बंसी लाल रिपोर्ट :-

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर अपना रुख स्पष्ट करें केंद्र व राज्य सरकारें
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और राज्यों से कहा कि वे पुलिस द्वारा मीडिया को ब्रीफिंग देने के लिए बनाए जाने वाले प्रस्तावित मैनुअल पर अपनी प्रतिक्रिया दें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर अपना रुख स्पष्ट करें केंद्र व राज्य सरकारें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर अपना रुख स्पष्ट करें केंद्र व राज्य सरकारें
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और राज्यों से कहा कि वे पुलिस द्वारा मीडिया को ब्रीफिंग देने के लिए बनाए जाने वाले प्रस्तावित मैनुअल पर अपनी प्रतिक्रिया दें।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के लिए एक नया मैनुअल बनाने का निर्देश दिया है। यह मैनुअल संवेदनशील मामलों में मीडिया को ब्रीफिंग देते समय आरोपियों और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करेगा। इसका मुख्य मकसद यह है कि मीडिया ट्रायल न हो और पुलिस द्वारा साझा की गई जानकारी सही और संतुलित हो।
इस मैनुअल में यह बताया जाएगा कि मीडिया ब्रीफिंग के दौरान क्या करें और क्या न करें। खासकर ऐसे शब्दों से बचना होगा जो किसी व्यक्ति को कलंकित करें, पीड़ित को दोष दें, या नैतिक टिप्पणियाँ करें। साथ ही, पीड़ितों के नाम, चेहरे, आवाज़ और परिवार की जानकारी को छुपाने पर जोर दिया गया है ताकि दोबारा चोट न पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह दस्तावेज़ बहुत विस्तार से तैयार किया गया है। जस्टिस एमएम सुंदरश और सतीश चंद्र शर्मा ने वरिष्ठ वकील गोपाल शंकर नारायणन की सराहना की, जिन्होंने अमिकस क्यूरी के रूप में इस मैनुअल को तैयार किया। अब केंद्र और राज्यों को इसे देखकर अपनी प्रतिक्रिया देनी होगी।
यह मामला पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (PUCL) की 1999 में दायर याचिका से जुड़ा है। उस याचिका में पुलिस एनकाउंटर और मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशानिर्देश बनाने की जरूरत बताई गई थी। कोर्ट ने कई अन्य याचिकाओं पर भी सुनवाई की।
मैनुअल का उद्देश्य जांच की सुरक्षा, नागरिकों को सही और समय पर जानकारी, अपराध पीड़ितों की गरिमा और प्राइवेसी, और आरोपी, गवाह और संदिग्ध को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार सुनिश्चित करना है।
इस दस्तावेज़ में मीडिया ब्रीफिंग सेल बनाने और एक प्रवक्ता नियुक्त करने का सुझाव दिया गया है। केवल वही प्रवक्ता प्रेस रिलीज़, मीडिया ब्रीफिंग और सोशल मीडिया अपडेट साझा करेगा। सभी जानकारी पुलिस के कानूनी अधिकारियों और अभियोजन विभाग द्वारा जांच के बाद ही दी जाएगी।
ड्राफ्ट में कहा गया है कि पुलिस केवल सही, जांची हुई और आवश्यक जानकारी ही साझा करे। मीडिया ब्रीफिंग को कानूनी, आवश्यक, अनुपातिक और जवाबदेह होना चाहिए। पुलिस को मामले की मेरिट, सबूत, कथित कबूलनामे, जांच तकनीक या निगरानी तरीकों पर टिप्पणी करने से बचना होगा। वहीं, मीडिया में फैल रही गलत जानकारी को सुधारना होगा।
दस्तावेज़ चार हिस्सों में बांटा गया है। इसमें बताया गया है कि मीडिया को कैसे ब्रीफ करें, कानूनी और नीति संबंधी नियम, प्रेस रिलीज़ और ब्रीफिंग प्रोटोकॉल, संकट के समय संचार, हिरासत में मौत, आत्महत्या, लापता व्यक्तियों के मामले और मीडिया को ब्रीफ करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी क्या होगी।
2010 में गृह मंत्रालय ने अरुषि तलवार हत्याकांड के बाद संक्षिप्त दिशानिर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी केंद्र को समान दिशानिर्देश लाने के लिए कहा था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत सुरक्षित है, लेकिन जांच के दौरान हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का हक है और मीडिया ट्रायल में किसी को पहले से दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।
