

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बहस चल रही है। सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी सफल हो रहे हैं या असफल। सवाल यह भी नहीं है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे पाएंगे या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारतीय विपक्ष अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है?
क्योंकि सच यही है कि आज राहुल गांधी की परीक्षा नहीं हो रही, बल्कि पूरे विपक्ष की परीक्षा हो रही है।
लोकतंत्र में सत्ता का मजबूत होना अच्छी बात है। लेकिन सत्ता इतनी मजबूत हो जाए कि विपक्ष ही कमजोर पड़ने लगे, तब चिंता शुरू होती है। लोकतंत्र सरकार और विपक्ष, दोनों के संतुलन पर चलता है। सरकार जितनी जरूरी होती है, उतना ही जरूरी एक ऐसा विपक्ष भी होता है जो सवाल पूछ सके, जवाब मांग सके और जनता के सामने एक वैकल्पिक रास्ता रख सके।

आज देश में विपक्ष का सबसे बड़ा संकट यही है कि उसके पास सवाल तो हैं, लेकिन एकजुटता नहीं है। उसके पास असंतोष तो है, लेकिन संगठन नहीं है। उसके पास नेता बहुत हैं, लेकिन नेतृत्व नहीं है ऐसे माहौल में राहुल गांधी स्वाभाविक रूप से विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे हैं। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर संसद के भीतर और बाहर लगातार आक्रामक तेवर अपनाने तक उन्होंने यह साबित किया है कि वे संघर्ष करने से पीछे हटने वाले नेता नहीं हैं। उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक ध्रुवीकरण, आर्थिक असमानता और संस्थाओं की निष्पक्षता जैसे मुद्दों को लगातार उठाया है।
लेकिन राजनीति केवल सवाल पूछने का नाम नहीं है। राजनीति जवाब देने की क्षमता का भी नाम है।
यहीं राहुल गांधी और विपक्ष, दोनों के सामने चुनौती खड़ी हो जाती है।
देश यह जानना चाहता है कि यदि वर्तमान सत्ता व्यवस्था से असहमति है तो विकल्प क्या है? यदि आर्थिक नीतियां गलत हैं तो सही नीतियां क्या हैं? यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर खतरा है तो उन्हें मजबूत कैसे किया जाएगा? यदि बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है तो रोजगार पैदा करने का रोडमैप क्या है?
इन सवालों का जवाब केवल आलोचना से नहीं दिया जा सकता।
विपक्ष की एक और समस्या है। वह भाजपा के केंद्रीकृत नेतृत्व की आलोचना तो करता है, लेकिन खुद नेतृत्व के सवाल पर एकमत नहीं दिखता। हर क्षेत्रीय दल अपने राज्य में मजबूत है। हर नेता राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका देखता है। लेकिन जब साझा नेतृत्व की बात आती है तो सहमति बिखरने लगती है।
यही वजह है कि राहुल गांधी को लेकर समर्थन और संकोच, दोनों साथ-साथ दिखाई देते हैं।
कांग्रेस चाहती है कि राहुल गांधी विपक्ष का चेहरा बनें। लेकिन कई क्षेत्रीय दल चाहते हैं कि नेतृत्व सामूहिक हो। यह असमंजस केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि विपक्ष की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी भी है।
दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी को सबसे अधिक महत्व उनके विरोधी देते हैं। भाजपा का लगभग पूरा राजनीतिक विमर्श अक्सर राहुल गांधी के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है। इसका कारण साफ है। भाजपा जानती है कि विपक्ष को यदि कोई राष्ट्रीय चेहरा मिल सकता है तो वह राहुल गांधी ही हैं।
लेकिन राष्ट्रीय चेहरा होना और राष्ट्रीय नेतृत्व स्थापित कर लेना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। राहुल गांधी को अब यह साबित करना होगा कि वे केवल विरोध की राजनीति के नेता नहीं हैं। वह शासन, नीति और वैकल्पिक दृष्टि की राजनीति भी कर सकते हैं। उन्हें यह भरोसा पैदा करना होगा कि वे केवल सरकार की आलोचना नहीं कर रहे, बल्कि देश के लिए एक अलग दिशा भी प्रस्तुत कर रहे हैं। हालांकि इस पूरी बहस में एक खतरा भी छिपा है। विपक्ष का भविष्य केवल राहुल गांधी के कंधों पर डाल देना एक राजनीतिक आलस्य है। लोकतंत्र में विपक्ष किसी एक व्यक्ति से नहीं बनता। वह विचार, संगठन, संघर्ष और जनविश्वास से बनता है। यदि विपक्ष यह मान बैठे कि केवल राहुल गांधी उसकी सारी समस्याओं का समाधान हैं, तो वह खुद अपनी जिम्मेदारी से बच रहा होगा।
आज जरूरत किसी एक नायक की नहीं है। जरूरत एक ऐसे राजनीतिक विकल्प की है जो जनता को विश्वास दिला सके कि सत्ता बदलने से केवल चेहरे नहीं बदलेंगे, बल्कि नीतियां और प्राथमिकताएं भी बदलेंगी।
यही वह कसौटी है जिस पर राहुल गांधी भी परखे जाएंगे और पूरा विपक्ष भी।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट तब नहीं होता जब सरकार मजबूत होती है। सबसे बड़ा संकट तब होता है जब विपक्ष अपनी भूमिका भूलने लगता है।
और आज का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है कि क्या विपक्ष अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है, या फिर वह केवल सत्ता की आलोचना तक सीमित रह जाएगा?
मुद्दा राहुल गांधी नहीं हैं।
मुद्दा विपक्ष की प्रासंगिकता है। और यही आज की सबसे बड़ी बात है।

