कांग्रेस को बदलना होगा :कांग्रेस का गैर सरकारी संगठन करण कार्यकता हाशिए पर, प्रकोठ दिशाहीन।

कांग्रेस का गैर-सरकारी संगठनकरण
कार्यकर्ता हाशिए पर, प्रकोष्ठ दिशाहीन

— रितेश सिन्हा

कांग्रेस पार्टी कभी भारत की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और जनसंघर्ष का पर्याय थी। आज वही पार्टी अपने ही संगठनात्मक ढांचे में आत्मविश्वास और दिशा—दोनों खोती दिखाई देती है। ज़मीनी कार्यकर्ता हताश हैं, प्रकोष्ठ निष्क्रिय हैं और नेतृत्व का बड़ा हिस्सा राजनीतिक संघर्ष के बजाय प्रबंधन, संतुलन और प्रतीकात्मक गतिविधियों में उलझा हुआ है। कांग्रेस अब एक जीवंत राजनीतिक दल कम और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों जैसी संरचनाओं का समूह अधिक प्रतीत होती है—जहाँ गोष्ठियाँ हैं, वक्तव्य हैं, आंदोलन और चुनावी धार नहीं है।

यह स्थिति किसी एक चुनावी हार का नतीजा नहीं, बल्कि वर्षों की संगठनात्मक उपेक्षा, गलत नियुक्तियों और जमीनी नेतृत्व से लगातार कटाव का परिणाम है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और संगठन प्रभारी अजय माकन—तीनों की भूमिका पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। नेतृत्व परिवर्तन से उम्मीद जगी थी, लेकिन ढांचा वही रहा, चेहरे वही रहे और नतीजे भी लगभग वही हैं।

देश की राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्ग निर्णायक भूमिका निभा रहा है। जातिगत जनगणना, आरक्षण की रक्षा और सत्ता में भागीदारी जैसे मुद्दे इस वर्ग के लिए केंद्रीय हैं। इसके बावजूद कांग्रेस का अन्य पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ प्रभावी राजनीतिक हस्तक्षेप करने में विफल रहा है। अनिल जय हिंद के नेतृत्व में यह प्रकोष्ठ न तो कोई बड़ा ज़मीनी आंदोलन खड़ा कर सका और न ही राज्यों में संगठन को मज़बूत कर पाया।
जाट, यादव, कुर्मी, गुर्जर जैसे समुदायों में कांग्रेस की पकड़ लगातार कमजोर होती गई, लेकिन प्रकोष्ठ की प्रतिक्रिया सीमित रही। जब संगठन सड़क पर नहीं उतरता, तो बयान मतदाता को प्रभावित नहीं करते। यह प्रकोष्ठ धीरे-धीरे राजनीतिक इकाई से अधिक वैचारिक मंच बनता जा रहा है—और यही कांग्रेस की सबसे बड़ी चूक है।

देश का किसान आज न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, कर्ज़ राहत और लागत आधारित मूल्य निर्धारण जैसे मुद्दों पर निर्णायक संघर्ष की उम्मीद करता है। ऐसे समय में किसान कांग्रेस से अपेक्षा थी कि वह राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन खड़ा करेगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि किसान कांग्रेस का प्रभाव लगातार सीमित होता गया है।
सुखपाल सिंह खैरा के नेतृत्व में किसान कांग्रेस न तो स्पष्ट रणनीति पेश कर पाई और न ही राज्यों में कोई मजबूत दबाव समूह तैयार कर सकी। पंजाब जैसे संवेदनशील राज्य में किसान राजनीति को लेकर कांग्रेस की अस्पष्टता ने पार्टी को और नुकसान पहुँचाया। किसान कांग्रेस का यह हाल कांग्रेस की व्यापक संगठनात्मक कमजोरी का प्रतीक बन चुका है।

भारत का असंगठित क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। श्रम क़ानूनों में बदलाव, निजीकरण और सामाजिक सुरक्षा के संकट ने मज़दूरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे समय में असंगठित मज़दूर प्रकोष्ठ से अपेक्षा थी कि वह मज़बूत और व्यापक आंदोलन खड़ा करेगा।
डॉ. उदित राज के नेतृत्व में यह प्रकोष्ठ वैचारिक चर्चा और वक्तव्यों तक सीमित दिखाई देता है। ज़मीनी लामबंदी, हड़तालें और राजनीतिक दबाव—इनका अभाव साफ़ दिखता है। जब मज़दूर राजनीति केवल भाषण तक सिमट जाए, तो उसका असर स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है।

अनुसूचित जाति समाज से जुड़े मुद्दे—अत्याचार, सामाजिक सुरक्षा, न्याय और प्रतिनिधित्व—आज भी उतने ही गंभीर हैं। इसके बावजूद कांग्रेस का अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ इन मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर का कोई प्रभावी अभियान खड़ा नहीं कर सका।
राजविंदर पाल सिंह गौतम के नेतृत्व में यह प्रकोष्ठ निष्क्रियता और आंतरिक उलझनों से जूझता दिखता है। जब दलित मतदाता का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस से दूरी बना रहा है, तब यह और भी ज़रूरी था कि प्रकोष्ठ आक्रामक और स्पष्ट राजनीतिक भूमिका निभाए। मौन और निष्क्रियता ने भरोसे का संकट गहरा कर दिया है।

अल्पसंख्यक समुदाय नागरिकता, शिक्षा, रोज़गार और सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर ठोस और भरोसेमंद नेतृत्व चाहता है। लेकिन अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ अब तक कोई स्पष्ट राजनीतिक रोडमैप पेश नहीं कर सका है। इमरान प्रतापगढ़ी के नेतृत्व में प्रकोष्ठ की पहचान ज़्यादातर प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक राजनीति तक सीमित रही है। अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन संगठनात्मक राजनीति उससे आगे की मांग करती है। रणनीति और ज़मीनी उपस्थिति के अभाव में यह प्रकोष्ठ कांग्रेस की ताक़त बनने के बजाय उसकी कमजोरी बन गया है।

महिला सुरक्षा, आरक्षण और रोज़गार जैसे मुद्दे आज राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। महिला कांग्रेस को इन मुद्दों पर निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए थी। लेकिन नेतृत्व की अस्थिरता और बिखरी गतिविधियों ने इसके प्रभाव को सीमित कर दिया है।
अलका लांबा के नेतृत्व में महिला कांग्रेस कोई स्थायी और व्यापक राष्ट्रीय अभियान खड़ा नहीं कर पाई। संगठनात्मक निरंतरता के बिना महिला मतदाता के साथ स्थायी रिश्ता बनना मुश्किल है।

भारत जोड़ो यात्रा के बाद यह उम्मीद बनी थी कि कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे में ठोस बदलाव करेगी। लेकिन ज़मीनी स्तर पर वही चेहरे, वही नियुक्तियाँ और वही कार्यशैली जारी रही। प्रियंका गांधी की चुप्पी और सोनिया गांधी का परोक्ष प्रभाव पार्टी को यथास्थिति से बाहर नहीं आने दे रहा। के.सी. वेणुगोपाल का प्रबंधन, अजय माकन की संगठनात्मक रणनीति और मल्लिकार्जुन खड़गे का संतुलन—तीनों मिलकर भी पार्टी को आक्रामक राजनीतिक दिशा देने में अब तक असफल रहे हैं। कांग्रेस को अब प्रबंधन नहीं, संघर्ष और स्पष्ट निर्णय चाहिए।

अगर कांग्रेस को एक प्रभावी राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पुनर्स्थापित करना है, तो उसे प्रकोष्ठों को गैर-सरकारी संगठन जैसी मानसिकता से बाहर निकालना होगा। चेयरमैन वही हों जिन्होंने चुनाव लड़े हों, आंदोलन किए हों और कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर उतरे हों। हर प्रकोष्ठ के लिए स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य, समयबद्ध कार्यक्रम और ज़मीनी जवाबदेही तय की जाए। नियुक्तियाँ दरबारी संतुलन के बजाय संगठनात्मक प्रदर्शन के आधार पर हों।
अगर कांग्रेस ने अब भी कठोर आत्ममंथन और निर्णायक सुधार नहीं किए, तो आने वाले चुनावों में हार केवल चुनावी नहीं होगी—वह पार्टी की राजनीतिक प्रासंगिकता पर सीधा सवाल बन जाएगी।

कांग्रेस के लिए आने वाले विधानसभा चुनाव केवल एक और चुनावी चक्र नहीं हैं, बल्कि पार्टी की संगठनात्मक प्रासंगिकता की निर्णायक परीक्षा हैं। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम—चारों राज्यों में कांग्रेस की स्थिति अलग-अलग है, लेकिन संकट की जड़ एक ही है: ज़मीनी संगठन की कमजोरी और प्रकोष्ठों की निष्क्रियता।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पहले ही हाशिए पर है। अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, अल्पसंख्यक और किसान—चारों सामाजिक समूहों में पार्टी की पकड़ बेहद कमजोर हो चुकी है। ऐसे में यदि अन्य पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ, अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ, अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और किसान कांग्रेस ज़मीनी स्तर पर सक्रिय नहीं होते, तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का अस्तित्व केवल गठबंधन की बैसाखी तक सीमित रह जाएगा। सोशल मीडिया और बयानबाज़ी से उत्तर प्रदेश नहीं जीता जा सकता—यहाँ बूथ, जातीय समीकरण और निरंतर संघर्ष चाहिए, जो फिलहाल नज़र नहीं आता।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और भी गहरे संकट में है। वहाँ पार्टी का जनाधार तेज़ी से सिमट चुका है और कार्यकर्ता या तो निष्क्रिय हैं या अन्य दलों की ओर रुख कर चुके हैं। अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति मतदाता जिन पर कभी कांग्रेस की पकड़ थी, अब पार्टी से दूर जा चुके हैं। अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ की निष्क्रियता ने बंगाल में कांग्रेस को वैचारिक रूप से भी अप्रासंगिक बना दिया है। अगर प्रकोष्ठ सिर्फ़ दिल्ली-केंद्रित राजनीति करेंगे, तो बंगाल में कांग्रेस का पुनरुत्थान एक सपना ही बना रहेगा।

तमिलनाडु में कांग्रेस सत्ता की राजनीति में एक सहयोगी की भूमिका में सिमट चुकी है। वहाँ पार्टी की स्वतंत्र सांगठनिक ताक़त लगातार कमजोर होती जा रही है। महिला कांग्रेस, असंगठित मज़दूर प्रकोष्ठ और किसान कांग्रेस यदि स्थानीय मुद्दों पर स्वतंत्र हस्तक्षेप नहीं करते, तो कांग्रेस दीर्घकाल में केवल एक जूनियर साझेदार बनकर रह जाएगी। तमिलनाडु जैसे राज्य में सामाजिक न्याय की राजनीति बिना मज़बूत प्रकोष्ठों के संभव नहीं है।
असम में स्थिति और भी चिंताजनक है। नागरिकता, पहचान, भूमि और रोज़गार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कांग्रेस को आक्रामक और स्पष्ट राजनीति की ज़रूरत थी। लेकिन अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और अन्य पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ की सीमित भूमिका ने पार्टी को कमजोर किया है। असम में कांग्रेस के पास अभी भी संघर्ष की संभावना है, लेकिन उसके लिए प्रकोष्ठों को मैदान में उतरना होगा—केवल दिल्ली से निर्देश देने से काम नहीं चलेगा।
इन चारों राज्यों का साझा संदेश स्पष्ट है:
अगर कांग्रेस के प्रकोष्ठ आने वाले चुनावों से पहले सक्रिय नहीं हुए, तो पार्टी का संकट केवल चुनावी नहीं रहेगा—वह संगठनात्मक अस्तित्व का संकट बन जाएगा।

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