर दौरे में सैकड़ों गाड़ियों का काफिला, हेलीकॉप्टर, विशेष विमान, हजारों सुरक्षाकर्मी, स्वागत के मंच, सरकारी विज्ञापन और मीडिया का शोर1 क्या यह सब राष्ट्रीय बचत योजना का हिस्सा है? जनता से कहा जा रहा है कि स्कूटर कम चलाओ, जबकि सत्ता रोज़ आसमान नाप रही है।
सवाल यह भी है कि आखिर प्रधानमंत्री का हर तीसरे दिन देश भ्रमण इतना जरूरी क्यों है? क्या हर पुल, हर सड़क, हर ट्रेन और हर योजना का उद्घाटन वही करेंगे? क्या देश में मंत्री, मुख्यमंत्री और अधिकारी सिर्फ माला पहनने के लिए बचे हैं? डिजिटल इंडिया का सबसे बड़ा ढोल पीटने वाली सरकार खुद ऑनलाइन उद्घाटन क्यों नहीं करती? या फिर कैमरे के सामने फीता काटे बिना विकास अधूरा लगता है?
विदेश यात्राएं कम करने की सलाह भी कम दिलचस्प नहीं। प्रधानमंत्री स्वयं दुनिया घूमते रहें, लेकिन जनता अपनी यात्रा रोक दे। सत्ता डॉलर उड़ाए तो वह कूटनीति कहलाती है, आम आदमी विदेश जाए तो राष्ट्रहित खतरे में पड़ जाता है! अगर सचमुच बचत करनी है तो विदेश दौरों का सरकारी तमाशा बंद कीजिए। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बैठकें कीजिए। राजदूतों को अधिकार दीजिए। लेकिन ऐसा होगा नहीं, क्योंकि इस दौर की राजनीति काम से ज्यादा कैमरे पर चलती है।
सोना न खरीदने की सलाह तो मानो सरकार ने अपनी आर्थिक विफलता का प्रमाणपत्र खुद जारी कर दिया। इस देश में लोग शौक से कम, डर से ज्यादा सोना खरीदते हैं। जब रोजगार अस्थिर हो, बाजार डगमगा रहे हों, रुपया कमजोर पड़ रहा हो और भविष्य अनिश्चित दिखे, तब जनता बैंक से ज्यादा सोने पर भरोसा करती है। सरकार यदि वास्तव में सोने का आयात रोकना चाहती है तो कानून बनाए, प्रतिबंध लगाए, तस्करी रोके। लेकिन सत्ता को कठोर फैसले नहीं, उपदेश देना पसंद है।


वर्क फ्रॉम होम की बात भी बड़ी सुविधाजनक है। जनता घर से काम करे ताकि पेट्रोल बचे, लेकिन मंत्री और अफसर लालबत्ती वाले काफिलों में दौड़ते रहें। क्या सरकार अपने मंत्रालयों में इसे लागू करेगी? क्या मंत्री ऑनलाइन बैठकें करेंगे? क्या सरकारी फिजूलखर्ची रुकेगी? जवाब सब जानते हैं।
असल समस्या तेल संकट नहीं, सत्ता का चरित्र है। यह सत्ता सादगी में विश्वास ही नहीं करती। इसे भव्य मंच चाहिए, चमकदार आयोजन चाहिए, ड्रोन कैमरे चाहिए, विशाल रैलियां चाहिए और हर दिन नया प्रचार चाहिए। जनता से कहा जा रहा है कि खर्च कम करो, जबकि सरकार खुद प्रचार और प्रदर्शन की सबसे बड़ी उपभोक्ता बनी हुई है।
देश त्याग से भागता नहीं। इस देश की जनता ने युद्ध भी झेले हैं, नोटबंदी भी झेली है और महामारी में भूख भी झेली है। लेकिन जनता को सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब सत्ता खुद ऐश करे और त्याग का उपदेश नीचे बांटे।
इसलिए मुद्दे की बात सिर्फ इतनी है—
यदि देश संकट में है तो सबसे पहले सत्ता अपनी शाही जिंदगी छोड़े। प्रधानमंत्री अपना काफिला छोटा करें।
मंत्री विदेश यात्राएं रोकें।
सरकारी समारोह बंद हों।
विज्ञापनों पर खर्च घटे।
तब जनता भी साथ खड़ी होगी।
लेकिन जब जनता से कहा जाए कि साइकिल चलाओ और सत्ता खुद हवाई जहाज़ उड़ाती फिरे, तब उपदेश नहीं, पाखंड दिखाई देता है।

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