
देश का भविष्य बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिक्षा की है। यह बात हर सरकार कहती है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक, हर मंच से बच्चों और युवाओं को देश का भविष्य बताया जाता है। लेकिन जब बजट आता है तो भविष्य के निर्माण की प्राथमिकता बदल जाती है। शिक्षा पर खर्च बढ़ाने के बजाय सरकारों का जोर सड़कों, एक्सप्रेसवे और दूसरी बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर अधिक दिखाई देता है।
इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने पिछले 12 वर्षों में शिक्षा पर सरकारी खर्च की हिस्सेदारी घटने पर सवाल उठाया है। उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश की राजधानी में शिक्षा और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर आंदोलन चल रहा है। यह स्थिति सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

सवाल यह नहीं है कि देश में सड़कें बननी चाहिएं या नहीं। सड़कें विकास के लिए जरूरी हैं। सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल सड़कें, पुल और एक्सप्रेसवे बनाना रह गया है? क्या किसी देश का भविष्य केवल उसके बुनियादी ढांचे से तय होता है? अगर ऐसा होता तो दुनिया के सबसे विकसित देश अपने बजट का बड़ा हिस्सा स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, शोध और विद्यार्थियों पर खर्च नहीं करते। शिक्षा पर खर्च को सरकारें अक्सर खर्च मानती हैं, जबकि वास्तव में यह देश के भविष्य में निवेश है। सड़क बनाने के बाद उसका उद्घाटन किया जा सकता है। उसकी तस्वीरें खिंचवाई जा सकती हैं और उसका राजनीतिक लाभ लिया जा सकता है। शिक्षा का परिणाम दिखाई देने में वर्षों लगते हैं। शायद यही कारण है कि राजनीति में सड़क और पुल शिक्षा से अधिक आकर्षक दिखाई देते हैं।
लेकिन देश का भविष्य उद्घाटन पट्टिकाओं से नहीं बनता। वह कक्षाओं में बनता है। वह उन स्कूलों में बनता है जहां बच्चे पढ़ते हैं, उन विश्वविद्यालयों में बनता है जहां शोध होता है और उन प्रयोगशालाओं में बनता है जहां नई खोजें होती हैं।
आज भारत का युवा जिस बेचैनी से गुजर रहा है, उसे केवल बेरोजगारी के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएं, पेपर लीक, परीक्षाओं के परिणाम में देरी, विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के खाली पद और महंगी होती शिक्षा ने युवाओं के भीतर गहरी निराशा पैदा की है। लाखों विद्यार्थी वर्षों तक मेहनत करते हैं। परिवार अपनी जमा पूंजी उनकी पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर खर्च करते हैं। लेकिन जब व्यवस्था ही भरोसे के लायक न रहे तो युवा आखिर किससे सवाल पूछे?
सीजेपी के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन इसी बेचैनी का एक रूप है। सरकार इसे राजनीतिक आंदोलन कहकर खारिज कर सकती है, लेकिन शिक्षा से जुड़े सवालों को राजनीतिक कह देने से वे समाप्त नहीं हो जाते। युवा यह जानना चाहते हैं कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ क्यों हो रहा है। वे पूछना चाहते हैं कि परीक्षाओं में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब होगी। वे पूछना चाहते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय सरकारों की प्राथमिकता दूसरी परियोजनाएं क्यों बन जाती हैं।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जब युवा सवाल पूछता है तो सरकार अक्सर जवाब देने के बजाय उसे नियंत्रित करने की कोशिश करती है। आंदोलन को रोकना आसान है, लेकिन असंतोष को रोकना आसान नहीं। पुलिस की मौजूदगी से किसी प्रदर्शन को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है, लेकिन उस युवा के भीतर पैदा हुए सवाल को नहीं रोका जा सकता जिसे लगता है कि उसकी मेहनत, उसका समय और उसका भविष्य व्यवस्था की लापरवाही की कीमत चुका रहे हैं।
सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा का संकट केवल शिक्षा मंत्रालय का विषय नहीं है। यह देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र से जुड़ा हुआ सवाल है। जिस देश की युवा पीढ़ी अच्छी शिक्षा से वंचित रहेगी, वह देश लंबे समय तक मजबूत अर्थव्यवस्था नहीं बन सकता। जिस देश के विश्वविद्यालय कमजोर होंगे, वह ज्ञान आधारित दुनिया में नेतृत्व नहीं कर सकता। और जिस देश के युवाओं को अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, वहां लोकतंत्र को आत्ममंथन की जरूरत है।
सड़कें जरूरी हैं, लेकिन शिक्षा उनसे ज्यादा जरूरी है। एक्सप्रेसवे जरूरी हैं, लेकिन ऐसे विश्वविद्यालय उनसे ज्यादा जरूरी हैं जहां दुनिया के स्तर का शोध हो। भवन जरूरी हैं, लेकिन उन भवनों में पढ़ाने के लिए शिक्षक भी चाहिएं। योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उनके लाभार्थियों का भविष्य भी सुरक्षित होना चाहिए।
सरकारों को तय करना होगा कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ना चाहती हैं—सड़कों का जाल या ज्ञान की मजबूत नींव।
क्योंकि सड़कें देश को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाती हैं। शिक्षा देश को आगे ले जाती है।
और अगर सरकार शिक्षा पर खर्च घटाकर सड़कें बनाने को ही विकास समझ रही है, तो युवाओं का यह सवाल बिल्कुल जायज है कि आखिर उनके भविष्य का बजट कौन बनाएगा?

