आम आदमी खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है। यदि सुरक्षा का भरोसा नहीं, तो सारी उपलब्धियां खोखली हैं।

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रात को सड़क पर निकलते समय यह दुआ करे कि कहीं कोई गड्ढा उसकी जिंदगी न छीन ले। विकास केवल पुलों, सड़कों और इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि आम आदमी खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है। यदि सुरक्षा का भरोसा नहीं, तो सारी उपलब्धियां खोखली हैं।

गड्ढों में गिरी व्यवस्था केवल सड़कों की समस्या नहीं है, यह हमारे शासन तंत्र की नैतिक गिरावट का प्रतीक है। यह उस दूरी को दिखाता है जो सत्ता और नागरिक के बीच बढ़ती जा रही है। जब तक हर गड्ढे को सिर्फ तकनीकी खामी समझा जाएगा और हर मौत को दुर्भाग्य कहकर टाल दिया जाएगा, तब तक यह सिलसिला रुकेगा नहीं। जरूरत इस बात की है कि हर गड्ढा एक सवाल बने, हर मौत एक चेतावनी और हर लापरवाही एक अपराध मानी जाए।

कब वे गड्ढे भरेंगे, कब व्यवस्था की दरारें बंद होंगी और कब विकास की दौड़ में भागता देश यह भरोसा पाएगा कि वह सुरक्षित हाथों में है, यह सवाल आज हर नागरिक के मन में है। शायद उस दिन हम सचमुच कह सकेंगे कि हमारा देश महान बनने की राह पर है। अभी तो लगता है कि हम महान नहीं, बल्कि परेशान हैं और यह परेशानी सिर्फ गड्ढों की नहीं, गड्ढों में गिरती संवेदनाओं की है।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)

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