मुद्दे की बात :-पेट्रोल टैंक में प्रयोग:-लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-आलोक गौड़

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सरकारें नीतियां बनाती हैं। वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं। जनता भरोसा करती है। लोकतंत्र का यही क्रम है। लेकिन अगर सरकार खुद सर्वोच्च न्यायालय में यह कहे कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अभी “प्रयोग के स्तर” पर है और उसके नतीजे अगले साल सामने आएंगे, तो सवाल यह नहीं रह जाता कि इथेनॉल अच्छा है या बुरा। सवाल यह है कि आखिर यह प्रयोग हो किस पर रहा है?
प्रयोगशाला में रखी मशीनें शिकायत नहीं करतीं। लेकिन करोड़ों लोगों की गाड़ियां करती हैं। प्रयोगशाला का कोई नमूना ईएमआई नहीं भरता, लेकिन मध्य वर्ग भरता है। प्रयोगशाला का कोई इंजन खराब होने पर अपनी जेब नहीं ढीली करता, लेकिन आम आदमी हर सर्विस, हर मरम्मत और हर स्पेयर पार्ट का बिल अपनी मेहनत की कमाई से चुकाता है। इसलिए जब सरकार और जनता के बीच “प्रयोग” शब्द आता है, तो उसके साथ जवाबदेही भी आनी चाहिए।


इथेनॉल मिश्रण के पीछे सरकार के उद्देश्य महत्वपूर्ण बताए जाते हैं l जिनमें शामिल हैं तेल आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों को लाभ पहुंचाना और पर्यावरणीय सुधार। इन उद्देश्यों पर बहस नहीं की जा सकती है। बहस इस बात पर है कि अगर नीति के प्रभावों का पूरा आकलन अभी होना बाकी है, तो क्या करोड़ों वाहन मालिकों को पर्याप्त जानकारी, पारदर्शिता और भरोसा दिया गया है?
हमारे यहां मध्य वर्ग का दुर्भाग्य यह है कि वह हर सरकारी प्रयोग का सबसे सुविधाजनक साझेदार बन जाता है। वह सबसे अधिक टैक्स देता है, सबसे कम सब्सिडी पाता है और जब कोई नई व्यवस्था लागू होती है, तो उसका पहला असर भी उसी पर पड़ता है। सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं, लेकिन प्रयोग का स्थायी विषय वही रहता हैl आम नागरिक।
सरकार अदालत में कहती है कि परिणाम अगले साल पता चलेंगे। लेकिन तब तक अगर किसी वाहन मालिक को अतिरिक्त रखरखाव का खर्च उठाना पड़े, अगर उसे अपने वाहन के प्रदर्शन को लेकर चिंता हो, अगर उसके मन में सवाल उठें, तो क्या उन्हें केवल “अफवाह” कहकर खारिज कर देना पर्याप्त होगा? लोकतंत्र में भरोसा आदेश से नहीं, संवाद और पारदर्शिता से बनता है।
विडंबना यह भी है कि देश में किसी दवा को बाजार में लाने से पहले वर्षों तक परीक्षण किए जाते हैं। किसी मशीन को प्रमाणन से गुजरना पड़ता है। लेकिन जब बात करोड़ों वाहनों और करोड़ों उपभोक्ताओं की हो, तो सरकार स्वयं कहती है कि अंतिम नतीजे अभी आने बाकी हैं। यह स्थिति कम से कम गंभीर सवाल तो खड़े करती ही है।
मुद्दा इथेनॉल का नहीं है, मुद्दा शासन के तरीके का है। यदि कोई नीति सफल होती है तो उसका श्रेय सरकार लेती है। लेकिन यदि उससे जुड़े जोखिम या दुष्प्रभाव सामने आते हैं, तो उनका बोझ कौन उठाएगा? क्या उसकी कीमत भी वही नागरिक चुकाएगा जिसने पहले ही टैक्स देकर व्यवस्था को चलाया है?
लोकतंत्र में जनता मतदाता भी है और हितधारक भी। उसे यह जानने का अधिकार है कि जिस ईंधन को वह रोज़ खरीद रही है, उसके बारे में सरकार के पास कितनी निश्चित जानकारी है और कितनी संभावनाएं अभी परीक्षण के दौर में हैं। नीति का उद्देश्य जितना बड़ा हो, उतनी ही बड़ी उसकी जवाबदेही भी होनी चाहिए।
मुद्दे की बात यह है कि लोकतंत्र में प्रयोगशाला सरकार की हो सकती है, लेकिन प्रयोग की वस्तु जनता नहीं हो सकती। अगर जनता की जेब, उसकी गाड़ी और उसका भरोसा ही हर बार परीक्षण की कीमत चुकाएंगे, तो फिर यह प्रयोग नहीं, एकतरफा जोखिम है। शासन की असली परीक्षा नई नीति बनाने में नहीं, उसके हर परिणाम की जिम्मेदारी लेने में होती है।

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