
आम आदमी सरकार को टैक्स देता है, बिजली का बिल भरता है, बैंक की किस्त चुकाता है और एक दिन की देरी हो जाए तो उसे ब्याज और जुर्माना दोनों देना पड़ता है। लेकिन सरकारी कंपनियों का हिसाब कुछ अलग ही दिखाई देता है। वहां करोड़ों-अरबों रुपये की वसूली का मामला वर्षों तक फाइलों में पड़ा रह सकता है और किसी को इसकी जल्दी नहीं होती।
बीएसएनएल से जुड़ी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट इसी सरकारी कार्यप्रणाली का एक और आईना है। कैग के मुताबिक मई 2014 से मार्च 2024 के बीच रिलायंस जियो द्वारा बीएसएनएल के निष्क्रिय दूरसंचार ढांचे के इस्तेमाल के दौरान अतिरिक्त तकनीक के लिए करीब 1,757.76 करोड़ रुपए का शुल्क नहीं वसूला गया। इसके ऊपर दंडात्मक ब्याज भी बनता था। यहां सबसे बड़ा सवाल रकम का नहीं, सरकारी तंत्र की नींद का है।

बीएसएनएल और रिलायंस जियो के बीच मास्टर सर्विस एग्रीमेंट था। उसमें इस्तेमाल की शर्तें थीं और शुल्क का प्रावधान भी था। फिर भी दस साल तक बिलिंग नहीं हुई। और मामला ऐसा भी नहीं था कि बीएसएनएल को इसकी जानकारी ही नहीं थी। कैग के मुताबिक जनवरी 2019 में बीएसएनएल के कॉरपोरेट कार्यालय ने स्पष्ट कर दिया था कि एफडीडी और टीडीडी अलग-अलग तकनीकें हैं और अतिरिक्त तकनीक के इस्तेमाल पर शुल्क लिया जाना चाहिए। यानी जानकारी सामने आ चुकी थी। नियम समझ में आ चुके थे। फिर भी वसूली आगे नहीं बढ़ी। अगस्त 2020 में समिति बनी। समिति को जांच कर सिफारिश करनी थी। लेकिन उसकी सिफारिश अक्टूबर 2023 में आई। यानी सरकारी फाइल को निर्णय तक पहुंचने में तीन साल से ज्यादा लग गए।
सवाल है कि जिस पैसे की वसूली का अधिकार सरकारी कंपनी के पास था, उसकी निगरानी कौन कर रहा था? और यह अकेला मामला नहीं है। कैग ने बीएसएनएल की बिलिंग व्यवस्था में 14 सर्किलों में बढ़ी हुई दर लागू न किए जाने से 44.87 करोड़ रुपए कम बिलिंग भी पकड़ी। इसमें से 15.87 करोड़ रुपए ऑडिट के बाद वसूल किए गए, जबकि करीब 29 करोड़ रुपए मार्च 2024 तक बकाया था। रिपोर्ट में 80.64 करोड़ रुपए की ऐसी पीआईजेएफ केबल का मामला भी है जो इस्तेमाल में नहीं आ सकीं। लाइसेंस फीस और जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़े मामलों को मिलाकर कैग ने कुल 1,944.92 करोड़ रुपए की वित्तीय क्षति की ओर इशारा किया है।
सरकार का पक्ष है कि 1,757.76 करोड़ रुपए का कैग आकलन समझौते की एक शर्त की गलत व्याख्या पर आधारित है। सरकार के अनुसार संशोधित इनवॉयस जारी किए जा चुके हैं और वास्तविक राजस्व नुकसान नहीं हुआ।
ठीक है। सरकार की बात सही हो सकती है। लेकिन तब भी सवाल खत्म नहीं होता, बल्कि और बड़ा हो जाता है। अगर वाकई कोई नुकसान नहीं हुआ तो दस साल तक बिलिंग को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों चलता रहा? बीएसएनएल को अपने ही समझौते की शर्त समझने में इतने साल क्यों लगे? 2019 में कॉरपोरेट कार्यालय की स्थिति स्पष्ट होने के बाद भी 2023 तक समिति की सिफारिश का इंतजार क्यों करना पड़ा?
और अगर कैग की आपत्ति सही है तो फिर 1,757 करोड़ रुपए की वसूली में दस साल की देरी के लिए जिम्मेदार कौन है?
यही “मुद्दे की बात” है।
सरकारी कंपनी का पैसा किसी अधिकारी की निजी जेब से नहीं आता। वह जनता के पैसे से चलती है। इसलिए उसकी हर बिलिंग, हर अनुबंध और हर वसूली पर उतनी ही सख्ती होनी चाहिए जितनी आम नागरिक से पैसा वसूलते समय दिखाई जाती है।
दुर्भाग्य यह है कि आम आदमी के लिए व्यवस्था की घड़ी हमेशा तेज चलती है, लेकिन सरकारी धन की वसूली के मामले में वही घड़ी अक्सर सुस्त पड़ जाती है। देर से टैक्स भरो तो जुर्माना। बिजली का बिल देर से भरो तो सरचार्ज। कर्ज की किस्त देर से भरो तो ब्याज।
लेकिन सरकारी कंपनी को हजारों करोड़ की संभावित देनदारी दिखाई दे और वह वर्षों तक बिल ही न बनाए तो सवाल पूछने वाला कौन? कैग ने सवाल पूछ लिया है। अब सरकार को जवाब देना चाहिए।
सिर्फ यह नहीं कि पैसा आखिरकार वसूला गया या नहीं। असली जवाब यह होना चाहिए कि दस साल तक व्यवस्था सोती क्यों रही? किस स्तर पर निगरानी विफल हुई? किन अधिकारियों ने कार्रवाई नहीं की? और क्या किसी की जवाबदेही तय हुई?
क्योंकि 1,757 करोड़ रुपए केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उस सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल है, जिसे जनता के पैसे का चौकीदार बनाया गया है। चौकीदार अगर दस साल तक सोता रहे तो सवाल चोरी का ही नहीं, चौकीदार की जवाबदेही का भी होता है।

