हंसराज महाविद्यालय में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

Uncategorized

वेद, उपासना और जीवन-मूल्यों पर राष्ट्रीय मंथन

नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026। हंसराज महाविद्यालय के संस्कृत साहित्य परिषद् एवं वेद निधि ट्रस्ट के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘वैदिक उपासना : विधि एवं विमर्श’ विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 14 एवं 15 अक्टूबर 2026 को किया गया। संगोष्ठी में वैदिक उपासना के दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक पक्षों तथा समकालीन जीवन में उनकी प्रासंगिकता पर विद्वानों ने विचार व्यक्त किए।

उद्घाटन सत्र में महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. (डॉ.) रमा ने वैदिक ज्ञान-परंपरा के मूल्यों को समकालीन जीवन में आत्मसात् करने की आवश्यकता पर बल दिया। दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म में निदेशक पद पर उनकी नियुक्ति के उपलक्ष्य में समापन सत्र में उन्हें सम्मानित भी किया गया।

वेद निधि ट्रस्ट के संस्थापक डॉ. आनंद कुमार ने कहा कि वैदिक उपासना सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति का मार्ग है तथा तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करती है। मुख्य अतिथि स्वामी आर्यवेश ने कहा कि वेद संपूर्ण मानव समाज के लिए ज्ञान के स्रोत हैं। उपासना केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन और ईश्वरीय गुणों को जीवन में अपनाने की साधना है। उन्होंने कहा कि ग्रंथ केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा हैं। ठाकुर विक्रम सिंह ने परोपकार एवं लोककल्याण के महत्त्व को रेखांकित किया, जबकि डॉ. एस. के. शर्मा ने वैदिक परंपरा के मूल तत्त्वों के अध्ययन पर बल दिया। मुख्य वक्ता डॉ. ज्वलंत कुमार शास्त्री ने वेद, प्रमुख उपनिषदों तथा सांख्य, योग और वेदांत दर्शनों के संदर्भ में उपासना की प्रासंगिकता स्पष्ट की।

प्रथम तकनीकी सत्र में आचार्या सूर्या देवी चतुर्वेदी ने वेदांत दर्शन और वैदिक उपासना के संबंधों पर प्रकाश डाला। आचार्या प्रियंवदा ने ‘ईश्वरोपासना का वैदिक स्वरूप’ विषय पर ज्ञान, कर्म और उपासना के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या की। सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. भारतेंदु पांडेय ने की।

समापन सत्र में वैदिक उपासना के शास्त्रीय एवं दार्शनिक पक्षों पर विमर्श

15 अक्टूबर को महाविद्यालय के ओल्ड सेमिनार हॉल में आयोजित समापन सत्र में आचार्या सूर्या देवी चतुर्वेदी ने ‘वैदिक उपासना विधि’ विषय पर व्याख्यान देते हुए परमात्मा के स्वरूप और नित्य कर्म के महत्त्व को स्पष्ट किया। प्रो. ओमनाथ विमली ने सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया। इस अवसर पर प्रेमपाल शास्त्री, आचार्या सूर्या देवी चतुर्वेदी तथा दानवीर वेदालंकार को सम्मानित किया गया।

सत्र में ज्ञान, कर्म और उपासना के समन्वय, मीमांसा दर्शन, उपवास एवं उपासना के शास्त्रीय अर्थ तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासन के माध्यम से ज्ञान-प्राप्ति की प्रक्रिया पर विचार किया गया। उपासना को कर्म और ज्ञान के मध्य सेतु बताते हुए साधक की आध्यात्मिक यात्रा तथा उपास्य-उपासक संबंध की दार्शनिक व्याख्या की गई।

समापन सत्र का संचालन डॉ. राहुल रंजन ने किया। डॉ. खुशबू शुक्ला एवं उपस्थित अतिथियों द्वारा प्रमाण-वाचन के पश्चात् डॉ. राहुल रंजन ने समापन वक्तव्य प्रस्तुत किया। शांति-पाठ एवं सामूहिक छायाचित्र के साथ संगोष्ठी संपन्न हुई।

इस द्विदिवसीय आयोजन ने वैदिक ज्ञान-परंपरा, उपासना और जीवन-मूल्यों के बीच संबंधों पर सार्थक अकादमिक संवाद को प्रोत्साहित किया तथा भारतीय दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *