
नई दिल्ली l पश्चिम बंगाल में ईद और कुर्बानी को लेकर सरकार द्वारा जारी किए गए नए आदेशों को जिस तरह प्रचारित किया गया, उससे साफ था कि मकसद सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देना भी था। एक बार फिर वही पुराना फार्मूला आजमाया गया कि धर्म को हवा दो, भावनाओं को भड़काओ, समाज को बांटो और असली मुद्दों से जनता का ध्यान हटा दो।
लेकिन इस बार मामला थोड़ा उल्टा पड़ गया। जिन लोगों को लगा था कि इस फैसले से मुसलमानों पर दबाव बनेगा, वही अब बेचैन दिखाई दे रहे हैं। “बायकाट काऊ बाइंग” अभियान ने अचानक पूरे बाजार का संतुलन बिगाड़ दिया। कोलकाता की नाखोदा मस्जिद से अपील हुई और बड़ी संख्या में लोगों ने गाय खरीदने से दूरी बना ली। नतीजा यह हुआ कि सबसे बड़ी चोट उन हिन्दू पशु व्यापारियों पर पड़ी जिनका कारोबार वर्षों से इसी लेन-देन पर टिका था।

यानी राजनीति ने फिर वही किया जो वह अक्सर करती है कि लड़ाई किसी और के नाम पर शुरू होती है, लेकिन सबसे पहले मरता आम आदमी है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि यहां हर आर्थिक संकट को धार्मिक चश्मे से देखने की आदत डाल दी गई है। बाजार मंदा हो, व्यापार टूटे, रोजगार खत्म हो, छोटे कारोबारी बर्बाद होंl इन पर गंभीर चर्चा नहीं होगी। लेकिन अगर किसी मुद्दे में हिन्दू-मुसलमान का एंगल निकल आए, तो पूरा सिस्टम सक्रिय हो जाएगा। टीवी चैनल चीखेंगे, सोशल मीडिया पर जहर बहेगा और नेता अपने-अपने वोट बैंक मजबूत करने निकल पड़ेंगे।
सवाल यह है कि आखिर कब तक? क्या देश की राजनीति का स्तर अब इतना नीचे गिर चुका है कि उसे जनता के पेट से ज्यादा दिलों में नफरत भरने की चिंता है? क्या सरकारों का काम समाज को जोड़ना नहीं रह गया? क्या अब हर त्योहार, हर परंपरा और हर सामाजिक व्यवहार को राजनीतिक हथियार बना दिया जाएगा?
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग इस राजनीति पर सबसे ज्यादा तालियां बजाते हैं, नुकसान भी अंततः उन्हीं का होता है। हिन्दू पशु व्यापारी आज इसलिए परेशान हैं क्योंकि बाजार ने उन्हें एक सच्चाई याद दिला दी कि धर्म से राजनीति चल सकती है, लेकिन व्यापार नहीं। कारोबार भरोसे पर चलता है, स्थिरता पर चलता है, सामाजिक संतुलन पर चलता है। जब राजनीति समाज को लगातार तनाव में रखेगी तो उसका असर सीधे अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा ही।
पिछले कुछ वर्षों में देश में जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया गया है जिसमें जनता असली सवाल भूल जाए। उसे कभी मंदिर-मस्जिद में उलझाओ, कभी खानपान में, कभी कपड़ों में, कभी त्योहारों में। ताकि वह यह न पूछ सके कि युवाओं को नौकरी क्यों नहीं मिल रही? किसान कर्ज में क्यों डूब रहा है? महंगाई से घर क्यों टूट रहे हैं? और छोटे व्यापारी धीरे-धीरे बाजार से गायब क्यों हो रहे हैं?
क्योंकि सत्ता जानती है कि बेरोजगार युवक अगर धर्म की बहस में उलझा रहेगा तो रोजगार नहीं मांगेगा। महंगाई से परेशान परिवार अगर सोशल मीडिया की नफरत में व्यस्त रहेगा तो सरकार से हिसाब नहीं पूछेगा। यही इस राजनीति की असली ताकत है।
पश्चिम बंगाल की यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने दिखा दिया कि नफरत की राजनीति हमेशा एकतरफा फायदा नहीं देती। कई बार उसका वार वहीं जाकर लगता है जहां से तालियां बज रही होती हैं।
आज पशु व्यापारी परेशान हैं। कल कोई दूसरा वर्ग होगा। क्योंकि नफरत कभी स्थायी मित्र नहीं होती। वह सिर्फ इस्तेमाल करती है। और जिस दिन राजनीति बाजार को धर्म के तराजू पर तौलने लगे, उस दिन समझ लेना चाहिए कि देश लोकतंत्र से ज्यादा भीड़तंत्र की तरफ बढ़ रहा है।
“मुद्दे की बात” यही है कि समाज अगर लगातार धार्मिक तनाव में जीने लगे तो सबसे पहले उसकी अर्थव्यवस्था मरती है, फिर भरोसा टूटता है और अंत में इंसानियत हार जाती है।


