
नई दिल्ली के अनुभवी प्लास्टिक सर्जन एवं RG Aesthetics के संस्थापक, तथा इंडियन एसोसिएशन ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जन्स (IAAPS) के राष्ट्रीय सचिव डॉ. रजत गुप्ता के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में भारत में गाइनेकोमास्टिया (पुरुषों में असामान्य रूप से ब्रेस्ट टिश्यू का बढ़ जाना) के मामले दोगुने से भी अधिक बढ़ गए हैं। यह समस्या भारतीय पुरुषों के बीच तेज़ी से बढ़ती एक चिंताजनक स्थिति बनती जा रही है।
“करीब पाँच साल पहले हम हर महीने 10–15 गाइनेकोमास्टिया के मामलों का इलाज करते थे। आज यह संख्या बढ़कर लगभग 30–35 मरीज प्रति माह हो गई है,” डॉ. गुप्ता ने बताया।
गाइनेकोमास्टिया को आम भाषा में “मैन बूब्स” या “मर्दों में स्तन उभार” कहा जाता है। यह स्थिति तब होती है जब पुरुषों के शरीर में ब्रेस्ट टिश्यू विकसित होने लगता है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, इसके मुख्य रूप से दो कारण होते हैं। पहला—किशोरावस्था के दौरान हार्मोन का असंतुलन। युवावस्था में शरीर में हार्मोनल बदलाव सामान्य होते हैं, लेकिन लगभग 6–8 किशोरों में से 1 में यह असंतुलन ब्रेस्ट टिश्यू के बढ़ने का कारण बन सकता है। यह हार्मोनल बदलाव समय के साथ सामान्य हो जाता है, लेकिन जो ब्रेस्ट टिश्यू बन जाता है, वह अपने आप खत्म नहीं होता।
दूसरा और तेज़ी से बढ़ता कारण है—स्टेरॉयड का गलत इस्तेमाल। “कई युवा मसल्स बनाने के लिए स्टेरॉयड लेते हैं, बिना यह जाने कि ये दवाइयाँ शरीर में ऐसे हार्मोन में बदल सकती हैं, जिससे ब्रेस्ट टिश्यू बढ़ने लगता है और गाइनेकोमास्टिया हो सकता है,” डॉ. गुप्ता ने बताया।
इलाज कराने आने वाले अधिकांश मरीज 20–40 वर्ष की उम्र के होते हैं, हालांकि 40 वर्ष से अधिक उम्र में भी इसके मामले देखे जा रहे हैं। कुछ गंभीर मामलों में किशोरों को भी ऑपरेशन की आवश्यकता पड़ सकती है। डॉ. गुप्ता ने 14 वर्षीय एक लड़के का उदाहरण साझा किया, जिसे गाइनेकोमास्टिया की गंभीर स्थिति थी और लगातार मज़ाक उड़ाए जाने के कारण उसने स्कूल जाना बंद कर दिया था। मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि उसने स्वयं को नुकसान पहुँचाने की कोशिश भी की। ऐसे में उम्र की सामान्य सलाह (17–18 वर्ष तक प्रतीक्षा) को न मानते हुए, मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर उसकी सर्जरी की गई।
डॉ. गुप्ता ने साफ़ किया कि एक बार ब्रेस्ट टिश्यू विकसित हो जाने के बाद, दवाइयों, व्यायाम या डाइट से इसका इलाज संभव नहीं होता। “सर्जरी ही इसका एकमात्र असरदार इलाज है,” उन्होंने कहा।
पहले गाइनेकोमास्टिया की सर्जरी में छाती के सामने बड़े चीरे लगाने पड़ते थे, जिससे स्थायी निशान रह जाते थे। इसी समस्या के समाधान के लिए डॉ. गुप्ता ने ‘ऑकल्ट (O-C-C-U-L-T) तकनीक’ विकसित की। यह एक आधुनिक सर्जरी पद्धति है, जिसमें छाती के सामने कोई निशान नहीं पड़ता। इसमें केवल 4–5 मिलीमीटर (mm) का छोटा-सा चीरा छाती के किनारे लगाया जाता है, जो समय के साथ लगभग दिखाई नहीं देता।
यह सर्जरी डे-केयर प्रक्रिया होती है, यानी मरीज उसी दिन घर जा सकता है और कुछ ही दिनों में सामान्य जीवन शुरू कर सकता है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, सर्जरी के बाद आमतौर पर यह समस्या दोबारा नहीं होती और यह मरीजों के लिए स्थायी और जीवन बदल देने वाला समाधान साबित होती है—बशर्ते हार्मोन से जुड़ी समस्या न हो या स्टेरॉयड का सेवन जारी न रखा जाए।

