मुद्दों की बात हार गई सत्ता, तो लोकतंत्र ही बदल दो!


आलोक गौड़
नई दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह मानी जाती है कि यहां जनता आख़िरी निर्णायक होती है। चुनाव इसीलिए कराए जाते हैं ताकि लोग अपनी पसंद और नापसंद खुलकर व्यक्त कर सकें। लेकिन भारत की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सत्ता को जनता का फैसला तभी तक स्वीकार है, जब तक परिणाम उसके पक्ष में आएं। जैसे ही जनता, कोई पेशेवर समूह या स्वतंत्र संस्था सत्ता समर्थित चेहरों को नकारती है, पूरी प्रक्रिया ही कटघरे में खड़ी कर दी जाती है। महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल चुनाव विवाद इसी खतरनाक मानसिकता का ताज़ा उदाहरण है।
महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल के चुनाव में भाजपा समर्थित पैनल को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद चुनाव खत्म करने या पूरी प्रक्रिया पर पुनर्विचार की सिफारिश ने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब लोकतंत्र का अर्थ केवल सत्ता समर्थकों की जीत तक सीमित रह गया है? यदि सत्ता समर्थित उम्मीदवार हार जाएं तो चुनाव ही संदिग्ध हो जाएगा? प्रक्रिया ही बदल दी जाएगी? संस्था का ढांचा ही खत्म कर दिया जाएगा?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेडिकल काउंसिल कोई राजनीतिक मंच नहीं है। यह डॉक्टरों की पेशेवर संस्था है, जिसका सीधा संबंध स्वास्थ्य व्यवस्था, चिकित्सा नैतिकता और पेशेवर जवाबदेही से है। डॉक्टरों को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी संस्था का नेतृत्व स्वतंत्र रूप से चुन सकें। लेकिन आज स्थिति यह हो गई है कि हर संस्था पर राजनीतिक कब्जा जमाने की होड़ दिखाई देती है।
पिछले कुछ वर्षों में देश में एक नई राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है। पहले राजनीतिक दल चुनाव हारने के बाद आत्ममंथन करते थे। वे यह समझने की कोशिश करते थे कि जनता ने उन्हें क्यों नकारा। लेकिन अब हार स्वीकार करने की लोकतांत्रिक परंपरा लगभग समाप्त होती जा रही है। अब सत्ता की प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार होती है कि यदि जीते तो लोकतंत्र की जीत, यदि हारे तो प्रक्रिया में खामी, साजिश, गड़बड़ी या फिर पूरी संस्था ही बदल दो।
यही मानसिकता आज लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।
महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल विवाद को केवल एक राज्य या एक चुनाव तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें हर स्वतंत्र संस्था को “सत्ता के अनुकूल” बनाने का प्रयास किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों से लेकर जांच एजेंसियों तक, सांस्कृतिक संस्थाओं से लेकर पेशेवर निकायों तक । हर जगह एक ही कोशिश दिखाई देती है कि नेतृत्व वही संभाले, जो सत्ता के प्रति निष्ठावान हो।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में योग्यता और स्वतंत्रता लगातार कमजोर हो रही हैं। अब किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी योग्यता यह नहीं रह गई कि वह सक्षम है, बल्कि यह हो गई है कि वह सत्ता के कितना करीब है। यही कारण है कि संस्थाएं धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही हैं।
मेडिकल काउंसिल जैसे संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप और भी खतरनाक है। डॉक्टरों की दुनिया का मूल आधार विश्वास और पेशेवर नैतिकता होती है। यदि वहां भी राजनीतिक ध्रुवीकरण शुरू हो जाए तो उसका सीधा असर आम मरीजों पर पड़ेगा। क्योंकि तब निर्णय पेशेवर मानकों के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से प्रभावित होने लगेंगे।
विडंबना यह है कि जो राजनीतिक दल खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते, वही हार मिलने पर सबसे पहले लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने लगते हैं। आखिर सत्ता समर्थित पैनल की हार से इतनी बेचैनी क्यों? क्या डॉक्टरों को अपनी स्वतंत्र राय रखने का अधिकार नहीं है? या फिर यह मान लिया गया है कि हर संस्था में केवल वही लोग बैठेंगे जो सरकार के पक्ष में खड़े हों?
यदि यही मॉडल है, तो फिर चुनाव कराने की आवश्यकता ही क्या है? सीधे नियुक्तियां कर दीजिए। कम से कम लोकतंत्र का दिखावा तो खत्म होगा।
असल संकट यही है कि अब सत्ता को केवल राजनीतिक विरोध से परेशानी नहीं होती, बल्कि संस्थागत स्वतंत्रता से भी असहजता होने लगी है। अदालत कोई ऐसा फैसला दे दे जो सरकार के अनुकूल न हो, तो न्यायपालिका पर सवाल। मीडिया आलोचना कर दे, तो उसे “राष्ट्रविरोधी” बता दो। विश्वविद्यालयों में असहमति उठे, तो फंडिंग रोक दो। पेशेवर संस्थाएं स्वतंत्र निर्णय लें, तो चुनाव प्रक्रिया ही खत्म करने की चर्चा शुरू कर दो।
यह केवल राजनीतिक अधिनायकवाद नहीं, बल्कि संस्थागत नियंत्रण की राजनीति है।
लोकतंत्र केवल संसद और विधानसभा चुनावों का नाम नहीं होता। लोकतंत्र की असली ताकत उन स्वतंत्र संस्थाओं में होती है, जो सत्ता से अलग खड़ी होकर निष्पक्ष निर्णय ले सकें। लेकिन यदि हर संस्था को सत्ता की शाखा में बदल दिया जाएगा, तो फिर लोकतंत्र केवल कागजों में बचेगा।
महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल का मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह एक मानसिकता को उजागर करता है कि “सत्ता हमेशा सही है और जो सत्ता के खिलाफ जाए, उसे बदल दो।” यही मानसिकता लोकतंत्र को धीरे-धीरे खोखला करती है। क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुमत नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान भी होता है।
आज देश में सबसे बड़ा संकट विपक्ष का नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता का है। जब संस्थाएं स्वतंत्र नहीं रहेंगी, तब जनता के अधिकार भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। क्योंकि अंततः लोकतंत्र जनता और सत्ता के बीच संस्थाओं के माध्यम से ही संतुलन बनाए रखता है।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि आम नागरिक धीरे-धीरे इस सबका अभ्यस्त होता जा रहा है। हर नए विवाद पर कुछ दिन शोर होता है, फिर सब सामान्य मान लिया जाता है। लेकिन यही “सामान्यीकरण” लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि जब जनता सवाल पूछना बंद कर देती है, तब सत्ता जवाबदेह रहना भी बंद कर देती है।
महाराष्ट्र का यह विवाद आने वाले समय का संकेत भी है। यदि आज मेडिकल काउंसिल में हार के बाद चुनाव खत्म करने की बात उठ सकती है, तो कल किसी और पेशेवर संस्था, विश्वविद्यालय या निकाय में भी यही मॉडल लागू हो सकता है। धीरे-धीरे हर स्वतंत्र संस्था सत्ता के नियंत्रण में चली जाएगी और लोकतंत्र केवल चुनावी मशीन बनकर रह जाएगा।
लोकतंत्र की असली परीक्षा जीत में नहीं, हार में होती है। जो सत्ता हार सहन नहीं कर सकती, वह अंततः लोकतांत्रिक नहीं रह जाती। क्योंकि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि जनता को चुनने और नकारने दोनों का अधिकार हो। यदि नकारने के अधिकार को ही संदेह की नजर से देखा जाने लगे, तो फिर लोकतंत्र और नियंत्रित व्यवस्था में फर्क क्या रह जाएगा?
महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल का विवाद इसलिए केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चरित्र की परीक्षा है। यह तय करेगा कि देश संस्थाओं की स्वतंत्रता की दिशा में जाएगा या फिर हर संस्था को सत्ता के नियंत्रण में लाने की राह पर आगे बढ़ेगा।
और शायद यही आज की सबसे बड़ी “मुद्दे की बात” है।

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