अलोक गौड़ :वरिष्ठ लेखक, सम्पादक।


आलोक गौड़
नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि सत्ता निरंकुश होती जा रही है। असली संकट यह है कि संवैधानिक संस्थाएं धीरे-धीरे अपनी रीढ़ खोती जा रही हैं। पिछले बारह वर्षों में देश ने एक खतरनाक बदलाव देखा है। जिन संस्थाओं को संविधान का प्रहरी माना जाता था,वह अब सत्ता की राजनीतिक परियोजना का हिस्सा बनती दिखाई दे रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय से लेकर चुनाव आयोग, सीबीआई, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और यहां तक कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद तक लगातार विवादों के घेरे में हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लोकतंत्र की आत्मा पर सबसे बड़ा हमला संस्थाओं के भीतर से ही हुआ है। सरकारें हमेशा शक्तिशाली होती हैं, लेकिन लोकतंत्र इसलिए बचा रहता है क्योंकि संस्थाएं सत्ता के सामने खड़ी रहती हैं। जब वही संस्थाएं झुकने लगें, तब संविधान केवल एक किताब बनकर रह जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों को कठघरे में खड़ा किया। प्रवर्तन निदेशालय की असीमित शक्तियों पर सवाल उठे। सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर टिप्पणियां हुईं। राज्यपालों की भूमिका पर तीखी टिप्पणियां की गईं। अदालतों ने साफ कहा कि लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार सर्वोपरि है, न कि किसी नियुक्त पदाधिकारी की व्यक्तिगत इच्छा। लेकिन समस्या यह है कि सत्ता ने अदालतों की फटकार को भी राजनीतिक शोर समझना शुरू कर दिया है।
तमिलनाडु की मौजूदा स्थिति इसी गिरावट का सबसे ताजा और खतरनाक उदाहरण है। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि बहुमत परीक्षण का स्थान राजभवन नहीं, विधानसभा का सदन है। यह कोई राजनीतिक राय नहीं, बल्कि संवैधानिक सिद्धांत है। लोकतंत्र में सरकारें विधायक चुनते हैं, राज्यपाल नहीं। लेकिन इसके बावजूद यदि कोई राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का अवसर देने के बजाय पहले बहुमत साबित करने की शर्त रखता है, तो यह केवल संवैधानिक परंपरा का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जनादेश पर अविश्वास है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर राज्यपाल कौन होते हैं? क्या वह संविधान के संरक्षक हैं या केंद्र सरकार के राजनीतिक पर्यवेक्षक? यदि विधानसभा में बहुमत का फैसला अंततः सदन में होना है, तो फिर राजभवन को निर्णायक भूमिका निभाने की आवश्यकता ही क्या है? क्या राज्यपाल अब यह तय करेंगे कि किस दल को सत्ता में आने देना है और किसे रोकना है?
विडंबना यह है कि भारत के राष्ट्रपति तक लोकसभा में अल्पमत वाली सरकारों को बहुमत साबित करने का अवसर देते रहे हैं। देश ने पी.वी. नरसिंह राव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक कई ऐसी सरकारें देखी हैं, जिन्हें पहले मौका दिया गया और फिर उन्होंने सदन में अपना बहुमत साबित किया। क्योंकि संसदीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि संख्या का परीक्षण सदन में होगा। लेकिन अब कुछ राज्यपाल ऐसे व्यवहार कर रहे हैं मानो संविधान नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्देशावली उनके सामने रखी हो।
यह कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में गैर-भाजपा शासित राज्यों में राज्यपालों की भूमिका लगातार विवादों में रही है। कहीं विधेयकों को महीनों रोककर रखा गया, कहीं विधानसभा सत्र बुलाने में टालमटोल हुई, कहीं विश्वविद्यालयों तक में राजनीतिक दखल दिखाई दिया। ऐसा लगने लगा है कि राजभवन अब संवैधानिक संस्था कम और राजनीतिक नियंत्रण केंद्र अधिक बनते जा रहे हैं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को सामान्य बनाने की कोशिश हो रही है। जनता को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि यही नया लोकतंत्र है। जहां जांच एजेंसियां विपक्ष के लिए सक्रिय होंगी और सत्ता पक्ष के सामने मौन। जहां राज्यपाल निर्वाचित सरकारों से टकराएंगे। जहां अदालतों के फैसलों की व्याख्या राजनीतिक सुविधा के हिसाब से होगी। और जहां हर असहमति को राष्ट्रविरोध या अस्थिरता का नाम देकर दबाने की कोशिश की जाएगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता। लोकतंत्र संस्थाओं की निष्पक्षता, संवैधानिक मर्यादाओं और राजनीतिक नैतिकता से चलता है। जिस दिन संस्थाएं पूरी तरह सत्ता की शाखा बन जाती हैं, उसी दिन लोकतंत्र का क्षरण शुरू हो जाता है। चुनाव तब भी होते हैं, संसद तब भी चलती है, अदालतें तब भी खुलती हैं, लेकिन व्यवस्था की आत्मा मरने लगती है।
आज देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि संवैधानिक पदों पर बैठे कई लोग संविधान की आत्मा के बजाय सत्ता की सुविधा को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं। राज्यपाल जैसे पद, जिन्हें राजनीतिक निष्पक्षता का प्रतीक होना चाहिए था, वे अब राजनीतिक संघर्ष के सक्रिय खिलाड़ी बनते जा रहे हैं। यह केवल संघीय ढांचे के लिए खतरा नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों के लिए भी गंभीर चुनौती है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि अंतिम फैसला जनता के प्रतिनिधियों का होता है। राजभवन जनता से ऊपर नहीं हो सकता। कोई नियुक्त व्यक्ति जनता के जनादेश की व्याख्या अपने हिसाब से नहीं कर सकता। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले समय में विधानसभा और संसद की भूमिका केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी और असली सत्ता उन संस्थाओं के हाथ में चली जाएगी, जिन्हें जनता ने चुना ही नहीं।
अब समय आ गया है कि देश इस प्रश्न पर गंभीरता से सोचे कि क्या हम संवैधानिक लोकतंत्र बचाना चाहते हैं या केवल सत्ता का केंद्रीकृत ढांचा खड़ा करना चाहते हैं? क्योंकि जब संविधान की रक्षा करने वाले ही उसकी आत्मा को कमजोर करने लगें, तब खतरा विपक्ष या किसी दल को नहीं, पूरे लोकतंत्र को होता है।

