


भारत मे विकास की राजनीति का एक अनलिखा नियम है। जब सरकार किसी इलाके में सड़क बनाने, हाईवे निकालने, औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने या मास्टर प्लान बदलने की घोषणा करती है, तब सबसे ज्यादा खुशी वहां रहने वाले लोगों को नहीं, बल्कि उन लोगों को होती है जिन्हें यह जानकारी पहले से होती है कि कल का विकास किस दिशा में जाने वाला है। यही वजह है कि इस देश में सड़कें केवल यातायात का साधन नहीं हैं। वह संपत्ति बनाने का सबसे बड़ा माध्यम भी हैं। एक सड़क किसी किसान के खेत को बाजार से जोड़ सकती है, लेकिन वही सड़क किसी निवेशक की जमीन को करोड़ों का बना सकती है। फर्क सिर्फ इतना है कि किसे भविष्य पहले दिखाई देता है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और रिश्तेदारों द्वारा उज्जैन में बड़े पैमाने पर जमीन खरीद को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने इसी पुराने प्रश्न को फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके परिवार, रिश्तेदारों और उनसे जुड़ी कंपनियों ने बड़ी मात्रा में जमीन खरीदी, जिनमें से कई भूखंड ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां नई सड़क परियोजनाएं, हाईवे या भूमि उपयोग परिवर्तन भविष्य में उनकी कीमत बढ़ा सकते हैं।
इस रिपोर्ट पर सरकार और परिवार का पक्ष भी सामने आया है। उनका कहना है कि परिवार वर्षों से रियल एस्टेट कारोबार में है। कई सौदे मुख्यमंत्री बनने से पहले शुरू हुए थे। जमीन खरीदना कोई अपराध नहीं है और किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए व्यापार छोड़ देने के लिए नहीं कहा जा सकता कि उसका कोई रिश्तेदार मुख्यमंत्री बन गया है। यह तर्क अपनी जगह सही है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल केवल कानूनी नहीं होते। कई बार सवाल नैतिक और संस्थागत भी होते हैं।
यही कारण है कि दुनिया भर में “कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट” यानी हितों के टकराव को लेकर इतने कड़े नियम बनाए गए हैं। क्योंकि लोकतंत्र में समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं है। समस्या वह स्थिति भी है जिसमें जनता को यह लगने लगे कि सत्ता और निजी लाभ के बीच की दूरी कम होती जा रही है।
यह पहला मामला नहीं है।

भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे विवादों से भरा पड़ा है। कुछ वर्ष पहले हरियाणा में रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के भूमि सौदों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी थी। आरोप था कि भूमि उपयोग परिवर्तन और प्रशासनिक फैसलों ने कुछ निवेशकों को असाधारण लाभ पहुंचाया। मामला वर्षों तक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना रहा।
महाराष्ट्र में आदर्श सोसायटी विवाद ने दिखाया कि सत्ता, प्रशासन और रियल एस्टेट का गठजोड़ किस तरह सार्वजनिक संसाधनों को निजी लाभ में बदल सकता है।
कर्नाटक में भूमि डी-नोटिफिकेशन को लेकर कई सरकारें सवालों के घेरे में आईं। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे परियोजनाओं के दौरान भी किसानों, बिल्डरों और राजनीतिक प्रभाव के रिश्तों पर लगातार सवाल उठते रहे।
दिलचस्प बात यह है कि इन मामलों में दल अलग-अलग थे। कहीं कांग्रेस थी, कहीं भाजपा, कहीं क्षेत्रीय दल। लेकिन पैटर्न लगभग एक जैसा था। जहां विकास की संभावना होती है, वहां जमीन का खेल शुरू हो जाता है। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
मोहन यादव का मामला सिर्फ मोहन यादव का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें विकास परियोजनाएं और जमीन का बाजार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
कल्पना कीजिए कि किसी गांव की कृषि भूमि की कीमत बीस लाख रुपये प्रति एकड़ है। अचानक वहां से चार लेन सड़क निकलने की योजना बनती है। फिर आसपास आवासीय कॉलोनियों की अनुमति मिलती है। कुछ वर्षों बाद वहां स्कूल, अस्पताल, होटल और व्यावसायिक परिसर खड़े हो जाते हैं। वही जमीन जिसकी कीमत बीस लाख थी, दो करोड़ या पांच करोड़ रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है।
अब सवाल यह नहीं है कि कीमत क्यों बढ़ी। सवाल यह है कि सड़क बनने से पहले जमीन किसने खरीदी? यहीं से राजनीति शुरू होती है।
विकास की जानकारी आज के भारत में सबसे मूल्यवान आर्थिक संसाधनों में से एक है। जिस व्यक्ति को यह पता हो कि शहर किस दिशा में बढ़ेगा, उसके पास बैंक बैलेंस से भी बड़ी पूंजी होती है। इसलिए मास्टर प्लान, भूमि उपयोग परिवर्तन, औद्योगिक कॉरिडोर, नई रेलवे लाइन, एक्सप्रेस-वे और एयरपोर्ट जैसी परियोजनाएं केवल सरकारी फाइलें नहीं होतीं। वह संभावित संपत्ति निर्माण के नक्शे भी होती हैं।
यही कारण है कि दुनिया के विकसित लोकतंत्रों में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों से अतिरिक्त पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और कई यूरोपीय देशों में मंत्री, सांसद और वरिष्ठ अधिकारी अपनी वित्तीय हिस्सेदारी, निवेश और कई मामलों में परिवार के आर्थिक हितों तक की जानकारी सार्वजनिक करते हैं। इसका उद्देश्य किसी को अपराधी घोषित करना नहीं बल्कि जनता का भरोसा बनाए रखना होता है।
भारत में दुर्भाग्य से बहस अक्सर दो चरम सीमाओं पर पहुंच जाती है। एक पक्ष कहता है कि सब कुछ भ्रष्टाचार है। दूसरा पक्ष कहता है कि सब कुछ राजनीतिक साजिश है।
लेकिन लोकतंत्र इन दोनों के बीच कहीं खड़ा होता है।
लोकतंत्र का काम आरोप लगाना नहीं, सवाल पूछना है।
यदि किसी मुख्यमंत्री, मंत्री या उनके परिवार के बड़े भूमि निवेश को लेकर सवाल उठते हैं तो सबसे अच्छा उत्तर राजनीतिक बयान नहीं बल्कि दस्तावेजी पारदर्शिता है।
कौन-सी जमीन कब खरीदी गई? उस समय संबंधित सड़क परियोजना की स्थिति क्या थी? भूमि उपयोग परिवर्तन कब स्वीकृत हुआ?
सरकारी निर्णय और भूमि खरीद के बीच क्या संबंध था? यदि कोई संबंध नहीं था तो उसे तथ्यों के साथ सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? जितनी अधिक पारदर्शिता होगी, उतनी जल्दी संदेह समाप्त होगा।
दुर्भाग्य यह है कि भारत में हितों के टकराव पर गंभीर बहस कभी विकसित ही नहीं हो सकी। चुनावी हलफनामों में संपत्ति का विवरण देना और हितों के टकराव की स्वतंत्र निगरानी करना दो अलग बातें हैं। हमारे यहां पहला तो है, दूसरा लगभग नहीं है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मुख्यमंत्री, मंत्री और शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के परिवारों के बड़े भूमि निवेशों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हों। यदि कोई बड़ा सौदा होता है तो उसकी स्वतः सार्वजनिक सूचना उपलब्ध हो। यदि कोई परियोजना किसी जनप्रतिनिधि या उसके परिवार को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ पहुंचा सकती है तो उसकी स्वतंत्र समीक्षा हो।
यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ अभियान नहीं होगा। यह लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया होगी।
क्योंकि अंततः सवाल मोहन यादव नहीं हैं। कल कोई और मुख्यमंत्री होगा। परसों कोई और सरकार होगी। लेकिन जनता का प्रश्न वही रहेगा कि क्या विकास की सबसे मूल्यवान जानकारी सबको एक साथ मिलती है?
क्या किसान और आम नागरिक भी उतना जानते हैं जितना सत्ता के गलियारों में बैठे लोग जानते हैं?
क्या विकास का लाभ समान अवसर के आधार पर वितरित होता है या फिर कुछ लोग हमेशा शुरुआती कतार में खड़े दिखाई देते हैं?
इन सवालों के उत्तर केवल मध्य प्रदेश को नहीं देने हैं। दिल्ली को भी देने हैं। राजस्थान को भी देने हैं। महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश को भी देने हैं। क्योंकि सड़कें पूरे देश में बन रही हैं। मास्टर प्लान पूरे देश में बदल रहे हैं। और जमीन का बाजार पूरे देश में गर्म है।
विकास पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। सड़कें बननी चाहिए। शहर बढ़ने चाहिए। उद्योग आने चाहिए। रोजगार पैदा होना चाहिए। लेकिन यह भरोसा भी उतना ही जरूरी है कि विकास का लाभ पहले जनता तक पहुंचे, सत्ता के आसपास खड़े विशेष लोगों तक नहीं।
लोकतंत्र में सड़क जनता के पैसे से बनती है। इसलिए जनता को यह अधिकार है कि वह पूछे कि सड़क पहले बनती है या मुनाफा? और जब यह सवाल उठता है तो उसका जवाब किसी विपक्षी दल को नहीं, व्यवस्था को देना पड़ता है।
क्योंकि अंततः जमीन का सवाल संपत्ति का नहीं, जनविश्वास का सवाल होता है। और लोकतंत्र में जनविश्वास से बड़ी कोई पूंजी नहीं होती।

