भगत सिंह राजगुरु सुखदेव के शहीदी दिवस पर दी श्रद्धांजलि: खोसला

नेशनल पैंथर्स पार्टी दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष और भी भीम ब्रिगेड ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव जोली खोसला ने आज शहीदे आजम भगत सिंह राजगुरु सुखदेव जी के शहीद दिवस पर दिन श्रद्धांजलि और मौजूदा सरकार की यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का किया धन्यवाद जिन्होंने भगत सिंह जी की प्रतिमा आज वहां लगे जहां भगत सिंह जी का केस की सुनवाई की गई थी हम सब भारतीयों को गर्व है खोसला ने कहा कि 23 मार्च 1982 को प्रोफेसर भीम सिंह जी ने नेशनल पैंथर्स पार्टी का गठन किया जनता को न्याय अधिकार दिलाने के लिए और 12 दिसंबर 2012 को भीम ब्रिगेड की स्थापना की!आज 23 मार्च है आज के दिन ही हर हिंदुस्तानी के दिल में सम्मान के साथ जगह बनाने वाले भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर जेल में तय समय से पहले चुपचाप फांसी दी गई थी।
भगत सिंह की लोकप्रियता का आलम ये था कि अंग्रेजों ने न सिर्फ़ उन्हें तय तारीख़ से पहले फांसी दे दी बल्कि उनके शरीर को भी चुपचाप जलाकर सतलुज में बहा दिया था। भगत सिंह और उनके साथियों के परिजन नम आंखों से अपने बच्चों की लाश मांगते रहे। लेकिन अंग्रेजी सरकार इतनी खौफ़जदा थी कि उसने न सिर्फ भगत सिंह और उनके साथियों की लाशें उनके परिवारों को नहीं सौंपीं बल्कि उनकी स्मृति से जुड़े सभी चिह्न भी नष्ट करने की भरपूर कोशिश की। (राज्य जब डरता है तो हमेशा ऐसा ही करता है।) भगत सिंह और उनके साथियों ने तो पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को नेस्तनाबूद करने की सौगंध ली हुई थी। इतने ख़तरनाक शत्रु से अतिरिक्त सावधानी कारण स्वत: स्पष्ट है।
जिनके लिए अमरता की संकल्पना अस्पष्ट हो, वे भगत सिंह को सामने रखकर इसके मायने समझ सकते हैं। भगत सिंह को समझने से ज़्यादा महत्वपूर्ण उनके जीवन को जानना है। भगत सिंह को जीवन बहुत छोटा मिला किंतु उस छोटी सी लौ की रोशनी से उस वक्त का पूरा उपमहाद्वीप नहा उठा था। आज भी बहुत से लोगों के लिए भगत सिंह का क़द आम मनुष्य के मुक़ाबले कहीं ऊंचा है। क्रांतिकारी गतिविधियों में भगत सिंह की भागीदारी से अधिक जो चीज़ उन्हें अधिकांश क्रांतिकारियों से अलग करती है वह है उनकी अध्य्यन, मनन और लेखन प्रति उनका जुनून ‌। मात्र तेईस साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ जाने वाले भगत सिंह के पत्र और दस्तावेज़ आज भी साम्राज्यवादी शोषण पर उनके परिपक्व दृष्टिकोण का प्रमाण हैं। उन्हें जोशीला वतनपरस्त या देशभक्त कह देना, उनका बहुत सतही परिचय होगा।

विशेषकर तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिघटनाओं का जितना वस्तुनिष्ठ विश्लेषण भगत सिंह जैसा कम उम्र के नौजवान ने किया है वैसी परिपक्वता नेहरू के लेखन में भी नहीं मिलती। भगत सिंह की छोटी सी संस्था ने देश को इतने नामी गिरामी लेखक, कार्यकर्ता और साहित्यकार दिए हैं कि यह विषय स्वयं में शोध का आधार हो सकता है। यशपाल, अज्ञेय, मन्मथनाथ गुप्त, प्रकाशवती, शिव वर्मा आदि सभी ने स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। अगर और पीछे जाएँ तो यह परंपरा आज़ाद के साथ-साथ बिस्मिल , रोशन सिंह लाहिड़ी , अश्फाकुल्लाह खां , गणेश शंकर विद्यार्थी तक जाती है।यशपाल और अज्ञेय जहाँ साहित्य के निर्द्वंद नक्षत्र हैं तो भगत सिंह कर्म और सिद्धांत दोनों दृष्टि से बेहद सटीक विश्लेषक, अध्येता और दृष्टा के रूप में भारतीय मनीषा के आकाश के जाज्वल्यमान सूर्य हैं।नौजवान चाहें तो उनकी लिखी पुस्तकों का अध्य्यन करके उनकी प्रखर मेधा से दो-चार हो सकते
हैं। शायद उन्हें ये बात चौंकाए भी कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के वर्तमान भूक्षेत्र से उनके संगठन में सिर्फ़ इतने ही नौजवान थे जिन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है, फिर भी इस छोटे से संगठन ने महज़ अपनी प्रतिभा और संकल्प के बल पर भारत के इतिहास में अपने अमिट हस्ताक्षर छोड़े हैं। अगर आज के नौजवान इसमें कुछ सादृश्य ढूँढ सकें तो उन्हें गर्व होगा कि वे भी उसी परंपरा के वाहक हैं और वैसी ही संभावनाओं से भरे हुए भी हैं। वे चाहें तो आज भी सार्वजनिक जीवन की गंगा को प्रवाहमान और स्वच्छ रख सकते हैं। यह स्थिति किसी धर्म या जाति विशेष में जन्म लेने पर गौरवान्वित होने से कहीं बेहतर होगी। तब इस पुण्यभूमि का पुत्र मात्र होना और ऐसी चेतना का वाहक होना ही स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने का पर्याप्त कारण होगा….

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