
भारत में जरूरत के मुकाबले केवल 25–30% कॉर्नियल ट्रांसप्लांट ही हो रहे हैं, जबकि क्लिनिकल कैपेसिटी लगातार बढ़ रही है: डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल के विशेषज्ञ डा.अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल द्वारा देशभर में आई डोनेशन को लेकर अवेयरनेस कैंपेन्स चलाए जा रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग आई डोनेशन के लिए आगे आएं।
भारत में 41वें नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट के अवसर पर विशेषज्ञों ने तेज़ कॉर्नियल रिट्रीवल, मजबूत आई-बैंक नेटवर्क और डोनेट किए गए टिशू के बेहतर यूटिलाइजेशन की जरूरत पर जोर दिया।
नई दिल्ली, 1 सितंबर 2026: डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल के प्रमुख कॉर्नियल स्पेशलिस्ट्स, जिनमें पद्म श्री प्रो. डॉ. जे. एस. तितियाल, रीजनल हेड – क्लिनिकल सर्विसेज शामिल हैं, ने कहा कि भारत में आज पर्याप्त क्लिनिकल एक्सपर्टीज़, ट्रेंड कॉर्नियल स्पेशलिस्ट्स और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है, जिससे देश में कहीं अधिक कॉर्नियल ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। हालांकि, डोनेट की गई कॉर्निया की उपलब्धता अभी भी देश की जरूरत से काफी कम है।
41वें नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट के तहत आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में हर वर्ष अनुमानित 1 लाख कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, लेकिन वर्तमान में केवल 25,000–30,000 ट्रांसप्लांट ही किए जा रहे हैं। यानी देश की अनुमानित जरूरत का केवल 25–30% ही पूरा हो पा रहा है।
भारत में विज़न को रिस्टोर करने की क्षमता अब केवल सर्जिकल कैपेबिलिटी से सीमित नहीं है, बल्कि सूटेबल डोनर टिशू की कमी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है। देश में क्लिनिकल कैपेसिटी लगातार बढ़ रही है, इसलिए विशेषज्ञों ने जोर दिया कि आई डोनेशन को बढ़ाना सबसे पहली प्रायोरिटी होनी चाहिए, ताकि कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों और वास्तव में ट्रांसप्लांट प्राप्त कर पाने वाले मरीजों के बीच का गैप कम किया जा सके।
हालांकि, सिर्फ आई डोनेशन का निर्णय लेना ही पर्याप्त नहीं है। एक डोनेट की गई आई को ट्रांसप्लांट के लिए सूटेबल कॉर्निया में बदलने के लिए पूरी प्रोसेस का एफिशिएंट तरीके से काम करना जरूरी है।
परिवार द्वारा डोनेशन का निर्णय लेने और मृत्यु के तुरंत बाद आई बैंक से संपर्क करने से लेकर टाइमली रिट्रीवल, टिशू इवैल्यूएशन, ट्रांसपोर्टेशन, एलोकेशन और ट्रांसप्लांटेशन तक हर स्टेप महत्वपूर्ण है। किसी भी स्तर पर देरी या कमी होने से जरूरतमंद मरीजों के लिए उपलब्ध डोनर टिशू कम हो सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों ने आई डोनेशन में पब्लिक पार्टिसिपेशन बढ़ाने के साथ-साथ मजबूत आई-बैंक नेटवर्क, फास्टर रिट्रीवल सिस्टम और डोनेट किए गए टिशू के बेहतर यूटिलाइजेशन की आवश्यकता पर जोर दिया।
“आई डोनेशन की अपील से आगे बढ़कर पूरी डोनर-टू-रिसिपिएंट जर्नी को मजबूत करना होगा”
पद्म श्री प्रो. डॉ. जीवन तितियाल, रीजनल हेड – क्लिनिकल सर्विसेज, डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल, ने कहा,
“कॉर्नियल ब्लाइंडनेस विज़न लॉस के महत्वपूर्ण कारणों में से एक है, जिसका इलाज ट्रांसप्लांटेशन के जरिए संभव है। इसके बावजूद हजारों मरीज सूटेबल डोनर टिशू के लिए लंबे और अनिश्चित इंतजार का सामना कर रहे हैं। भारत में कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन के लिए सर्जिकल एक्सपर्टीज़ और लगातार एडवांस होती टेक्निक्स उपलब्ध हैं, लेकिन सूटेबल और हाई-क्वालिटी डोनर टिशू की अवेलेबिलिटी अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
इसलिए अब बातचीत केवल लोगों से अपनी आंखें डोनेट करने की प्लेज लेने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। परिवारों के बीच इस बात को लेकर अधिक अवेयरनेस की जरूरत है कि मृत्यु के बाद समय पर निर्णय लेना कितना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही हॉस्पिटल-बेस्ड रिट्रीवल सिस्टम को मजबूत करना, एफिशिएंट आई-बैंक नेटवर्क विकसित करना और पूरी डोनर-टू-रिसिपिएंट पाथवे में बेहतर कोऑर्डिनेशन सुनिश्चित करना जरूरी है।”
रिट्रीव की गई कॉर्निया और ट्रांसप्लांट के लिए सूटेबल कॉर्निया के बीच भी बड़ा गैप
रिट्रीव की गई कॉर्निया और अंततः ट्रांसप्लांटेशन के लिए सूटेबल पाई जाने वाली कॉर्निया के बीच का गैप भी इस चुनौती को दर्शाता है। जानकारी के मुताबिक 2023–24 में भारत में 49,000 से अधिक कॉर्निया रिट्रीव की गईं, जबकि इनमें से लगभग 27,394 कॉर्निया ही ट्रांसप्लांटेशन के लिए सूटेबल पाई गईं।
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि डोनर कॉर्निया की क्वालिटी और यूज़ेबिलिटी बनाए रखने के लिए टाइमली रिट्रीवल बेहद महत्वपूर्ण है।
किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद परिवार को जितनी जल्दी संभव हो आई बैंक से संपर्क करने की सलाह दी जाती है। उचित परिस्थितियों में कॉर्नियल रिट्रीवल आमतौर पर लगभग छह घंटे के भीतर करने का लक्ष्य रखा जाता है। देरी होने पर टिशू क्वालिटी प्रभावित हो सकती है और इससे उसके ट्रांसप्लांटेशन के लिए सूटेबल होने की संभावना कम हो सकती है।
कॉर्नियल ट्रांसप्लांट से कई मरीजों की विज़न रिस्टोर हो सकती है
कॉर्नियल ट्रांसप्लांट उन मरीजों में ऑप्टिकल पाथवे को रिस्टोर कर सकता है, जिनकी विज़न कॉर्नियल स्कारिंग, इंफेक्शन, ट्रॉमा या अन्य बीमारियों के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
लेकिन इस पूरी जर्नी की सफलता ऑपरेटिंग थिएटर से काफी पहले शुरू होती है। यह एक डोनर और उसके परिवार के समय पर लिए गए निर्णय से शुरू होती है।
हमारे सामने आने वाली सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कई पोटेंशियल डोनर्स केवल इसलिए लॉस्ट हो जाते हैं क्योंकि परिवारों को मृत्यु के तुरंत बाद आई बैंक से संपर्क करने की अर्जेंसी के बारे में जानकारी नहीं होती।
आई डोनेशन को बढ़ाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण है टाइमली रिट्रीवल, प्रॉपर टिशू इवैल्यूएशन और हर सूटेबल कॉर्निया का ऑप्टिमल यूटिलाइजेशन सुनिश्चित करना।
कॉर्नियल सर्जरी में नई टेक्निक्स से अधिक टार्गेटेड ट्रीटमेंट संभव
कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन अब कन्वेंशनल फुल-थिकनेस प्रोसीजर्स तक सीमित नहीं है। आज तेजी से सिलेक्टिव और लेयर-स्पेसिफिक टेक्निक्स का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनमें उपयुक्त मामलों में कॉर्निया के केवल प्रभावित हिस्से को रिप्लेस किया जा सकता है।
डॉ. प्रबजोत कौर, सीनियर कंसल्टेंट ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट, डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल, ने कहा,
“कॉर्नियल सर्जरी में हुए एडवांसेस ने अब हमें कॉर्निया की स्पेसिफिक लेयर्स को टार्गेट करके ट्रीटमेंट करने की सुविधा दी है। इससे उपयुक्त रूप से चुने गए मरीजों को अधिक टार्गेटेड ट्रीटमेंट और फास्टर विज़ुअल रिहैबिलिटेशन मिल सकता है।
हालांकि, इन एडवांसेस का बेहतर आउटकम में वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब सूटेबल डोनर टिशू उपलब्ध हो। जैसे-जैसे सर्जिकल टेक्निक्स लगातार विकसित हो रही हैं, क्वालिटी डोनर कॉर्निया तक टाइमली एक्सेस और भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। इस गैप को ब्रिज करना जरूरी है, ताकि ट्रांसप्लांटेशन से लाभ पाने वाले अधिक से अधिक मरीजों तक यह ट्रीटमेंट पहुंच सके।”
डॉ. तितियाल ने आगे कहा,
“भारत में कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन के गैप को कम करने के लिए पूरे इकोसिस्टम में एक्शन की जरूरत है। अधिक अवेयरनेस पैदा करने और टाइमली रिट्रीवल को मजबूत करने से लेकर आई-बैंक इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने और उपलब्ध टिशू के बेहतर यूटिलाइजेशन तक, इस पूरी जर्नी की हर लिंक को मिलकर काम करना होगा। तभी अधिक से अधिक मरीजों को उस ट्रीटमेंट तक पहुंच मिल सकेगी जिसकी उन्हें जरूरत है।”
दिल्ली एनसीआर में 50+ केराटोप्लास्टी प्रोसीजर्स पूरे
इसी दिशा में, डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल ने दिल्ली एनसीआर में 50+ केराटोप्लास्टी प्रोसीजर्स पूरे किए हैं, जो क्षेत्र में स्पेशलाइज्ड कॉर्नियल केयर और विज़न-रिस्टोरिंग ट्रीटमेंट की बढ़ती जरूरत को दर्शाता है।
इन प्रोसीजर्स में इंफेक्शन या ट्रॉमा के बाद कॉर्नियल स्कार्स, एडवांस्ड कॉर्नियल डिज़ीज़, केराटोकोनस और कॉर्निया की क्लैरिटी एवं फंक्शन को प्रभावित करने वाली अन्य कंडीशन्स से जूझ रहे मरीज शामिल रहे हैं।
41वें नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट के तहत अस्पताल ने अवेयरनेस वॉकथॉन का भी आयोजन किया, जिसका उद्देश्य आई डोनेशन को लेकर अवेयरनेस बढ़ाना और टाइमली एक्शन के महत्व को समझाना था, ताकि सूटेबल डोनर कॉर्निया समय पर जरूरतमंद मरीजों तक पहुंच सकें।
डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल के बारे में
अपने बड़े नेटवर्क के अलावा, डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल ऑप्थैल्मिक इनोवेशन में अपने अपने अग्रणी योगदान के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित हैं ।
अस्पताल के क्लिनिशियंस द्वारा कई लैंडमार्क सर्जिकल टेक्निक्स को कॉन्सीव, डेवलप और पहली बार परफॉर्म किया गया है, जिन्हें आज दुनियाभर के ऑप्थैल्मिक सर्जन्स द्वारा प्रैक्टिस किया जाता है।
इनमें शामिल हैं:
- ग्लूड इंट्राऑक्युलर लेंस (ग्लूड आईओएल) सर्जरी – एक एडवांस्ड, स्यूचर-लेस टेक्निक, जिसका उपयोग तब किया जाता है जब नेचुरल कैप्सुलर सपोर्ट मौजूद न हो या कमजोर हो।
- प्री-डेसिमेट्स एंडोथीलियल केराटोप्लास्टी (पीडीईके) – स्यूचर-लेस टेक्निक के माध्यम से कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन में एक महत्वपूर्ण एडवांसमेंट।
- सिंगल-पास फोर-थ्रो (एसएफटी) प्यूपिलोप्लास्टी – बड़े या डैमेज्ड प्यूपिल्स को करेक्ट करने की एक सिक्योर, नॉटलेस मेथड।
- पिनहोल प्यूपिलोप्लास्टी (पीपीपी) – हाइली इरेगुलर कॉर्निया वाले मरीजों में विज़ुअल क्वालिटी को बेहतर करने के लिए डिज़ाइन की गई टेक्निक।
- कॉर्नियल एलोजेनिक इंट्रास्ट्रोमल रिंग सेगमेंट्स (केयर्स) – केराटोकोनस और अन्य कॉर्नियल एक्टेसियाज़ के ट्रीटमेंट के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एडवांस्ड टेक्निक।
अधिक जानकारी के लिए विज़िट करें: डॉ. अग्रवाल्स आई हॉस्पिटल

