मुद्दे की बात :-हादसे नहीं, यह व्यवस्था की हत्या है:- लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-:आलोक गौड़।


– उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज में कोचिंग सेंटर वाली इमारत में लगी आग में कई छात्रों की मौत की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। लेकिन सच यह है कि हमें केवल शोक में डूबने की नहीं, गुस्सा करने की जरूरत है। क्योंकि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी। यह कोई ऐसी दुर्घटना नहीं थी जिसे रोका नहीं जा सकता था। यह व्यवस्था की नाकामी से हुई मौत है।


हर बार कहानी लगभग एक जैसी होती है। कहीं अस्पताल में आग लगती है, कहीं स्कूल में, कहीं फैक्ट्री में, कहीं कोचिंग सेंटर में। लोग मरते हैं, सरकार संज्ञान लेती है, जांच के आदेश दिए जाते हैं, मुआवजे की घोषणा होती है और कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन जो सामान्य नहीं होता, वह है उन परिवारों का जीवन, जिनके बच्चे वापस नहीं लौटते। सवाल यह है कि आखिर देश के शहरों में चल रहे हजारों कोचिंग सेंटरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या फायर विभाग ने कभी जांच की? क्या स्थानीय प्रशासन ने भवन की क्षमता और सुरक्षा मानकों को देखा? क्या संस्थान संचालकों ने छात्रों की संख्या बढ़ाने के साथ सुरक्षा इंतजाम भी बढ़ाए? या फिर सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा था?
देश में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव इतना बढ़ चुका है कि कोचिंग उद्योग एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन गया है। करोड़ों रुपये की फीस वसूली जाती है। सफलता के विज्ञापन लगाए जाते हैं। लेकिन सुरक्षा की बात आते ही सबकी चुप्पी शुरू हो जाती है। ऐसा लगता है कि छात्र केवल फीस जमा करने तक महत्वपूर्ण हैं, उनकी जान नहीं।
यह भी कम विडंबना नहीं कि हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन अचानक सक्रिय हो जाता है। छापे पड़ते हैं। नोटिस जारी होते हैं। अवैध निर्माण खोजे जाते हैं। सवाल यह है कि ये सब हादसे से पहले क्यों नहीं होता? क्या अधिकारियों को सुरक्षा खामियां केवल मौतों के बाद दिखाई देती हैं? सच्चाई यह है कि हमारे यहां जवाबदेही का तंत्र लगभग समाप्त हो चुका है। जब तक किसी घटना पर मीडिया का दबाव न बने, कोई जिम्मेदार नहीं होता। और जब दबाव बनता है तो जिम्मेदारी इतनी जगह बांट दी जाती है कि अंततः कोई दोषी बचता ही नहीं।
आज जरूरत केवल लखनऊ की घटना की जांच की नहीं है। जरूरत देशभर के कोचिंग सेंटरों, लाइब्रेरियों, हॉस्टलों और ऐसे सभी शिक्षण संस्थानों के सुरक्षा ऑडिट की है। जरूरत यह तय करने की है कि यदि किसी संस्थान की लापरवाही से एक भी जान जाती है तो उसके संचालक और संबंधित अधिकारी सीधे आपराधिक जिम्मेदारी के दायरे में आएं।
क्योंकि मौतें आग से कम और लापरवाही से ज्यादा होती हैं।
यदि लखनऊ की यह त्रासदी भी कुछ दिनों की खबर बनकर रह गई, तो हमें अगली दुर्घटना का इंतजार शुरू कर देना चाहिए। क्योंकि तब तक न तो इमारतें बदलेंगी, न नियमों का पालन होगा और न ही व्यवस्था की सोच।
मुद्दा आग का नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या इस देश में बच्चों की जान की कीमत किसी फाइल, किसी लाइसेंस और किसी अधिकारी की सुविधा से ज्यादा है या नहीं?
जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी हर मौत को हादसा नहीं, व्यवस्था द्वारा की गई हत्या माना जाना चाहिए।

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