

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर के लिए लाखों करोड़ों लोगों ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया था l यह बात दीगर है कि जब यह मंदिर बन कर तैयार हुआ तो इसके लिए हर प्रकार की आहुति देने वालों को दर किनार कर दिया गया l इसलिए जब मंदिर के दान और प्रबंधन को लेकर सवाल उठते हैं, तो सबसे पहले जवाब आने चाहिए, बहाने नहीं। कहा जा रहा है कि व्यवस्था सुधारने के लिए किसी वरिष्ठ नौकरशाह को सीईओ बना दिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर घोटाले, हर गड़बड़ी और हर विवाद का समाधान एक नया बाबू नियुक्त करना ही रह गया है? यदि करोड़ों रुपये के दान में गड़बड़ी की आशंका है तो एफआईआर कहां है? जांच एजेंसियां कहां हैं? जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कहां है? हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों ने वर्षों तक पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे ऊंची आवाज उठाई, वही आज सवालों से असहज दिखाई देते हैं। क्या राम मंदिर इतना कमजोर है कि वह जांच और ऑडिट का सामना नहीं कर सकता? या फिर कुछ लोग राम के नाम पर जवाबदेही से भी ऊपर उठ जाना चाहते हैं? राम किसी दल, संगठन या ट्रस्ट की निजी संपत्ति नहीं हैं। राम पूरे देश की आस्था हैं। इसलिए राम के नाम पर आए एक-एक रुपये का हिसाब मांगना भी देश का अधिकार है। जो लोग सवाल पूछ रहे हैं, वह मंदिर के विरोधी नहीं हैं। वह चाहते हैं कि राम के नाम पर बना यह प्रतीक किसी भी तरह के संदेह से ऊपर रहे।
मुद्दा किसी अधिकारी की नियुक्ति का नहीं है। मुद्दा यह है कि अगर गड़बड़ी हुई है तो दोषी कौन हैं और अगर गड़बड़ी नहीं हुई तो फिर जांच से डर किस बात का है?
मुद्दे की बात यह है कि राम के नाम पर चंदा लेते समय जनता याद रहती है, लेकिन राम के नाम पर हिसाब देने की बारी आती है तो सवाल पूछने वाले ही कठघरे में खड़े कर दिए जाते हैं।

