

– देश के मुख्य न्यायधीश सूर्यकांत युवाओं को कॉकरोच बता रहें l उनकी नजर में जेन जी की यही कीमत है l उनके इस बयान के बाद प्रसिद्ध अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे तिलमिला कर सत्ता समर्थक भले ही शोर मचा रहे हों, लेकिन अगर उनके शब्दों को भावनाओं से हटकर समझा जाए तो वे इस दौर की सबसे कड़वी सच्चाई बयान करते दिखाई देते हैं।
उन्होंने लोगों से कहा कि सड़कों पर उतरना पड़ेगा, लाठियाँ खानी पड़ेंगी, जेल जाना पड़ेगा। सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इससे अलग रहा है? क्या आज़ादी की लड़ाई अदालतों के वातानुकूलित कमरों में जीती गई थी? क्या आपातकाल के खिलाफ लड़ाई केवल सोशल मीडिया पोस्ट लिखकर लड़ी गई थी?
सच यह है कि जब सत्ता जनता की आवाज़ सुनना बंद कर देती है, तब सड़क ही लोकतंत्र की आख़िरी अदालत बनती है।
आज देश का एक बड़ा वर्ग, खासकर जेनरेशन ज़ेड, भीतर ही भीतर गुस्से से भरा हुआ है। बेरोज़गारी रिकॉर्ड स्तर पर है, परीक्षाओं के पेपर लीक हो रहे हैं, महंगाई ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार सिकुड़ रही है और सरकार की आलोचना को “राष्ट्रविरोध” बताने का फैशन बना दिया गया है।
युवा देख रहा है कि संसद में बहस कम और शोर ज्यादा है। एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह होता दिखाई देता है। विपक्ष कमज़ोर है, मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता के सामने नतमस्तक दिखता है और संस्थाओं की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में अगर कोई कहता है कि “सिर्फ चुनाव से बदलाव संभव नहीं दिख रहा”, तो उस बेचैनी को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को जनादेश मिला है, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं होता। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि जनता को विरोध करने, सवाल पूछने और असहमति जताने का वास्तविक अधिकार मिले, वह भी बिना डर, बिना प्रतिशोध और बिना दमन के।
दरअसल सत्ता समर्थक हर विरोध को “अराजकता” कहकर खारिज करना चाहते हैं। किसान आंदोलन हुआ उसे अराजकता बताया गया l छात्र आंदोलन हुआ उसे भी अराजकता के सांचे में फिट कर दिया गया l बेरोज़गार युवाओं ने अपने हक़ की आवाज़ उठाई तो सरकार की नजर में यह भी अराजकता थी । पत्रकार सवाल पूछे तो वह भी अराजक। यानी सरकार के पक्ष में बोलो तो राष्ट्रवाद, खिलाफ बोलो तो देशद्रोह!
प्रशांत भूषण का बयान इसलिए लोगों को चुभ रहा है क्योंकि वह इस दौर की बेचैनी को शब्द देता है। उन्होंने हिंसा की नहीं, संघर्ष की बात की है। लोकतांत्रिक आंदोलनों में जेल जाना, लाठी खाना और सत्ता से टकराना हमेशा से प्रतिरोध की राजनीति का हिस्सा रहा है।
असल खतरा सड़क पर उतरती जनता नहीं है बल्कि असली खतरा वह व्यवस्था है जहाँ जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ अब वोट देने के बाद कहीं सुनी ही नहीं जाती है ।
और इतिहास गवाह है कि जब लोकतंत्र केवल चुनावी मशीन बनकर रह जाता है, तब सड़कों पर उठने वाली आवाज़ें ही बदलाव की शुरुआत लिखती हैं।

