
सत्ता को सबसे अधिक डर विरोध से नहीं, उपहास से लगता है। विरोध का जवाब भाषणों, विज्ञापनों और चुनावी सभाओं से दिया जा सकता है, लेकिन व्यंग्य का जवाब देना आसान नहीं होता। व्यंग्य न तलवार उठाता है, न नारे लगाता है, फिर भी वह सत्ता के उस चेहरे को बेनकाब कर देता है जिसे प्रचार की चमक अक्सर छिपा देती है। इसलिए इतिहास गवाह है कि जहां-जहां लोकतंत्र कमजोर हुआ, वहां-वहां सबसे पहले व्यंग्यकारों, कार्टूनिस्टों, लेखकों और कलाकारों की आवाज पर पहरा बैठा।
हाल के दिनों में अभिनेता और व्यंग्यकार शेखर सुमन के कार्यक्रम को लेकर जो चर्चा हुई, उसने एक पुराना सवाल फिर सामने ला दिया है कि क्या हमारी राजनीति व्यंग्य सुनने का लोकतांत्रिक साहस खो रही है? यह सवाल किसी एक सरकार, एक दल या एक नेता तक सीमित नहीं है। सच यह है कि सत्ता में पहुंचते ही लगभग हर दल आलोचना और व्यंग्य को अलग नजर से देखने लगता है। विपक्ष में रहते हुए जो चुटकुले लोकतंत्र की ताकत लगते हैं, वही सत्ता में पहुंचकर असहज करने लगते हैं।

भारत की परंपरा में व्यंग्य कोई विदेशी विचार नहीं है। कबीर ने अपने दोहों में धार्मिक पाखंड और सामाजिक ढोंग पर चोट की। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों को व्यंग्य के माध्यम से सामने रखा। हरिशंकर परसाई ने व्यवस्था की पोल खोली, शरद जोशी ने समाज और राजनीति की विडंबनाओं पर मुस्कुराते हुए प्रहार किया, काका हाथरसी ने हंसी के सहारे सच कहा और जसपाल भट्टी ने टेलीविजन के माध्यम से आम आदमी की पीड़ा को व्यंग्य में बदल दिया। इन सबकी ताकत यही थी कि वे लोगों को हंसाते-हंसाते सोचने पर मजबूर कर देते थे।
लोकतंत्र में व्यंग्य की भूमिका विपक्ष से भी बड़ी होती है। विपक्ष चुनाव हार सकता है, संसद में कम संख्या में हो सकता है, लेकिन व्यंग्य हमेशा जनता के बीच रहता है। वह वहां पहुंच जाता है जहां राजनीतिक भाषण नहीं पहुंच पाते। एक कार्टून, एक संवाद या एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी कई बार हजार पन्नों की रिपोर्ट से ज्यादा असर करती है। यही कारण है कि आत्मविश्वासी लोकतंत्र व्यंग्य से डरता नहीं, उसे अपने स्वास्थ्य का संकेत मानता है।
समस्या तब शुरू होती है जब सत्ता और राष्ट्र को एक मान लिया जाता है। किसी सरकार की आलोचना को देश की आलोचना समझ लिया जाता है। जबकि लोकतंत्र का आधार ही यह है कि सरकारें बदलती हैं, राष्ट्र नहीं। यदि सरकार से सवाल पूछना देशविरोध नहीं है, तो सरकार पर व्यंग्य करना भी लोकतंत्र विरोधी नहीं हो सकता। व्यंग्य असहमति की वह शैली है जो गुस्से को हंसी में बदल देती है। और जो समाज हंसते हुए सवाल पूछना छोड़ देता है, वहां डर धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है।
यह भी सच है कि व्यंग्य की जिम्मेदारी होती है। व्यंग्य और दुष्प्रचार एक चीज नहीं हैं। तथ्यहीन आरोप, व्यक्तिगत अपमान या किसी समुदाय के प्रति घृणा को व्यंग्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन यदि कोई कलाकार, लेखक या प्रस्तोता नीतियों, फैसलों, वादों और राजनीतिक व्यवहार पर चुटकी लेता है, तो उसे लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा माना जाना चाहिए। लोकतंत्र केवल ताली बजाने वालों से नहीं चलता; उसमें हंसते हुए सवाल पूछने वालों की भी जगह होती है।
आज चिंता इस बात की भी है कि व्यंग्य का सार्वजनिक दायरा सिकुड़ता जा रहा है। मीडिया का बड़ा हिस्सा या तो अत्यधिक गंभीर हो गया है या अत्यधिक पक्षधर। मनोरंजन और राजनीतिक व्यंग्य के बीच की वह जगह, जहां आम आदमी अपनी पीड़ा पर हंसकर राहत महसूस करता था, धीरे-धीरे कम होती दिख रही है। जबकि स्वस्थ समाज में व्यंग्य तनाव कम करता है, सत्ता को जमीन पर रखता है और जनता को यह एहसास दिलाता है कि सवाल पूछना अभी भी संभव है।
दिलचस्प बात यह है कि व्यंग्य से असहज केवल सरकारें नहीं होतीं। विपक्ष भी तब तक व्यंग्य का समर्थक रहता है जब तक निशाना सत्ता पर हो। जैसे ही व्यंग्य उसकी ओर मुड़ता है, वही तर्क, वही नाराजगी और वही संवेदनशीलता दिखाई देने लगती है। इसलिए यह बहस किसी एक दल की नहीं, पूरी राजनीतिक संस्कृति की है। क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जो केवल प्रशंसा सुने, या ऐसी राजनीति जो आलोचना और व्यंग्य दोनों सह सके?
दुनिया के मजबूत लोकतंत्रों में नेताओं के कार्टून बनते हैं, कॉमेडी शो में उनकी नकल उतारी जाती है, अखबारों में उन पर कटाक्ष छपते हैं। कई नेता स्वयं उन कार्यक्रमों में जाकर हंसते हैं। यह कमजोरी नहीं, आत्मविश्वास का संकेत है। जो नेता जनता के बीच जाकर अपने ऊपर बने चुटकुले सुन सकता है, वह अक्सर जनता की नाराजगी भी बेहतर ढंग से सुन पाता है।
हमारे यहां भी समय-समय पर ऐसे उदाहरण रहे हैं जब नेताओं ने अपने ऊपर हुए व्यंग्य को सहजता से लिया। लेकिन जैसे-जैसे राजनीति अधिक आक्रामक और ध्रुवीकृत हुई, हास्य भी संदेह की नजर से देखा जाने लगा। हर टिप्पणी के पीछे साजिश खोजने की प्रवृत्ति बढ़ी है। परिणाम यह है कि लोग बोलने से पहले नहीं, हंसने से पहले सोचने लगे हैं।
मुद्दे की बात यह नहीं कि शेखर सुमन ने क्या कहा। मुद्दे की बात यह है कि सत्ता ने उसे किस नजर से देखा। लोकतंत्र में व्यंग्य अपराध नहीं, आईना है। समझदार सरकार आईने को तोड़ती नहीं, उसमें अपना चेहरा देखती है। क्योंकि आईना टूटने से चेहरा नहीं बदलता, केवल सच दिखना बंद हो जाता है l
लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव नहीं, आलोचना होती है; और आलोचना की सबसे कठिन परीक्षा व्यंसत्ता के स्वभाव पर चोट और जिस दिन किसी लोकतंत्र में सच दिखना बंद हो जाए, उस दिन सबसे ज्यादा खतरे में सरकार नहीं, लोकतंत्र होता है।
मुद्दे की बात यह नहीं कि शेखर सुमन ने किस पर व्यंग्य किया। मुद्दे की बात यह है कि सत्ता व्यंग्य को सुनने के लिए कितनी तैयार है। लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव नहीं, आलोचना होती है; और आलोचना की सबसे कठिन परीक्षा व्यंग्य। क्योंकि व्यंग्य नारे नहीं लगाता, आईना दिखाता है। समझदार सरकारें आईने पर मुकदमा नहीं चलातीं, अपने चेहरे पर लगी धूल साफ करती हैं। आखिर आईना तोड़ देने से चेहरा सुंदर नहीं हो जाता।

