दिल्ली ऊंचा सुनती है,कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।गड्ढे सड़कों में हैं या व्यवस्था में? :-लेखक वरिष्ठ सम्पादक =:-:आलोक गौड़

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दिल्ली की सड़कों पर निकलते समय अब ट्रैफिक से ज्यादा गड्ढों पर नज़र रखनी पड़ती है। लाल बत्ती तोड़ने पर चालान कट सकता है, लेकिन गड्ढे में गिरकर जान चली जाए तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? राजधानी की सड़कों की हालत देखकर लगता है कि डामर से ज्यादा भरोसा उखड़ा है। सड़कें केवल टूटी नहीं हैं, वह सरकार के दावों की भी परीक्षा ले रही हैं।
पहली बारिश ने फिर वही पुराना सच सामने ला दिया। कई जगह सड़कें धंस गईं, डामर उखड़ गया, गड्ढे बन गए और आवागमन जोखिम भरा हो गया। सवाल केवल यह नहीं कि सड़कें क्यों टूटीं। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद वह इतनी जल्दी जवाब क्यों दे गईं? यदि निर्माण मानकों के अनुरूप हुआ था तो सड़कें पहली बारिश में ही क्यों हार गईं? और यदि मानकों के अनुरूप नहीं हुआ था तो इनके निर्माण का भुगतान किसको और किस आधार आधार पर किया गया?


सरकार कहेगी कि मरम्मत होगी। अधिकारी कहेंगे कि जांच बैठा दी गई है। ठेकेदार तकनीकी खामी के कारण गिना देंगे। लेकिन जनता का सवाल इससे बड़ा है। आखिर हर साल वही सड़क क्यों टूटती है? हर बरसात के बाद वही गड्ढे क्यों लौट आते हैं? क्या गड्ढे बारिश बनाती है या व्यवस्था?
दिल्ली सरकार ने अप्रैल
2025 से मार्च 2026 के बीच लगभग एक लाख करोड़ रुपये का बजट खर्च किया। यह धन किसी सरकार की निजी तिजोरी से नहीं आया था। यह दिल्लीवासियों के पसीने की कमाई से जमा हुआ था l जीएसटी, आबकारी, स्टांप शुल्क, मोटर वाहन कर और न जाने कितने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों के रूप में। इसलिए जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि इस एक लाख करोड़ रुपये से दिल्ली को आखिर मिला क्या?
यदि राजधानी की सड़कें बदहाल हैं, जलभराव हर मानसून की नियति है, स्वास्थ्य विभाग पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच होती है, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं और नागरिक रोज़मर्रा की बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बजट का कितना हिस्सा वास्तव में विकास पर खर्च हुआ और जहां-जहां अनियमितताओं के आरोप सामने आए, वहां जवाबदेही किस स्तर तक तय की गई ?
लोकतंत्र में बजट केवल आय-व्यय का ब्योरा नहीं होता, वह सरकार की प्राथमिकताओं का आईना भी होता है। इसलिए बजट का आकार नहीं, उसका असर मायने रखता है। यदि एक लाख करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी नागरिक टूटी सड़क, गंदी नालियों, जलभराव, अव्यवस्थित यातायात और कमजोर सार्वजनिक सेवाओं से जूझ रहा है, तो सरकार को केवल उपलब्धियां गिनाने से काम नहीं चलेगा। उसे परिणाम भी दिखाने होंगे।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता बार-बार पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति की बात करते रहे हैं। यदि यही शासन का मानदंड है, तो दिल्ली इसके लिए सबसे बड़ी कसौटी भी बननी चाहिए। जहां भी वित्तीय अनियमितताओं, घटिया निर्माण या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के आरोप सामने आए हैं, वहां जांच की प्रगति और कार्रवाई का पूरा विवरण जनता के सामने रखा जाना चाहिए। लोकतंत्र में विश्वास घोषणाओं से नहीं, जवाबदेही से बनता है।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। सड़क का गड्ढा तो हर नागरिक देख लेता है, लेकिन व्यवस्था के गड्ढे फाइलों में छिपे रहते हैं। सड़क का गड्ढा बाइक सवार को गिराता है, व्यवस्था का गड्ढा पूरे समाज के भरोसे को गिरा देता है। और जब जनता का भरोसा टूटने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या केवल इंजीनियरिंग की नहीं, शासन की भी है।

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