भारत का 250 बिलियन डॉलर का संभावित ई-कॉमर्स छोटे व्यापारियों के विनाश का बन सकता है कारण : कैट ने गोयल से मजबूत राष्ट्रीय ई-कॉमर्स नीति का आग्रह किया

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने आज सरकार से आग्रह किया है कि देश के करोड़ों छोटे व्यापारियों, पड़ोस की दुकानों तथा खुदरा व्यापार पर निर्भर करोड़ों कर्मचारियों की आजीविका की सुरक्षा हेतु तत्काल एक मजबूत और प्रभावी राष्ट्रीय ई-कॉमर्स नीति लागू की जाए।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री श्री पीयूष गोयल को भेजे गए एक पत्र में कैट के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद श्री प्रवीन खंडेलवाल ने डेलॉइट और गूगल की संयुक्त रिपोर्ट “द $250 बिलियन कॉमर्स फ्रंटियर” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रिपोर्ट भारत के डिजिटल कॉमर्स बाजार के बड़े विस्तार को दर्शाती है, लेकिन साथ ही निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत सुरक्षा उपायों की तत्काल आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत का ई-कॉमर्स बाजार वर्ष 2019 से 2025 के बीच लगभग 90 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है और वर्ष 2030 तक इसके 250 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक:22 करोड़ नए जेन-ज़ी खरीदार ऑनलाइन बाजार से जुड़ेंगे,जेन-ज़ी उपभोक्ता कुल ऑनलाइन खर्च का 45 प्रतिशत हिस्सा होंगे,15 करोड़ नए खरीदार ऑनलाइन आएंगे,प्रति व्यक्ति ई-कॉमर्स खर्च दोगुना होने की संभावना है,टियर-2 शहरों और छोटे नगरों का हिस्सा पहले ही 60 प्रतिशत से अधिक ऑनलाइन खरीदारों, लगभग आधे कुल खर्च और कुल ऑर्डरों के तीन-पांचवें हिस्से तक पहुंच चुका है
श्री खंडेलवाल ने कहा कि ये आंकड़े भारत के डिजिटल बाजार की विशाल संभावनाओं को दर्शाते हैं। लेकिन यदि इसे बिना नियमन के छोड़ दिया गया तो यही वृद्धि देश की पारंपरिक खुदरा व्यापार व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है, जो आज भी स्वरोजगार और रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है।
कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बी. सी. भरतिया ने आरोप लगाया कि बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां परोक्ष इन्वेंट्री स्वामित्व, पसंदीदा विक्रेता व्यवस्था, निजी ब्रांड और भ्रामक कारोबारी ढांचे के माध्यम से भारत की एफडीआई नीति की भावना का लगातार उल्लंघन कर रही हैं। जिसे मार्केटप्लेस मॉडल की अनुमति दी गई थी, वह अब इन्वेंट्री नियंत्रित मॉडल में बदलता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि प्रिडेटरी प्राइसिंग, कैश बर्निंग के जरिए भारी छूट, डार्क स्टोर्स, डार्क पैटर्न्स, पक्षपातपूर्ण लिस्टिंग और घटिया सामान की बिक्री जैसी प्रवृत्तियां आम हो गई हैं। ये तरीके न केवल प्रतिस्पर्धा विरोधी हैं, बल्कि उन लाखों ईमानदार व्यापारियों को समाप्त कर रहे हैं जिन्होंने विश्वास और सेवा के आधार पर भारत के घरेलू बाजार का निर्माण किया है।
श्री खंडेलवाल ने कहा कि भारत के छोटे खुदरा व्यापारी, किराना स्टोर, थोक व्यापारी, वितरक, परिवहनकर्ता और संबंधित क्षेत्र शहरी तथा ग्रामीण भारत में करोड़ों परिवारों का सहारा हैं। इस व्यवस्था को कमजोर करने के गंभीर आर्थिक और सामाजिक परिणाम होंगे।
उन्होंने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी लगातार आत्मनिर्भर भारत, स्थानीय उद्यमिता और मजबूत घरेलू बाजार की बात करते रहे हैं। विदेशी पूंजी से संचालित ई-कॉमर्स कंपनियों को बाजार विकृत करने और स्थानीय व्यापार को कमजोर करने देना इस राष्ट्रीय दृष्टि के विपरीत है।
कैट ने सरकार से आग्रह किया है कि तत्काल एक व्यापक राष्ट्रीय ई-कॉमर्स नीति लागू की जाए, जिसमें एफडीआई नियमों का सख्त पालन, प्रिडेटरी प्राइसिंग पर रोक, डार्क स्टोर्स का नियमन, एल्गोरिद्म एवं विक्रेता रैंकिंग में पारदर्शिता, डार्क पैटर्न्स से सुरक्षा, नकली एवं घटिया सामान पर जवाबदेही, एमएसएमई एवं छोटे व्यापारियों के लिए समान अवसर, डाटा सुरक्षा तथा व्यापारियों एवं उपभोक्ताओं के लिए समर्पित शिकायत निवारण तंत्र शामिल हो।
श्री खंडेलवाल ने कहा कि भारत तकनीक और नवाचार का स्वागत करता है, लेकिन डिजिटल विकास निष्पक्ष, पारदर्शी और समावेशी होना चाहिए। ई-कॉमर्स को भारत के खुदरा व्यापार का पूरक बनना चाहिए, उसका विनाशक नहीं। भारतीय व्यापार का भविष्य छोटे व्यवसायों की भागीदारी से बनेगा, उनके विस्थापन से नहीं।

