श्यामा प्रशाद मुखर्जी महिला कॉलेज दिल्ली विश्व विद्यालय में दो दिवसीय “भारतीय ज्ञान ओर परम्परा ” पर राष्ट्रीय संगोष्ठी।

नई दिल्ली : श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में आकाशवाणी एवं हिंदुस्तानी भाषा अकादमी के संयुक्त तत्त्वावधान में द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और रामचरितमानस : प्रासंगिकता, वर्तमान संदर्भ और भविष्य की दिशाएँ’ विषय पर आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में पद्म विभूषण श्री भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व महामहिम राज्यपाल महाराष्ट्र एवं गोवा तथा पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखंड, मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सुरेन्द्र दुबे, उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी संस्थान, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार एवं पूर्व कुलपति, विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रो. नरेंद्र मिश्र, हिंदी संकाय मानविकी विद्यापीठ, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली, अध्यक्ष के रूप में प्रो. रमा शर्मा, प्राचार्या, हंसराज महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं संरक्षक के रूप में प्रो. नीलम गोयल, प्राचार्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय कि गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रो. नीलम गोयल ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि रामचरितमानस हमें सामाजिक समरसता की सीख देती है और समाज के अंतिम व्यक्ति को भी मुख्यधारा में जोड़ने का काम करती है। प्रो. नरेंद्र मिश्र ने कहा कि तुलसी एक ऐसे महानायक हैं जो रामराज्य की कल्पना, समन्वय की भावना, सामाजिक समानता की बात करते हैं साथ ही उनके काव्य में जनता के प्रति लोक कल्याण की भावना और पर्यावरण के प्रति गहरी चेतना व्यक्त की गई है। मुख्य अतिथि श्री भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि तुलसी अपने काव्य में मातृशक्ति को प्रधानता देते हैं। तथा उनके यहाँ किसी भी प्रकार का भेदभाव देखने को नहीं मिलता है और इस तरह वे प्राचीन भारतीय परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं। प्रो. सुरेंद्र दुबे ने अपने वक्तव्य में रेखांकित किया कि हमारी ज्ञान परंपरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है बल्कि वह समाज में यथार्थ रूप में उपस्थित है। प्रो. रमा ने रेखांकित किया कि श्री राम हमको चुनौतियों से संघर्ष करना सिखाते हैं, अगर राम वन में नहीं गए होते तो वे भगवान् राम नहीं बन पाते। अतः आज के युवा को राम के जीवन से प्रेरणा लेकर अपना जीवन जीना चाहिए।

संगोष्ठी के प्रथम तकनीकी सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. अवधेश कुमार, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सुधा सिंह, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, सत्र के अध्यक्ष के रूप में प्रो. पूरन चंद टंडन (सेवानिवृत्त) हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय और प्राचार्या प्रो. नीलम गोयल उपस्थित रहीं। प्रो. अवधेश कुमार ने कहा कि तुलसीदास जीवन गाथा के कवि हैं तथा वे रामचरितमानस को त्याग और आदर्श की कथा, लोक और लोकोत्तर की कथा बताते हैं। आगे उन्होंने कहा कि जो तुलसी कि मानस को पढ़ता है उसका मानस सुधर जाता है। प्रो. सुधा सिंह ने संबोधित करते हुए कहा कि रामचरितमानस हमारे लिए एक संजीवनी की तरह है और वह हम सबको प्रभावित करके बेहतर मनुष्य बनाने का काम करती है। प्रो. पूरन चंद टंडन अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में कहते हैं कि रामचरितमानस धर्म और आध्यात्म के साथ साथ साहित्यिकता कि भी रचना है जिसका प्रदेय आज के समय में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
द्वितीय तकनीकी सत्र में मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल, आचार्य, हिंदी एवं तुलनात्मक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. प्रवीण कुमार तिवारी, केंद्रीय शिक्षा संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, वक्ता के रूप में डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, अतिथि प्रवक्ता, भारतीय नाट्य विद्यालय, अध्यक्ष के रूप में प्रो. अनिल राय, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय तथा प्राचार्या प्रो. नीलम गोयल आसीन रहीं। डॉ. राघवेन्द्र मिश्र ने कहा कि रामचरितमानस हमारा एक ऐसा सांस्कृतिक संविधान है जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा के सभी रूप सन्निहित हैं। प्रो. प्रवीण कुमार तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि रामचरितमानस हमारे समाज को कर्तव्यप्रधान समाज बनाने की सीख देता है। प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल ने कहा कि हम सभी के अवचेतन मन में राम की लीला स्थित है और सभी ने अपनी अपनी तरह से राम को देखा है। प्रो. अनिल राय अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहते हैं कि रामचरितमानस एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है वह एक सजग पाठक की दरकार करता है। वे आगे कहते हैं कि तुलसी मानस में अपने समय और समाज का यथार्थ चित्रण करते हैं।

तृतीय तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सुनील बाबुराव कुलकर्णी, निदेशक केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रो. विमलेश कुमार मिश्र, हिंदी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, अध्यक्ष के रूप में प्रो. चंदन चौबे, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय और प्राचार्या प्रो. नीलम गोयल कि गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रो. विमलेश कुमार मिश्र ने कहा कि राम के जीवन में वन (लोक) का बहुत बड़ा महत्त्व है इसलिए भी तुलसी को राम अच्छे लगते हैं। तलसी के यहाँ प्रकृति का सुखद वर्णन मिलता है। प्रो. सुनील बाबुराव कुलकर्णी ने कहा कि तुलसी और लोक एक ही सिक्के के दो पहलु की तरह हैं। तुलसी ने शास्त्र के जटिल ज्ञान को लोक के प्रकाश के माध्यम से सरल बनाया है। प्रो. चंदन चौबे ने संबोधित करते हुए कहा कि भारत की जिजीविषा का एक पाठ तुलसी हैं, आगे उन्होंने कहा कि हम लोगों ने तुलसीदास का एक सामाजिक पाठ अर्जित किया है कि जब जीवन में संकट हो तब भी एक भरोसा बना रहता है।

चतुर्थ तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. राजकुमारी, विभागाध्यक्ष एवं प्राध्यापक हिंदी प्रभारी भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ, उच्च शिक्षा विभाग, मध्य प्रदेश शासन भोपाल, विशिष्ट वक्ता के रूप में मोहम्मद फैज़ खान, संयोजक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, अध्यक्ष के रूप में प्रो. गिरीश्वर मिश्र, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा एवं प्रो. नीलम गोयल, प्राचार्या की गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रो. राजकुमारी ने कहा कि तुलसी ने अपने काव्य के माध्यम से नैतिक शिक्षा का प्रसार किया है। मोहम्मद फैज़ खान ने कहा कि हम सभी को राम के जीवन मूल्यों को अपने जीवन में उतारने कि आवश्यकता है। प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि राम के बराबर कठिन जीवन हमने किसी ने नहीं बिताया और कहा कि हमको अध्यापक के रूप में ऐसा होना चाहिए जिनके पास आने से विद्यार्थी के सारे कष्ट नष्ट हो जाएं।

समापन सत्र में मंच पर विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रो. हेमचंद्र पाण्डे (सेवानिवृत्त), रूसी अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, श्री घनश्याम गुप्ता झवेरी, प्रमुख समाज सेवी, मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सत्यकेतु सांकृत, हिंदी विभाग, अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली और अध्यक्ष के रूप में प्रो. रामनाथ झा, संस्कृत एवं भारतीय अध्ययन संकाय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली एवं प्राचार्या प्रो. नीलम गोयल उपस्थित रहीं। प्रो. हेमचंद्र पाण्डे ने वैश्विक पटल पर रामचरितमानस का महत्त्व और उसके विभिन्न अनुवादों की महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। घनश्याम गुप्ता ने कहा कि राम का दूसरा नाम मर्यादा है और अधिकारों का पालन करना हमको रामचरितमानस सिखाता है। प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने कहा कि रामचरितमानस को जितनी बार पढ़ते हैं उतनी बार नई चीजें सामने आती हैं और कहा कि ज्ञान को आधुनिक ज्ञान से जोड़कर देखा जाना चाहिए। प्रो. रामनाथ झा ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि तुलसी ने रामचरितमानस में स्त्री को एक शक्ति के रूप में देखा है और मानस में सत्य के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। अंत में संगोष्ठी की संयोजक डॉ. विभा नायक ने धन्यवाद ज्ञापन किया। संगोष्ठी में वक्ताओं के साथ साथ आकशवाणी एवं हिंदुस्तानी भाषा अकादमी के सदस्य, विभिन्न महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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