अहं से अनंतः’ – The Self Beyond the Selfआत्मबोध, चेतना और सनातन मूल्यों पर हंसराज कॉलेज में हुआ प्रेरक संवाद

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नई दिल्ली, 2 सितंबर 2026:

दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में Advaita Spiritual Foundation द्वारा “अहं से अनंतः — The Self Beyond the Self” विषय पर एक विशेष वक्ता सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवा पीढ़ी को आत्मबोध, आत्म-जागरूकता और भारतीय ज्ञान-परंपरा के गहन चिंतन से जोड़ना था।


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि एवं वक्ता श्रीमती रेणुका गोस्वामी, संस्थापक – निमाई पाठशाला, TEDx वक्ता तथा भारतीय परंपरागत ज्ञान एवं सामाजिक सेवा के क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तित्व रहीं। कार्यक्रम का आयोजन हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा के गरिमामय सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। भारतीय ज्ञान-परंपरा, आध्यात्मिक चिंतन और सनातन मूल्यों को आधुनिक युवा पीढ़ी के साथ संवाद का विषय बनाने के लिए कॉलेज परिसर में इस प्रकार के आयोजन को प्रोत्साहन देना उनके नेतृत्व की विशेष सराहनीय पहल रही।


प्रो. रमा के सानिध्य ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की और यह संदेश भी दिया कि विश्वविद्यालय केवल अकादमिक ज्ञान का केंद्र ही नहीं, बल्कि आत्ममंथन, भारतीय चिंतन और मूल्यपरक संवाद का भी महत्वपूर्ण मंच हो सकता है।
DAV गीत से कृष्ण भजनों तक – भक्ति और युवा ऊर्जा का अद्भुत संगम
कार्यक्रम का शुभारंभ DAV गीत से हुआ। इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित अनेक भजनों की प्रस्तुति हुई। हंसराज कॉलेज के युवा विद्यार्थियों, विशेषकर आज की Gen Z पीढ़ी, को मृदंग और मंजीरे की ताल पर पूरे उत्साह एवं भाव के साथ कृष्ण भजन गाते देखना अत्यंत मनमोहक और प्रेरणादायक रहा। पारंपरिक तालियों की जगह विद्यार्थियों द्वारा उत्साहपूर्वक “हरि बोल—हरि बोल!” के उद्घोष ने पूरे सभागार को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। यह दृश्य इस बात का जीवंत उदाहरण बना कि 21वीं सदी की युवा पीढ़ी के बीच भी सनातन मूल्य और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा अपनी जीवंत उपस्थिति बनाए हुए हैं।
श्रीमती रेणुका गोस्वामी के स्वागत में विद्यार्थियों ने “अहो भाग्यम!” का उद्घोष किया। इस अवसर पर भारतीय परंपरा और ज्ञान-विरासत के प्रसार के लिए उनके द्वारा संचालित Nimai Pathshala के कार्यों की भी उत्साहपूर्वक चर्चा हुई। विद्यार्थियों के साथ अपने संवाद की शुरुआत श्रीमती रेणुका गोस्वामी ने बेहद आत्मीय अंदाज में करते हुए कहा—
“एक ही दिल है, कितनी बार जीतोगे!” इसके बाद उन्होंने विद्यार्थियों को बाहरी पहचान से आगे बढ़कर अपने भीतर झांकने और ‘स्व’ से संवाद करने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि हमें केवल दूसरों के बारे में बात करने के बजाय अपने भीतर के ‘स्व’ से बात करना सीखना चाहिए। यहां ‘मैं’ केवल हमारी बाहरी पहचान नहीं, बल्कि हमारे भीतर मौजूद उस चेतना की ओर संकेत करता है, जिसे जानना आत्मबोध की दिशा में पहला कदम है।
उन्होंने विद्यार्थियों के सामने यह प्रश्न रखा कि क्या हम अपने कार्य, पद, जिम्मेदारियों और सामाजिक भूमिकाओं से परिभाषित होते हैं, या हमारे भीतर कोई ऐसी चेतना है जो इन सभी भूमिकाओं की साक्षी है?
उन्होंने कहा कि जिस बड़े और व्यापक ‘स्व’ से हम जुड़े हैं, उसके प्रति जागरूक होना ही उस सीमित ‘मैं’ को समझने की शुरुआत है, जिसे हम सामान्यतः अपना परिचय मान लेते हैं।


आत्म-जागरूकता का अर्थ है स्वयं का साक्षी बनना
श्रीमती गोस्वामी ने आत्म-जागरूकता को केवल शरीर या व्यक्तित्व की पहचान तक सीमित न रखते हुए अपने विचारों, भावनाओं और स्वयं के साथ होने वाले आंतरिक संवाद का साक्षी बनने की प्रक्रिया बताया। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने चेतन और अचेतन निर्णयों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा दी और एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया “जो देख रहा है, वह कौन है और जिसे देखा जा रहा है, वह कौन है?”
उन्होंने विद्यार्थियों को अपने भीतर उस शाश्वत सत्य की खोज करने के लिए प्रेरित किया जो समय के साथ बदलता नहीं है। उन्होंने कहा कि भौतिक संसार हमारी अंतिम पहचान नहीं है और न ही इस संसार की कोई वस्तु सदा के लिए हमारी हो सकती है। उनके अनुसार, जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान तब शुरू होता है जब हम दूसरों से उत्तर मांगने के बजाय अपने आप से सही प्रश्न पूछना शुरू करते हैं।
‘स्वयं’ से ‘स्व’ और फिर परम सत्य की ओर यात्रा
श्रीमती गोस्वामी ने आत्मबोध की यात्रा को अपने भीतर देखने और धीरे-धीरे अहं से आगे बढ़ने की यात्रा बताया। उन्होंने विद्यार्थियों को ‘मैं कौन हूं?’ जैसे मूलभूत प्रश्नों पर चिंतन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ‘स्वयम्’ की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए ‘स्व’ से जुड़ने और उस उच्चतर स्व की ओर बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ज्ञान, सत्संग, कथा-श्रवण, योग और सेवा के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर के विवेक और आत्मबोध को जागृत कर सकता है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि दूसरों की सेवा भी स्वयं को जानने की यात्रा का माध्यम बन सकती है। अच्छे विचारों, श्रेष्ठ संगति और आध्यात्मिक अभ्यास से व्यक्ति अपने भीतर की चेतना को अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव कर सकता है।
भारतीय दर्शन की विविध धाराओं पर भी प्रकाश
अपने संबोधन में श्रीमती गोस्वामी ने भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं—अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत और भेदाभेद—का उल्लेख करते हुए विद्यार्थियों को जीव और ईश्वर के संबंध को समझने के विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों से परिचित कराया। उन्होंने “अहं ब्रह्मास्मि” की अवधारणा के माध्यम से अद्वैत के मूल भाव को समझाया और आत्म तथा परम सत्य के संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास केवल दूसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए करना चाहिए। उन्होंने राधा रमण के प्रति समर्पण, सेवा और भक्ति को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।
मंत्रोच्चार ने वातावरण को बनाया ऊर्जावान
श्रीमती गोस्वामी के संबोधन से पूर्व हुए मंत्रोच्चार ने पूरे सभागार को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। मंत्रों की गूंज और विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने कार्यक्रम को एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव में बदल दिया। कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने आत्मबोध, स्वयं की पहचान, आध्यात्मिकता और आधुनिक जीवन में भारतीय दर्शन की प्रासंगिकता से जुड़े प्रश्न पूछे। श्रीमती गोस्वामी ने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का सहज और संवादात्मक शैली में समाधान किया। ‘अहं से अनंतः’ का मूल संदेश यही रहा कि मनुष्य अपनी बाहरी पहचान, भूमिकाओं और अहं से आगे बढ़कर अपने भीतर के साक्षी को पहचाने, स्वयं से सही प्रश्न पूछे और अंततः उस उच्चतर चेतना से जुड़े, जो सीमित ‘मैं’ से कहीं परे है।
यह आयोजन आधुनिक युवा और भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा के बीच एक सार्थक एवं जीवंत संवाद का प्रभावशाली उदाहरण बनकर सामने आया।

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