

दिल्ली में एक नदी बहती है। कागजों में उसका नाम यमुना है। भाषणों में वह आस्था है। चुनावी घोषणापत्रों में वह संकल्प है। बजट में वह प्राथमिकता है। लेकिन हकीकत में वह भारतीय राजनीति की सबसे लंबी, सबसे महंगी और सबसे शर्मनाक विफलताओं में से एक बन चुकी है।
यमुना का पानी आज जितना प्रदूषित दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक प्रदूषित उसके नाम पर की गई राजनीति है।
दिल्ली का शायद ही कोई नागरिक होगा जिसने अपने जीवन में कम से कम एक बार यह न सुना हो कि “यमुना साफ की जाएगी।” यह वादा इतना पुराना हो चुका है कि अब लोग इसे सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि राजनीतिक परंपरा मानने लगे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि सरकारें बदलती रहती हैं और वादा वही रहता है।
चार दशक बीत चुके हैं।
कांग्रेस की सरकारें आईं।
भाजपा की सरकारें आईं।

आम आदमी पार्टी सत्ता में आई। मुख्यमंत्री बदले, मंत्री बदले, अधिकारी बदले, योजनाएं बदलीं, नारे बदले, प्राथमिकताएं बदलीं, लेकिन नहीं बदली तो यमुना की तस्वीर। आज भी दिल्ली में यमुना का एक बड़ा हिस्सा नदी कम और बहता हुआ नाला ज्यादा दिखाई देता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्यों है? क्या देश में संसाधनों की कमी थी? क्या तकनीक उपलब्ध नहीं थी? क्या विशेषज्ञ नहीं थे? क्या धन नहीं था?
या फिर समस्या कहीं और थी?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यमुना सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। अनगिनत परियोजनाएं बनाई गईं। दर्जनों समितियां गठित हुईं। सैकड़ों बैठकें हुईं। समय-समय पर बड़े-बड़े दावे किए गए। लेकिन जब परिणामों की बात आती है तो तस्वीर वही पुरानी दिखाई देती है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यमुना पुनर्जीवन परियोजना की समीक्षा करते हुए कहा कि अब केवल “संतोषजनक कार्य” से काम नहीं चलेगा, बल्कि “सटीक परिणाम” चाहिए। उन्होंने हर बीस दिन में प्रगति रिपोर्ट देने और समयबद्ध कार्यवाही सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। सुनने में यह एक सामान्य प्रशासनिक टिप्पणी लग सकती है, लेकिन राजनीति में कोई भी वाक्य केवल वाक्य ही नहीं होता। उसके पीछे एक संदेश छिपा होता है। आखिर चार दशक पुरानी परियोजना पर यदि आज भी देश के गृह मंत्री को यह कहना पड़ रहा है कि अब परिणाम चाहिए, तो इसका सीधा अर्थ क्या है? क्या इसका मतलब यह नहीं कि अब तक मिले परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे? क्या इसका मतलब यह नहीं कि व्यवस्था की गति और प्रभावशीलता को लेकर स्वयं सत्ता के शीर्ष स्तर पर असंतोष है? और क्या यह भी नहीं दर्शाता कि इतने वर्षों के प्रयासों के बावजूद यमुना सफाई का लक्ष्य अभी भी अधूरा है? यहां एक और दिलचस्प तथ्य है। आज केंद्र में भाजपा की सरकार है।
दिल्ली में भाजपा की सरकार है। नगर निगम में भी भाजपा का प्रभाव है। ऐसे में अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की पारंपरिक गुंजाइश बहुत सीमित हो जाती है। अब यह कहकर नहीं बचा जा सकता कि दूसरी सरकार काम नहीं करने दे रही थी। अब यह तर्क भी कमजोर पड़ जाता है कि अधिकार किसी और के पास थे और जिम्मेदारी किसी और की थी। यही वह क्षण है जहां लोकतंत्र जवाब मांगता है।
लोकतंत्र में सत्ता केवल अधिकार का नाम नहीं है। सत्ता जवाबदेही का भी नाम है। यदि सफलता का श्रेय लिया जाएगा तो असफलता की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी। लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में श्रेय लेने वालों की संख्या हमेशा जिम्मेदारी लेने वालों से अधिक रही है। यमुना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
जब कोई नई योजना शुरू होती है तो उसका उद्घाटन होता है। जब बजट स्वीकृत होता है तो विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। जब मशीनें लगती हैं तो तस्वीरें खिंचती हैं।
लेकिन जब परिणाम नहीं आते तो जिम्मेदार कौन है, इसका जवाब कभी नहीं मिलता। यही कारण है कि यमुना आज एक नदी से ज्यादा एक राजनीतिक दस्तावेज बन चुकी है। ऐसा दस्तावेज जिसमें चार दशक की घोषणाएं दर्ज हैं, लेकिन उपलब्धियां बहुत कम दिखाई देती हैं। कभी कहा गया कि नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बन जाएंगे तो समस्या हल हो जाएगी। फिर कहा गया कि नालों को इंटरसेप्ट कर लिया जाएगा तो यमुना साफ हो जाएगी। फिर औद्योगिक प्रदूषण को मुख्य कारण बताया गया। फिर नई तकनीक की बात हुई।
फिर नई समय-सीमाएं तय हुईं।
आज फिर नई निगरानी व्यवस्था की चर्चा है।
लेकिन दिल्ली पूछ रही है कि आखिर इस बार ऐसा क्या अलग होगा जो पिछले चालीस वर्षों में नहीं हुआ?
यह सवाल विपक्ष का नहीं है।
यह सवाल हर उस नागरिक का है जिसके कर के पैसे से ये परियोजनाएं चलाई गईं।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि यमुना सफाई पर कुल कितना धन खर्च हुआ? कितनी परियोजनाएं समय पर पूरी हुईं? कितनी परियोजनाएं अपने घोषित लक्ष्य तक पहुंचीं? कितने अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई? कितने मंत्रियों ने अपनी विफलता स्वीकार की? और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इतना सब होने के बाद भी यमुना आज इस हालत में क्यों है? दरअसल यमुना का संकट केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है।
यह प्रशासनिक संकट है।
यह राजनीतिक संकट है।
यह जवाबदेही का संकट है।
नदी में गिरने वाले नाले दिखाई देते हैं, लेकिन व्यवस्था के भीतर बह रही लापरवाही दिखाई नहीं देती। प्रदूषण की मात्रा मापी जा सकती है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को किसी प्रयोगशाला में नहीं नापा जा सकता।यमुना की सबसे बड़ी त्रासदी उसका गंदा पानी नहीं है। उसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसके नाम पर सबने राजनीति की, लेकिन उसकी जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली।
दिल्ली को अब बैठकों की संख्या में रुचि नहीं है।
उसे समीक्षा बैठकों की तस्वीरें नहीं चाहिए। उसे नए नारे नहीं चाहिए।उसे नई समय-सीमाएं भी नहीं चाहिए। दिल्ली को सिर्फ परिणाम चाहिए। उसे वह यमुना चाहिए जिसके बारे में इतिहास और साहित्य में पढ़ाया जाता है, न कि वह यमुना जिसे देखकर बच्चे पूछें कि क्या यह सचमुच एक नदी है?
यदि चार दशक बाद भी हमें नई समय-सीमा तय करनी पड़ रही है, यदि हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी हमें नई निगरानी व्यवस्था बनानी पड़ रही है, यदि सैकड़ों बैठकों के बाद भी हमें परिणाम मांगने पड़ रहे हैं, तो समस्या केवल प्रदूषण की नहीं है।
समस्या व्यवस्था की है।
समस्या जवाबदेही की है।
समस्या उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें वादे बार-बार किए जाते हैं, लेकिन उनका हिसाब कभी नहीं दिया जाता। यमुना को अब एक और घोषणा नहीं चाहिए। उसे एक और संकल्प नहीं चाहिए। उसे एक और समीक्षा बैठक नहीं चाहिए।
उसे परिणाम चाहिए।
और दिल्ली को भी।
क्योंकि यदि इस बार भी जवाब नहीं मिला तो इतिहास शायद यह दर्ज करेगा कि यमुना को सबसे ज्यादा नुकसान उसके पानी में गिरने वाले प्रदूषण ने नहीं पहुंचाया, बल्कि उसे साफ करने के नाम पर की गई राजनीति ने पहुंचाया। और तब सवाल यह नहीं रहेगा कि यमुना कितनी गंदी है। सवाल यह होगा कि आखिर यमुना में ज्यादा गंदगी है या हमारी राजनीति में?

