न्याय प्रणाली मे आम जन का विश्वास बढ़े, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए:CJI।

कुलवंत कौर की रिपोर्ट :-

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन उद्घाटन : माननीय श्री न्यायमूर्ति सूर्या कांत, भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं श्री अर्जुन राम मेघवाल, माननीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री

सोनीपत, 29 नवंबर 2025: माननीय श्री न्यायमूर्ति सूर्या कांत, भारत के मुख्य न्यायाधीश, और श्री अर्जुन राम मेघवाल, माननीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री, ने आज ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में “न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन: अधिकार, संस्थाएँ और नागरिक—तुलनात्मक दृष्टिकोण” का उद्घाटन किया।
कार्यक्रम के दौरान विश्व के सबसे बड़े मूoot कोर्ट — न्यायाभ्यास मंडपम् — को राष्ट्र को समर्पित करते हुए ईमानदार (IMAANDAAR – International Mooting Academy for Advocacy, Negotiation, Dispute Adjudication, Arbitration and Resolution) का लोकार्पण भी किया गया।
इस विशिष्ट आयोजन में 17 भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, 10 पूर्व मुख्य न्यायाधीश/पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, 10 उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश एवं पूर्व न्यायाधीश, 14 अंतरराष्ट्रीय न्यायाधीश एवं विधिवेत्ता, 6 मंत्री एवं सांसद, 61 वरिष्ठ अधिवक्ता तथा 91 शिक्षाविद, वकील और पत्रकार उपस्थित थे।
दो दिवसीय यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन इस बात पर केंद्रित है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की नींव कैसे है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, जब भारत एक नवजात लोकतंत्र था, तब संविधान निर्माताओं ने यह सुनिश्चित किया कि न्यायपालिका किसी भी बाहरी या आंतरिक प्रभाव से मुक्त होकर कार्य करे। यह सिद्धांत भारतीय संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है, जो कार्यपालिका, संसद और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के संतुलित वितरण और विधि के शासन को सुनिश्चित करता है।

इसके बाद सम्मेलन में ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामला और उसके भारतीय संवैधानिक इतिहास पर प्रभाव का नाट्य-प्रस्तुतीकरण किया गया। इस प्रस्तुति में भारत के महान्यायवादी श्री आर. वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल श्री तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक एम. सिंघवी तथा वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ लूथरा शामिल थे।
इस ऐतिहासिक प्रस्तुतीकरण के बाद एक अभूतपूर्व संवाद हुआ जिसमें 13-न्यायाधीशों की पीठ ने केशवानंद भारती प्रकरण और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अपने विचार साझा किए।
24 अप्रैल 1973 को दिए गए इस ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत स्थापित किया, जिसके अनुसार संविधान की कुछ मूलभूत विशेषताएं—जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद और विधि का शासन—संसद द्वारा संशोधित नहीं की जा सकतीं। न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) को भी संविधान की मूल संरचना का अभिन्न अंग माना गया।
इस चर्चा में शामिल माननीय न्यायाधीश थे —
माननीय श्री न्यायमूर्ति सूर्या कांत, माननीय न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, तथा सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश: एम.एम. सुंदरेश, पी.एस. नरसिम्हा, दीपांकर दत्ता, संजय करोल, राजेश बिंदल, अरविंद कुमार, प्रशांत कुमार मिश्रा, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, एन. कोटिस्वर सिंह, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची।
अंत में, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल का परिचय प्रो. (डॉ.) दीपिका जैन, कार्यकारी डीन, ने दिया और धन्यवाद ज्ञापन ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार प्रो. डबीरु श्रीधर पटनायक ने प्रस्तुत किया।

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