
न्याय दिखाई नहीं देता। न्याय महसूस होता है l यह बात हम बचपन से सुनते आए हैं। लेकिन लोकतंत्र में न्याय केवल होना ही पर्याप्त नहीं है। जनता को यह भरोसा भी होना चाहिए कि न्याय हुआ है। और भरोसा तभी पैदा होता है, जब न्याय की प्रक्रिया पारदर्शी हो। अब सवाल यह है कि अगर न्याय की प्रक्रिया जनता के सामने हो रही हो, अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग उपलब्ध हो, लोग खुद देख और सुन सकें कि अदालत में क्या हुआ, किसने क्या कहा और किस आधार पर क्या फैसला हुआ है,तो क्या उस रिकॉर्डिंग को जनता तक पहुंचाने के लिए भी पहले अनुमति लेनी होगी?
सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश ने इस सवाल को जन्म दिया है।

अदालत ने सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल मंचों पर न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को बिना संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल या सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल की पूर्व अनुमति के निकालने, बदलने, फैलाने, पोस्ट करने, दोबारा पोस्ट करने, अपलोड करने या उससे कमाई करने पर रोक लगा दी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायिक कार्यवाही की समाचार रिपोर्टिंग पर इस आदेश का असर नहीं होगा।
अदालत की चिंता समझी जा सकती है। किसी भी न्यायिक कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को काट-छांटकर, संदर्भ से अलग करके या किसी खास उद्देश्य से वायरल किया जा सकता है। सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड का वीडियो पूरी बहस का अर्थ बदल सकता है। किसी न्यायाधीश की टिप्पणी को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जा सकता है। अदालत की गंभीर कार्यवाही को मनोरंजन में बदला जा सकता है। और किसी न्यायिक टिप्पणी को राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान क्या जनता की पहुंच को अनुमति के अधीन करना है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायपालिका केवल न्याय देने वाली संस्था नहीं है। लोकतंत्र में वह सत्ता पर निगरानी रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। जब सरकार कोई ऐसा फैसला करती है, जिससे नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं, जब पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठते हैं, जब किसी नागरिक को लगता है कि राज्य ने उसके साथ अन्याय किया है, तब वह अदालत की ओर देखता है।
ऐसे में अदालत की कार्यवाही जितनी पारदर्शी होगी, न्यायपालिका में जनता का विश्वास उतना ही मजबूत होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने खुद न्यायिक कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग और डिजिटल प्रसारण की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसका उद्देश्य ही यही था कि अदालत की कार्यवाही केवल अदालत कक्ष में मौजूद लोगों तक सीमित न रहे। तकनीक ने अदालत और जनता के बीच की दूरी कम की। नागरिकों को यह अवसर मिला कि वे अदालत में होने वाली महत्वपूर्ण संवैधानिक बहसों को खुद सुन सकें।
लेकिन अब सवाल यह है कि यदि जनता को कार्यवाही देखने की अनुमति है, तो क्या वह उसे साझा भी नहीं कर सकती?
न्यायिक कार्यवाही सार्वजनिक है या नियंत्रित सार्वजनिक? यह अंतर मामूली नहीं है। यदि अदालत की कार्यवाही सार्वजनिक है तो उसके सार्वजनिक रिकॉर्ड के इस्तेमाल के लिए अनुमति की जरूरत क्यों हो? और यदि उसका इस्तेमाल नियंत्रित है तो फिर लाइव स्ट्रीमिंग का उद्देश्य क्या है?
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि न्यायिक कार्यवाही और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाला कोई छोटा वीडियो एक ही चीज नहीं हैं। किसी रिकॉर्डिंग का गलत इस्तेमाल रोकना जरूरी है। लेकिन गलत इस्तेमाल रोकने और हर उपयोग के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य करने में बहुत बड़ा अंतर है। क्योंकि अनुमति की व्यवस्था हमेशा अपने साथ एक सवाल लेकर आती है कि अनुमति कौन देगा?
क्या हर नागरिक, पत्रकार, शोधकर्ता या कानून का विद्यार्थी अदालत की रिकॉर्डिंग का कोई हिस्सा साझा करने से पहले अदालत के रजिस्ट्रार जनरल या सेक्रेटरी जनरल के पास जाएगा? क्या हर छोटी क्लिप के लिए अनुमति मांगी जाएगी? क्या अनुमति मिलने तक मामला पुराना नहीं हो जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल कि अगर किसी न्यायिक कार्यवाही का कोई हिस्सा सार्वजनिक महत्व का हो, लेकिन उसे साझा करने की अनुमति न मिले, तब जनता उसे कैसे देखेगी?
न्यायपालिका से जुड़े मामलों में जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है। अदालतें सरकारों से पारदर्शिता मांगती हैं। पुलिस से पूछती हैं कि कार्रवाई क्यों की गई। प्रशासन से पूछती हैं कि नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन क्यों हुआ। सरकारों को जवाबदेह बनाती हैं। तो फिर न्यायपालिका के मामले में पारदर्शिता का मानदंड क्या होना चाहिए? यह सवाल अदालत के अधिकार को चुनौती देने के लिए नहीं है। अदालत को अपनी कार्यवाही की गरिमा और गंभीरता बनाए रखने का पूरा अधिकार है। न्यायालय की कार्यवाही को मनोरंजन, राजनीतिक प्रचार या अधूरी जानकारी फैलाने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
लेकिन लोकतंत्र में पारदर्शिता और नियंत्रण के बीच संतुलन बेहद जरूरी है।
कहीं ऐसा न हो कि गलत सूचना रोकने के नाम पर सही सूचना भी जनता तक पहुंचने से रुक जाए।
आज सोशल मीडिया लोकतंत्र का एक नया सार्वजनिक मंच बन चुका है। इसके अपने खतरे हैं, लेकिन इसकी अपनी भूमिका भी है। कभी-कभी अदालत में कही गई एक बात किसी ऐसे नागरिक तक पहुंचती है, जो पारंपरिक मीडिया तक नहीं पहुंच सकता। कभी कोई वीडियो उस बहस को सामने लाता है, जिसे लोग अन्यथा जान ही नहीं पाते।
बेशक, हर वीडियो सच नहीं होता। हर वायरल क्लिप पूरी सच्चाई नहीं होती। लेकिन इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि जनता को केवल वही दिखाया जाए, जिसे दिखाने की अनुमति हो।
फिर सवाल उठेगा—न्याय की पारदर्शिता का अंतिम निर्णायक कौन है?
अदालत या जनता?
लोकतंत्र में अदालत को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का अर्थ यह नहीं कि हर न्यायिक प्रक्रिया को भीड़ के हवाले कर दिया जाए। न्यायाधीशों को सोशल मीडिया की लोकप्रियता के आधार पर फैसले नहीं देने चाहिए। अदालतों को वायरल वीडियो और डिजिटल दबाव से स्वतंत्र रहना चाहिए। लेकिन जनता को अदालतों से सवाल पूछने का अधिकार भी होना चाहिए।
यदि किसी अदालत की कार्यवाही सार्वजनिक है, तो उसे देखने और समझने का अधिकार जनता का है। यदि कोई रिकॉर्डिंग सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई गई है, तो उसके जिम्मेदार इस्तेमाल पर विचार होना चाहिए। गलत इस्तेमाल के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। फर्जी संपादन के खिलाफ कानून हो सकता है। भ्रामक प्रसार पर कार्रवाई हो सकती है।
लेकिन हर साझा करने से पहले अनुमति?
यह रास्ता पारदर्शिता को धीरे-धीरे अनुमति- आधारित पारदर्शिता में बदल सकता है। और अनुमति-आधारित पारदर्शिता, असल में पारदर्शिता नहीं होती।
यहां एक और सवाल भी है। समाचार मीडिया को इस आदेश से बाहर रखा गया है। यह महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य है। लेकिन आज सूचना केवल अखबार, टेलीविजन और समाचार वेबसाइटों से नहीं चलती। एक नागरिक पत्रकार, एक कानून का छात्र, एक शोधकर्ता या कोई सामान्य नागरिक भी किसी महत्वपूर्ण न्यायिक कार्यवाही को समाज के सामने ला सकता है।
क्या लोकतंत्र में सूचना का अधिकार केवल संस्थागत मीडिया तक सीमित रहना चाहिए?
अगर कोई पत्रकार अदालत की कार्यवाही पर रिपोर्ट कर सकता है, तो क्या वह रिपोर्टिंग के समर्थन में उपलब्ध वीडियो अंश साझा नहीं कर सकता? यदि कोई कानून का विद्यार्थी किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस को समझाने के लिए अदालत की रिकॉर्डिंग का छोटा हिस्सा इस्तेमाल करना चाहता है, तो क्या उसे पहले अनुमति लेनी होगी?
इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं।
लेकिन इतना निश्चित है कि तकनीक ने न्यायपालिका और जनता के बीच संबंध बदल दिया है। अदालतें अब केवल बंद कमरों में होने वाली संस्थाएं नहीं हैं। उनकी महत्वपूर्ण कार्यवाही सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है। इसलिए पुराने नियमों और नई तकनीक के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
न्यायपालिका को अपनी गरिमा बचानी है। जनता को अपना भरोसा।
इन दोनों में टकराव नहीं होना चाहिए।
क्योंकि न्याय केवल अदालत के फैसले का नाम नहीं है। न्याय उस पूरी प्रक्रिया का नाम है, जिसमें नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी बात सुनी गई, उसके अधिकारों की रक्षा हुई और फैसला किसी दबाव में नहीं बल्कि कानून के आधार पर हुआ।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि अदालतों की रिकॉर्डिंग का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए या नहीं।
बिल्कुल रोका जाना चाहिए।
सवाल यह है कि क्या दुरुपयोग रोकने के लिए पारदर्शिता पर ही नियंत्रण लगाया जाए? आज अदालतें सरकारों से कहती हैं कि सत्ता जनता से कुछ छिपा नहीं सकती। अदालतें कहती हैं कि नागरिक को जानने का अधिकार है। अदालतें कहती हैं कि राज्य की हर कार्रवाई संविधान की कसौटी पर परखी जाएगी। तो फिर जनता भी एक सवाल पूछ सकती है कि अगर न्याय जनता के सामने हो रहा है, तो उसे देखने और समझने के लिए जनता को किसी की अनुमति क्यों चाहिए?
कहीं ऐसा तो नहीं कि आने वाले समय में न्याय जनता के सामने होगा, लेकिन जनता उसे अपनी मर्जी से देख नहीं सकेगी?
तब न्याय होगा जरूर।
लेकिन दिखेगा नहीं।
सिर्फ सुनाया जाएगा।

