सत्यार्थ प्रकाश’ के सप्तम् समुल्लास पर विशेष व्याख्यान आयोजित

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“वैचारिक नवजागरण से सत्य की खोज तक, आइए साथ चलें,”

नई दिल्ली, 3 सितंबर 2026: हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा महर्षि दयानंद सरस्वती के कालजयी ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर आयोजित 14-व्याख्यानों की श्रृंखला के अंतर्गत सप्तम् समुल्लास पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन 3 सितंबर 2026 को हंसराज कॉलेज में किया गया। व्याख्यान के मुख्य वक्ता डॉ. रामचंद्र, विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र थे। कार्यक्रम में कॉलेज की प्राचार्या प्रो. (डॉ.) रमा की गरिमामयी उपस्थिति रही।


अपने स्वागत एवं आशीर्वचन में प्रो. (डॉ.) रमा ने कहा कि धर्म और सनातन मूल्यों जैसे विषय युवाओं को ऐसे भविष्य के निर्माण की दिशा देते हैं, जो एक सुदृढ़ मूल्य-व्यवस्था पर आधारित हो। उन्होंने कहा कि हंसराज कॉलेज का शैक्षणिक एवं संस्थागत आचरण स्वयं इस मूल्य-परंपरा की सशक्त गवाही देता है। उन्होंने डी.ए.वी. आंदोलन और हंसराज कॉलेज की समृद्ध ऐतिहासिक एवं वैचारिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि इन संस्थानों की स्थापना भारतीय मूल्यों, वैदिक चिंतन और राष्ट्रनिर्माण की दृष्टि से प्रेरित रही है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं वैदिक मंगलाचरण के साथ हुआ। इस अवसर पर डॉ. रामचंद्र ने हंसराज कॉलेज से अपने आत्मीय संबंध को स्मरण करते हुए कहा कि हंसराज का विद्यार्थी होना उनके लिए गौरव का विषय है। उन्होंने महात्मा हंसराज और गुरुदत्त विद्यार्थी के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से स्थापित शैक्षणिक संस्थान केवल शिक्षा के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे एक व्यापक वैचारिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के वाहक भी थे।
उन्होंने कहा कि हंसराज कॉलेज की स्थापना के पीछे जिस वैचारिक परंपरा और मूल्य-दृष्टि का योगदान रहा, उसे ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की वैचारिक परंपरा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इस अर्थ में हंसराज कॉलेज को उस वैदिक एवं सुधारवादी चिंतन की संस्थागत अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसने भारतीय समाज और शिक्षा को नई दिशा देने का प्रयास किया।


यह व्याख्यान ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर केंद्रित 14-व्याख्यानों की श्रृंखला का हिस्सा था, जिसमें इस अवसर पर विशेष रूप से इसके सप्तम् समुल्लास का गहन अध्ययन किया गया। डॉ. रामचंद्र ने सप्तम् समुल्लास के विभिन्न दार्शनिक एवं वैचारिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की। उनका विमर्श ईश्वर के अस्तित्व, धर्म की संकल्पना, विभिन्न संप्रदायों, आस्था, अनुभूति तथा जीव और ब्रह्म के संबंध जैसे महत्वपूर्ण विषयों तक विस्तृत रहा।
डॉ. रामचंद्र ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के नाम और उसके अर्थ पर भी विशेष चर्चा की। उन्होंने ‘सत्य’ और ‘असत्यार्थ’ के बीच अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को केवल अंग्रेजी के “Light to Truth” अथवा “Light of Truth” जैसे सरल अनुवाद से पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस शीर्षक में सत्य के अर्थ, सत्य की खोज और सत्य के प्रकाशन की व्यापक दार्शनिक दृष्टि निहित है।
उन्होंने बताया कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के 14 समुल्लासों की रचना अत्यंत गहन वैचारिक श्रम के साथ की और इस ग्रंथ को पूरा करने में उन्हें तीन महीने से अधिक का समय लगा। उन्होंने कहा कि यह ग्रंथ उस ऐतिहासिक समय में सामने आया जब भारत की शिक्षा-व्यवस्था एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही थी और थॉमस बैबिंगटन मैकॉले तथा तत्कालीन ब्रिटिश शिक्षा-नीति के प्रभाव में भारतीय शिक्षा के स्वरूप और उद्देश्यों में व्यापक बदलाव हो रहे थे।
ईश्वर की अवधारणा पर चर्चा करते हुए डॉ. रामचंद्र ने कहा कि आस्तिक और नास्तिक का प्रश्न केवल बाहरी धार्मिक व्यवहार अथवा धार्मिक प्रथाओं का प्रश्न नहीं है। यह मूलतः अनुभूति और दृष्टि का विषय है, मनुष्य सर्वव्यापी सत्ता को किस प्रकार अनुभव करता है और उसकी उपस्थिति को किस प्रकार ग्रहण करता है। उन्होंने ईश्वर को त्रिकालदर्शी और समय की सीमाओं से परे समझने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने यह भी कहा कि ईश्वर की अवधारणा को मनुष्य की सीमित बौद्धिक क्षमताओं में पूरी तरह बांधना संभव नहीं है। ईश्वर के संबंध में निर्मित अनेक धारणाएँ कहीं न कहीं मानवीय बौद्धिक सीमाओं का प्रतिबिंब या उपलक्षण हो सकती हैं।
सृष्टि और ईश्वर के संबंध की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि ईश्वर को किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति उस व्यवस्था या तंत्र के रूप में समझी जा सकती है जिसके माध्यम से ब्रह्मांड का अस्तित्व और संचालन संभव होता है। इसी संदर्भ में उन्होंने ईश्वर की ‘इच्छा’ और ‘इच्छादन’ जैसी अवधारणाओं को भी स्पष्ट किया तथा बताया कि इन्हें केवल मानवीय या भौतिक इच्छा की सीमाओं में नहीं समझा जाना चाहिए।
सप्तम् समुल्लास के संदर्भ में उन्होंने ईश्वर की अनुभूति के तीन प्रमुख आयाम: प्रार्थना, श्रुति और उपासना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर को केवल एक परिभाषित सत्ता के रूप में जानना पर्याप्त नहीं है; बल्कि ईश्वर के दर्शन और उसकी अनुभूति की दार्शनिक प्रक्रिया को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
जीव और ब्रह्म के संबंध पर चर्चा करते हुए डॉ. रामचंद्र ने स्पष्ट किया कि जीव और ब्रह्म को एक ही सत्ता मान लेना उचित नहीं है। उन्होंने इस विषय को ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की मूल वैचारिक दृष्टि के संदर्भ में समझने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने वेदों और संस्कृत भाषा के प्रश्न पर भी विचार प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, वेदों का संस्कृत में होना केवल किसी विशेष समय और स्थान से संबंधित भाषाई घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संस्कृत के ज्ञानात्मक एवं दार्शनिक स्वरूप को समय और स्थान की सीमाओं से परे समझने की आवश्यकता है।
व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों ने ईश्वर, धर्म, कर्म तथा ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के सप्तम् समुल्लास में इन अवधारणाओं के निरूपण से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे। डॉ. रामचंद्र ने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का विस्तारपूर्वक समाधान किया और उन्हें मूल ग्रंथ के अध्ययन के साथ उसके दार्शनिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों को समझने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम का केंद्रीय संदेश “वैचारिक नवजागरण से सत्य की खोज तक, आइए साथ चलें” रहा। इस व्याख्यान ने विद्यार्थियों को ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के सप्तम् समुल्लास को समझने के साथ-साथ ईश्वर, धर्म, कर्म, आस्था, तर्क और सत्य की खोज जैसे शाश्वत प्रश्नों पर गंभीर वैचारिक संवाद का अवसर प्रदान किया।
कार्यक्रम का आयोजन संस्कृत विभाग, हंसराज कॉलेज द्वारा किया गया। आयोजन में प्रो. सतीश कुमार मिश्र एवं डॉ. खुशबू शुक्ला संयोजक तथा डॉ. प्रशांत सिंह एवं डॉ. राहुल रंजन सह-संयोजक रहे। विद्यार्थियों की सहभागिता और प्रश्नोत्तर सत्र ने कार्यक्रम को विशेष रूप से संवादपरक और सार्थक बनाया।

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