

अलोक गौड़ :वरिष्ठ लेखक, सवाददाता।
जब किसी देश का प्रधानमंत्री जनता से कहने लगे कि सोना मत खरीदो, पेट्रोल-डीजल कम खर्च करो और विदेश यात्राएं टाल दो, तब समझ लीजिए कि अर्थव्यवस्था की हालत सामान्य नहीं रह गई है। और जब उसी समय देश का सबसे बड़ा बैंकर उदय कोटक ने खुलकर यह कह दिया है कि “बहुत भयानक समय आने वाला है”, तब इसे केवल खतरे की घंटी नहीं समझना भारी भूल होगी क्यूंकि यह घंटी नहीं बल्कि सायरन है।
लेकिन समस्या यह है कि सत्ता अब भी देश को सच्चाई नहीं, “इवेंट” दिखा रही है। जनता की जेब खाली हो रही है और सरकार अब भी मंच, माला, मीडिया और मेकअप में व्यस्त है। देश को पिछले दस वर्षों से बताया गया कि भारत “विश्वगुरु” बनने जा रहा है। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बस आने ही वाली है। अमृतकाल शुरू हो चुका है। मगर अब अचानक जनता से कहा जा रहा है कि खर्च कम करो, बचत संभालो, सोना मत खरीदो। सवाल यह है कि यदि सबकुछ इतना ही शानदार था तो फिर यह डर क्यों? और अगर खतरा इतना बड़ा है तो सरकार ने अब तक देश को भ्रम में क्यों रखा?
असलियत यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ऊपर से चमकती हुई इमारत जरूर दिखाई देती है, लेकिन उसकी दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं। बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। महंगाई आम आदमी की हड्डियां तोड़ रही है। मध्यम वर्ग ईएमआई और क्रेडिट कार्ड के सहारे जिंदा है। छोटे व्यापारी जीएसटी, टैक्स और ऑनलाइन बाजार के दबाव में खत्म हो रहे हैं। किसानों की आय आज भी भाषणों में बढ़ती है, खेतों में नहीं।
लेकिन सत्ता को इन सबकी चिंता कम और “नैरेटिव मैनेजमेंट” की चिंता ज्यादा है। देश में रोजगार नहीं है,लेकिन ड्रोन शो है।
उद्योग नहीं हैं, लेकिनउद्घाटन हैं।निवेश नहीं है, लेकिन विज्ञापन हैं। जनता की थाली छोटी हो रही है, मगर सरकार के दावे बड़े होते जा रहे हैं।
उदय कोटक ने जो कहा, वह सिर्फ आर्थिक टिप्पणी नहीं थी। वह इस दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक पोल खोल थी। उन्होंने साफ कहा कि “उपभोक्ताओं ने अभी कुछ देखा ही नहीं है।” यानी असली संकट अभी दरवाजे पर खड़ा है। खाड़ी में युद्ध बढ़ेगा तो तेल महंगा होगा। तेल महंगा होगा तो ट्रांसपोर्ट महंगा होगा। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो दाल, दूध, सब्जी, दवा, स्कूल फीस — सबकुछ महंगा होगा। यानी आने वाले महीनों में आम आदमी की जेब पर ऐसा हमला होने वाला है जिसे कोई टीवी एंकर राष्ट्रवाद के नारों से नहीं रोक पाएगा।
मगर सत्ता का रवैया देखिए। आर्थिक संकट पर राष्ट्रीय बहस करने के बजाय पूरा ध्यान विपक्ष को कुचलने, एजेंसियों के इस्तेमाल और चुनावी जुमले गढ़ने पर है। संसद में अर्थव्यवस्था से ज्यादा शोर विपक्ष के खिलाफ सुनाई देता है। बेरोजगारी पर सवाल पूछो तो पाकिस्तान सामने खड़ा कर दिया जाता है। महंगाई की बात करो तो धर्म का इंजेक्शन लगा दिया जाता है। यह लोकतंत्र कम और जनता का ध्यान भटकाने की संगठित कला ज्यादा लगती है। उदय कोटक ने हिंदू दर्शन की “त्रिमूर्ति” का उदाहरण देकर दरअसल भारत की पूरी आर्थिक मानसिकता को बेनकाब कर दिया। उन्होंने कहा कि भारत “विष्णु मोड” में फंसा हुआ है — यानी सिर्फ जो है उसे बचाने में लगा है।
यह बात केवल अर्थव्यवस्था पर नहीं, पूरी शासन व्यवस्था पर लागू होती है।
सरकार पुरानी व्यवस्था को प्रचार से चमका रही है, लेकिन नई आर्थिक सोच पैदा नहीं कर पा रही।शिक्षा डिग्रियां दे रही है, रोजगार नहीं। स्टार्टअप्स को भाषण मिल रहे हैं, पूंजी नहीं।
युवा को स्किल नहीं, केवल सेल्फी आधारित राष्ट्रवाद दिया जा रहा है।
कोटक ने कहा कि भारत को “ब्रह्मा” और “महेश” दोनों की जरूरत है l यानी सृजन और बदलाव की। लेकिन यहां हालात यह हैं कि जो सवाल पूछे वही दुश्मन घोषित कर दिया जाता है। सरकार को सलाह नहीं चाहिए, सिर्फ तालियां चाहिए। मीडिया को सच नहीं चाहिए, सिर्फ टीआरपी चाहिए। और जनता को अधिकार नहीं, भावनात्मक नशा परोसा जा रहा है।
आज भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। छोटे उद्योग खत्म हो रहे हैं, बाजार का केंद्रीकरण बढ़ रहा है और सरकार “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के नाम पर बड़े खिलाड़ियों के लिए लाल कालीन बिछा रही है। आम व्यापारी टैक्स नोटिस और महंगे कर्ज के नीचे दबा है, जबकि बड़े उद्योगपति सरकारी मंचों पर “भारत की सफलता” का संगीत बजा रहे हैं।यह वही मॉडल है जिसमें ऊपर अमीरी बढ़ती है और नीचे बेचैनी। शेयर बाजार रिकॉर्ड बना रहा है, लेकिन परिवारों की बचत टूट रही है।
सरकार जीडीपी गिना रही है, मगर नौकरी का आंकड़ा छिपा रही है।
देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन मध्यम वर्ग की नींद उड़ चुकी है।
सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। संकट यह है कि सत्ता अब भी सच बोलने को तैयार नहीं। उसे डर है कि अगर जनता को वास्तविक स्थिति समझ आ गई तो “अमृतकाल” का पूरा पोस्टर फट जाएगा।
उदय कोटक ने केवल आर्थिक चेतावनी नहीं दी। उन्होंने उस नकली चमक को उधेड़ दिया है जिसके सहारे पिछले कई वर्षों से देश को यह विश्वास दिलाया जा रहा था कि सबकुछ नियंत्रण में है।
सच्चाई यह है कि देश की अर्थव्यवस्था आईसीयु में पहुंच चुकी है।
लेकिन सत्ता अब भी उसके चेहरे पर मेकअप लगाकर कैमरे के सामने खड़ी है।
और इतिहास गवाह है —
जब अर्थव्यवस्था टूटती है तो सबसे पहले प्रचार के महल ढहते हैं।

