

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अब चिंता सिर्फ विपक्ष या सरकार विरोधी खेमे तक सीमित नहीं रह गई है। पिछले कुछ समय में जिन अर्थशास्त्रियों ने गंभीर चेतावनियां दी हैं, उनमें कई ऐसे नाम शामिल हैं जिन्हें लंबे समय तक मोदी सरकार की आर्थिक सोच के समर्थक या उसके करीब माना जाता रहा है।
पहले सुरजीत भल्ला ने आर्थिक चुनौतियों की ओर संकेत किया। फिर पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने विकास मॉडल की कमजोरियों पर सवाल उठाए। और अब कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने कहा है कि देश गंभीर आर्थिक संकट की तरफ बढ़ रहा है और अगर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो हालात सरकार के नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं।

इन बयानों को सामान्य राजनीतिक टिप्पणी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। क्योंकि यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि चेतावनी दी गई है, बल्कि यह है कि चेतावनी कहां से आ रही है।
जब किसी सरकार के आलोचक सवाल उठाते हैं तो सत्ता उसे राजनीति कहकर टाल देती है। लेकिन जब उसके अपने माने जाने वाले लोग ही आर्थिक हालात पर चिंता जताने लगें, तो यह संकेत कहीं अधिक गंभीर हो जाता है।
यहीं से वह बहस शुरू होती है जिससे सरकार लंबे समय तक बचती रही—क्या भारतीय अर्थव्यवस्था की चमक वास्तविक है या उसका बड़ा हिस्सा केवल एक आक्रामक राजनीतिक नैरेटिव के सहारे खड़ा किया गया है?
पिछले एक दशक में देश में विकास की एक भव्य तस्वीर बनाई गई। बड़े-बड़े मंचों से कहा गया कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। पांच ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का सपना दिखाया गया। “अमृतकाल”, “विश्वगुरु” और “न्यू इंडिया” जैसे राजनीतिक शब्द आर्थिक विमर्श का हिस्सा बना दिए गए।
टीवी चैनलों ने इसे और चमकदार बनाया। ऐसा माहौल तैयार किया गया मानो भारत में आर्थिक क्रांति आ चुकी हो। लेकिन किसी भी अर्थव्यवस्था की असली परीक्षा टीवी स्टूडियो में नहीं, आम आदमी की जिंदगी में होती है।
अगर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है तो फिर बेरोजगारी सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकट क्यों बनी हुई है?
अगर हालात इतने शानदार हैं तो फिर लाखों युवा छोटी-सी सरकारी नौकरी के लिए वर्षों तक संघर्ष क्यों कर रहे हैं?
अगर विकास नीचे तक पहुंच रहा है तो फिर मध्यम वर्ग की बचत लगातार क्यों घट रही है?
इन सवालों का जवाब सिर्फ आंकड़ों से नहीं दिया जा सकता।
असल समस्या यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था में ऊपर दिखाई देने वाली चमक और नीचे महसूस होने वाली सच्चाई के बीच दूरी लगातार बढ़ती गई।
एक तरफ शेयर बाजार नई ऊंचाइयों पर पहुंचता रहा।
दूसरी तरफ आम आदमी की रसोई महंगी होती गई।
एक तरफ बड़े उद्योग समूहों की संपत्ति बढ़ती रही।
दूसरी तरफ छोटे कारोबार बंद होते गए।
एक तरफ विदेशी मंचों पर भारत की आर्थिक शक्ति की चर्चा होती रही।
दूसरी तरफ करोड़ों युवा नौकरी की तलाश में भटकते रहे।
यही विरोधाभास अब धीरे-धीरे उन लोगों को भी दिखाई देने लगा है जो कभी इस मॉडल के सबसे बड़े समर्थक माने जाते थे।
दरअसल अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी और असुरक्षा की भावना है। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। इसे कभी देश की सबसे बड़ी ताकत कहा गया था। लेकिन आज वही युवा सबसे ज्यादा बेचैन दिखाई देता है।
सरकारी भर्तियां वर्षों तक लटकती रहती हैं।
कई विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं।
निजी क्षेत्र में स्थायी रोजगार घट रहा है।
कॉन्ट्रैक्ट और आउटसोर्सिंग का मॉडल तेजी से बढ़ रहा है।
स्थिति यह है कि लाखों पढ़े-लिखे युवा अपनी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण समय सिर्फ परीक्षाओं, रिज़ल्ट और भर्ती प्रक्रिया के इंतजार में गुजार रहे हैं।
रेलवे की कुछ हजार नौकरियों के लिए करोड़ों आवेदन आते हैं।
पुलिस भर्ती के लिए लाखों युवक लाइन में लगते हैं।
छोटी-सी सरकारी नौकरी आज जीवन सुरक्षा की आखिरी उम्मीद बन चुकी है।
क्या यह किसी मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत है?
अगर देश में पर्याप्त अवसर होते तो क्या करोड़ों युवा एक ही नौकरी के पीछे इस तरह टूट पड़ते?
मध्यम वर्ग की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। यही वह वर्ग था जिसने सबसे ज्यादा उम्मीदें लगाई थीं। यही वर्ग हर कठिन आर्थिक फैसले के समय सरकार के साथ खड़ा दिखाई दिया। लेकिन आज वही वर्ग सबसे ज्यादा दबाव में है।
महंगाई ने उसकी कमर तोड़ दी है।
स्कूल फीस लगातार बढ़ रही है।
अस्पताल का खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
पेट्रोल, गैस, बिजली और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें लगातार बढ़ी हैं।
लेकिन आमदनी उसी गति से नहीं बढ़ी।
नतीजा यह हुआ कि करोड़ों परिवार अब “सपने” नहीं बल्कि “बचाव” की मानसिकता में जी रहे हैं।
कहीं नौकरी बची रहे।
कहीं बीमारी न आ जाए।
कहीं बच्चों की पढ़ाई न रुक जाए। कहीं ईएमआई डिफॉल्ट न हो जाए। यह डर किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक होता है। क्योंकि जब जनता खर्च करने से डरने लगे तो बाजार कमजोर पड़ने लगता है। मांग घटती है, उत्पादन प्रभावित होता है और रोजगार के अवसर और कम होने लगते हैं। यही कारण है कि अर्थशास्त्री लगातार मांग और रोजगार को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हालत भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। खेती की लागत लगातार बढ़ी है लेकिन किसानों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। डीजल महंगा, खाद महंगी, बीज महंगे, बिजली महंगी—लेकिन फसल का लाभकारी मूल्य अब भी विवाद का विषय बना हुआ है।
किसान बाजार, मौसम और नीतिगत अस्थिरता के बीच फंसा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में खरीद क्षमता कमजोर पड़ना इसी व्यापक संकट का हिस्सा माना जा रहा है।
छोटे और मझोले उद्योगों की स्थिति भी गंभीर है। यही क्षेत्र देश में सबसे ज्यादा रोजगार पैदा करता है। लेकिन नोटबंदी, जटिल जीएसटी व्यवस्था, कमजोर मांग और बढ़ती लागत ने इस पूरे क्षेत्र को गहरे दबाव में डाल दिया।
कई छोटे कारोबारी आज भी उस झटके से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। लेकिन समस्या यह है कि आर्थिक बहस की जगह राजनीतिक मार्केटिंग ने ले ली। सरकार की आलोचना को कई बार “नकारात्मकता” कहकर खारिज कर दिया गया। बेरोजगारी पर सवाल उठाओ तो कहा जाता है कि देश बदनाम हो रहा है। महंगाई की बात करो तो जवाब में राष्ट्रवाद का भाषण सुनने को मिल जाता है।
लेकिन सच यह है कि अर्थव्यवस्था नारे से नहीं चलती। भूख टीवी डिबेट देखकर खत्म नहीं होती।
बेरोजगारी भाषणों से कम नहीं होती। और महंगाई सोशल मीडिया ट्रेंड से नियंत्रित नहीं होती।
यही कारण है कि अब सरकार के समर्थक माने जाने वाले अर्थशास्त्री भी खुलकर चेतावनी देने लगे हैं।
अशोक गुलाटी जैसे व्यक्ति जब कहते हैं कि हालात सरकार के हाथ से निकल सकते हैं, तो उसका अर्थ सिर्फ आर्थिक नहीं होता। इसका मतलब यह भी होता है कि समाज के भीतर असंतोष बढ़ सकता है।
क्योंकि आर्थिक संकट कभी अकेला नहीं आता।
उसके साथ सामाजिक तनाव आता है। मानसिक दबाव आता है। राजनीतिक असंतोष आता है।
बेरोजगार युवा सिर्फ आंकड़ा नहीं होता। टूटा हुआ मध्यम वर्ग सिर्फ उपभोक्ता नहीं होता। परेशान किसान सिर्फ वोटर नहीं होता। यह सब मिलकर किसी भी देश के सामाजिक संतुलन को प्रभावित करते हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार शायद अभी भी वास्तविक समस्या की गहराई स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती। ऐसा लगता है मानो पूरा ध्यान इमेज मैनेजमेंट पर केंद्रित है। अगर शेयर बाजार ऊपर है तो सब ठीक है।
अगर विदेशी नेता तारीफ कर दें तो सब ठीक है। अगर बड़े आयोजन सफल हो जाएं तो सब ठीक है। लेकिन आम आदमी की जिंदगी अलग कहानी कह रही है।
देश का युवा असुरक्षित है।
मध्यम वर्ग दबाव में है।
छोटे कारोबारी संघर्ष कर रहे हैं। किसान परेशान है।
और यही वह स्थिति है जिसने अब सत्ता के भीतर भी बेचैनी पैदा करनी शुरू कर दी है।
जब अपने ही लोग चेतावनी देने लगें तो समझ लेना चाहिए कि मामला सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रह गया। भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था को सिर्फ प्रचार के सहारे लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। लोगों की वास्तविक आय बढ़ानी होगी। रोजगार पैदा करने होंगे। छोटे उद्योगों को राहत देनी होगी।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा।
मध्यम वर्ग को आर्थिक सुरक्षा देनी होगी।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो आर्थिक संकट धीरे-धीरे विश्वास के संकट में बदल सकता है। और जब जनता का भरोसा डगमगाने लगे तो सबसे मजबूत दिखाई देने वाली व्यवस्था भी भीतर से कमजोर पड़ने लगती है।
आज जरूरत नए नारों की नहीं है। जरूरत ईमानदार आत्ममंथन की है। जरूरत इस बात की है कि सरकार जमीन की वास्तविकता को स्वीकार करे।क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब सत्ता के अपने लोग ही खतरे की घंटी बजाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि संकट दरवाजे तक पहुंच चुका है।

