मुद्दे की बात -राहुल गाँधी अब फैसले लेने नहीं, लागू कराने की राजनीति सीखिए….

स्तम्भ कार-आलोक गौड़, वरिष्ठ सम्पादक,,


आलोक गौड़
नई दिल्ली। कांग्रेस व लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को अब यह समझ लेना चाहिए कि राजनीति केवल संवेदनशील होने से नहीं चलती, बल्कि समय आने पर कठोर होने से चलती है। जनता आपको इसलिए नेता नहीं मानती कि आप सही सोचते हैं, बल्कि इसलिए मानती है कि आप सही सोच को जमीन पर उतारने का साहस रखते हैं। कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या आज भाजपा नहीं है। असली समस्या पार्टी के भीतर बैठे वह नेता हैं जिन्होंने वर्षों से कांग्रेस को अपनी निजी जागीर बना रखा है।


तमिलनाडु की राजनीति ने आपको एक बड़ा अवसर दिया था। अभिनेता विजय का उभार केवल फिल्मी लोकप्रियता नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक मानस का संकेत है। वहां की जनता पारंपरिक राजनीति से ऊब रही है और नए विकल्प तलाश रही है। आपने शायद इस हवा को समय रहते पहचान भी लिया था। लेकिन सवाल यह है कि जब आपको एहसास था कि विजय के साथ तालमेल कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है, तो फिर आपने अपनी ही पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं को रास्ता रोकने क्यों दिया?
यही आपकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी बनती जा रही है। आप सही दिशा पकड़ लेते हैं, लेकिन अपनी पार्टी के भीतर बैठे दरबारियों के सामने ठहर नहीं पाते। याद रखिए, जो नेता अपनी पार्टी नहीं चला सकता, वह देश चलाने का भरोसा भी आसानी से नहीं जीत पाता। राजनीति में कई बार कठोर फैसले लेने पड़ते हैं और उससे भी ज्यादा जरूरी होता है उन फैसलों को लागू कराना।
कांग्रेस को आज सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा ने नहीं पहुंचाया, बल्कि उन नेताओं ने पहुंचाया है जो हर बदलाव से डरते हैं। जिनकी राजनीति केवल टिकट, पद और गुटबाजी तक सीमित है। ऐसे लोग हर उस चेहरे से घबराते हैं जो जनता के बीच लोकप्रिय हो सकता है। उन्हें डर रहता है कि कहीं नई राजनीति आने से उनकी दुकान बंद न हो जाए। और दुर्भाग्य यह है कि कांग्रेस नेतृत्व वर्षों से ऐसे लोगों को ढोता आ रहा है।
राहुल गांधी, अब आपको तय करना होगा कि आप कांग्रेस चलाना चाहते हैं या कांग्रेस के भीतर बैठे समूहों को खुश रखना चाहते हैं। दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते। अगर हर फैसले से पहले आपको यह सोचना पड़े कि कौन नेता नाराज होगा, कौन गुट असंतुष्ट होगा, तो फिर कांग्रेस कभी पुनर्जीवित नहीं होगी। इतिहास गवाह है कि बड़े राजनीतिक बदलाव हमेशा मजबूत और कभी-कभी असुविधाजनक फैसलों से आते हैं।
केरल आपके लिए अगली परीक्षा है। वहां नेतृत्व चयन करते समय यदि आपने फिर वही “सबको साथ लेकर चलने” वाली मजबूरी दिखाई, तो नुकसान तय है। हर राज्य में समझौते की राजनीति पार्टी को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। आपको अब चेहरों का नहीं, परिणामों का मूल्यांकन करना होगा। जो नेता जनता के बीच संघर्ष नहीं कर सकता, उसे केवल वरिष्ठता के आधार पर पार्टी की कमान नहीं मिलनी चाहिए।
आप बार-बार लोकतंत्र बचाने की बात करते हैं। लेकिन पार्टी के भीतर भी लोकतांत्रिक जवाबदेही जरूरी है। लगातार हारने वालों से सवाल पूछिए। जिन नेताओं के क्षेत्र में कांग्रेस खत्म हो गई, उनसे जवाब मांगिए। जो नेता केवल टीवी डिबेट में सक्रिय हैं लेकिन जमीन पर गायब हैं, उन्हें आईना दिखाइए। राजनीति में करुणा अच्छी बात है, लेकिन अति-करुणा संगठन को कमजोर बना देती है।
आज कांग्रेस को भाषणों से ज्यादा अनुशासन चाहिए। यात्राओं से ज्यादा संगठन चाहिए। और सबसे ज्यादा चाहिए ऐसा नेतृत्व जो यह संदेश दे सके कि पार्टी हित से बड़ा कोई नेता नहीं है। यदि आप यह नहीं कर पाए, तो कांग्रेस में हर नया प्रयोग पुराने नेताओं की भेंट चढ़ता रहेगा।
यह समय लोकप्रिय होने का नहीं, निर्णायक बनने का है। आपको अपने दिल की सुननी होगी, लेकिन उससे भी ज्यादा अपने राजनीतिक विवेक की। क्योंकि अगर आपने अब भी कठोर फैसले लेने से परहेज किया, तो कांग्रेस में वही लोग बचे रहेंगे जिन्होंने पार्टी को इस हालत तक पहुंचाया है।
और तब इतिहास यह नहीं पूछेगा कि राहुल गांधी की मंशा क्या थी। इतिहास केवल यह देखेगा कि जब कार्रवाई का समय आया, तब उन्होंने किया क्या।

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