

लोकतंत्र की असली ताकत संसद भवन की ऊंची इमारतों, चुनावी रैलियों की भीड़ या सरकारों के विशाल बहुमत से नहीं मापी जाती। उसकी असली ताकत इस बात से मापी जाती है कि वहां सत्ता की आलोचना करने वालों के साथ कैसा व्यवहार होता है। व्यवस्था अपने समर्थकों को सम्मान देती है, वह सामान्य बात है। लेकिन जो व्यवस्था अपने आलोचकों के अधिकारों की रक्षा करती है, वही वास्तव में लोकतांत्रिक कहलाने की अधिकारी होती है। इसी कसौटी पर आज देश के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा है। प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं है। प्रश्न किसी एक मठ, एक परंपरा या एक विवाद का भी नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या इस देश में सत्ता से असहमति रखने का अधिकार सुरक्षित है?

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद इसी बड़े प्रश्न के केंद्र में आकर खड़ा हो गया है। कुछ समय पहले तक वह एक सम्मानित धर्माचार्य के रूप में अपनी धार्मिक और सामाजिक भूमिका निभा रहे थे। फिर उन्होंने बेरोजगारी पर बात की। किसानों की समस्याओं पर बात की। मणिपुर की पीड़ा पर चिंता व्यक्त की। गोवंश और सनातन से जुड़े उन प्रश्नों को उठाया जिन्हें राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर देखने की जरूरत थी। उन्होंने समय-समय पर ऐसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखी जो सत्ताधारियों को असुविधाजनक लग सकते थे। यहीं से विवाद शुरू होता दिखाई देता है।
लोकतंत्र में विचारों का विरोध स्वाभाविक है। किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति के विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र का संकट तब शुरू होता है जब विचारों का जवाब विचारों से नहीं दिया जाता। जब बहस की जगह बदनाम करने की कोशिश शुरू हो जाती है। जब तर्कों की जगह आरोप ले लेते हैं। जब असहमति को शत्रुता और आलोचना को अपराध बना दिया जाता है।
इसी संदर्भ में आशुतोष ब्रह्मचारी के कथित कबूलनामे की चर्चा सामने आती है। यदि वास्तव में ऐसा कोई बयान मौजूद है जिसमें यह स्वीकार किया गया है कि शंकराचार्य के खिलाफ पूरा घटनाक्रम सुनियोजित था, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। यदि यह दावा झूठा है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि इसमें लेशमात्र भी सच्चाई है, तो यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ षड्यंत्र का मामला नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।यहां एक पल ठहरकर हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक शंकराचार्य अचानक कुछ लोगों की आंखों की किरकिरी बन गए?
क्या उनका अपराध यह है कि उन्होंने सत्ता की सुविधा के अनुसार अपने विचार बदलने से इनकार कर दिया?
क्या उनका अपराध यह है कि उन्होंने सरकार और राष्ट्र के बीच अंतर करने का साहस दिखाया? क्या उनका अपराध यह है कि उन्होंने उन विषयों पर बोलने का प्रयास किया जिन पर अक्सर मौन रहने की अपेक्षा की जाती है? या फिर उनका अपराध केवल इतना है कि उन्होंने प्रश्न पूछे? दरअसल आज देश में एक विचित्र वातावरण बनता दिखाई देता है। जो व्यक्ति सरकार की प्रशंसा करता है, वह राष्ट्रभक्त घोषित कर दिया जाता है। जो व्यक्ति सरकार की आलोचना करता है, उसकी निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिश शुरू हो जाती है। जो सत्ता के मंच पर दिखाई देता है, वह सम्मानित है। जो सत्ता से प्रश्न पूछता है, वह संदिग्ध हो जाता है।
यह प्रवृत्ति केवल राजनीति के लिए खतरनाक नहीं है। यह लोकतंत्र और सनातन—दोनों के लिए खतरनाक है।
क्योंकि सनातन की परंपरा कभी दरबारी नहीं रही।
आदि शंकराचार्य ने भारत भ्रमण किसी राजा की आज्ञा से नहीं किया था। उन्होंने किसी सत्ता के संरक्षण में शास्त्रार्थ नहीं किए थे। उन्होंने विचारों का सामना विचारों से किया था। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का गौरव ही यह रहा है कि यहां संत सत्ता के प्रवक्ता नहीं बने। उन्होंने समय-समय पर समाज और सत्ता दोनों को आईना दिखाने का काम किया। कबीर ने प्रश्न पूछे थे।
गुरु नानक ने प्रश्न पूछे थे।
रैदास ने प्रश्न पूछे थे।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने प्रश्न पूछे थे। स्वामी विवेकानंद ने प्रश्न पूछे थे।
इनमें से किसी ने भी सच बोलने के लिए किसी शासक से अनुमति नहीं मांगी थी।
भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि यहां प्रश्न पूछना विद्रोह नहीं माना गया। यहां असहमति को परंपरा का हिस्सा माना गया। यहां शास्त्रार्थ हुए, संवाद हुए, मतभेद हुए, लेकिन विचारों की लड़ाई विचारों से लड़ी गई।
यही कारण है कि आज का विवाद केवल एक शंकराचार्य का विवाद नहीं है।
यह उस परंपरा का विवाद है जिसमें सत्य को सत्ता से ऊपर माना गया। यह उस विचार का विवाद है जिसमें धर्माचार्य का दायित्व किसी सरकार की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि समय आने पर उसे आईना दिखाना भी माना गया। दुर्भाग्य से आज एक नई प्रवृत्ति विकसित होती दिखाई देती है। कुछ लोगों को स्वतंत्र संत स्वीकार नहीं हैं। उन्हें ऐसे संत चाहिए जो मंच साझा करें। उन्हें ऐसे संत चाहिए जो हर निर्णय को ऐतिहासिक बताएं। उन्हें ऐसे संत चाहिए जो कभी प्रश्न न पूछें। उन्हें ऐसे संत चाहिए जो केवल समर्थन करें। लेकिन जिस दिन संत प्रश्न पूछना छोड़ देंगे, उसी दिन समाज दिशा खो देगा। जिस दिन धर्माचार्य सत्ता की आलोचना करने से डरने लगेंगे, उसी दिन धर्म की नैतिक शक्ति कमजोर हो जाएगी। और जिस दिन शंकराचार्य, अखाड़े, मठ और मंदिर राजनीतिक सत्ता के विस्तार बन जाएंगे, उस दिन धर्म शायद बचा रह जाएगा, लेकिन धर्म की आत्मा मर जाएगी। यहां यह भी समझना आवश्यक है कि असहमति का अधिकार किसी व्यक्ति की कृपा से नहीं मिलता। यह लोकतंत्र का मूल अधिकार है। आज यदि कोई पत्रकार प्रश्न पूछता है तो उसे कटघरे में खड़ा किया जाता है। कोई छात्र रोजगार मांगता है तो उसे कटघरे में खड़ा किया जाता है। कोई किसान अपनी उपज का उचित मूल्य मांगता है तो उसे कटघरे में खड़ा किया जाता है।
कोई सामाजिक कार्यकर्ता सरकार की नीति पर सवाल उठाता है तो उसे कटघरे में खड़ा किया जाता है।
और अब यदि कोई शंकराचार्य प्रश्न पूछता है, तो वह भी विवादों के घेरे में दिखाई देने लगता है।
फिर प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर लोकतंत्र में कटघरा किसके लिए बचा है?
क्या कटघरा केवल आलोचकों के लिए है?
क्या सत्ता से प्रश्न पूछना ही सबसे बड़ा अपराध बनता जा रहा है? इतिहास हमें सावधान करता है। सत्ता चाहे किसी की भी रही हो, उसे अपने आलोचक कभी पसंद नहीं आए। फर्क केवल इतना होता है कि कोई सत्ता अपने असहिष्णु व्यवहार को छिपाने की कोशिश करती है और कोई उसे उपलब्धि की तरह प्रस्तुत करती है। लेकिन इतिहास का फैसला हमेशा एक जैसा रहा है। सत्ता की ताकत अस्थायी होती है, जबकि सत्य की शक्ति स्थायी होती है।राजा बदलते रहते हैं।
सरकारें बदलती रहती हैं।
विचारधाराएं बदलती रहती हैं।लेकिन सच बोलने की परंपरा बची रहती है।
इसीलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति-पूजा की नहीं है। आवश्यकता निष्पक्षता की है। यदि शंकराचार्य के खिलाफ आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच हो। यदि षड्यंत्र के आरोप हैं तो उनकी भी निष्पक्ष जांच हो। लेकिन जांच का उद्देश्य सत्य होना चाहिए, किसी पूर्व निर्धारित निष्कर्ष को साबित करना नहीं। क्योंकि यह केवल एक धर्माचार्य की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों के विश्वास का प्रश्न है जो आज भी मानते हैं कि इस देश में सच बोलना अपराध नहीं होना चाहिए।
यह उन लोगों के विश्वास का प्रश्न है जो मानते हैं कि राष्ट्र और सरकार एक नहीं हैं।
यह उन लोगों के विश्वास का प्रश्न है जो मानते हैं कि लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं होती। और यह उस सनातन परंपरा का भी प्रश्न है जिसने हमेशा सत्य को सिंहासन से ऊपर स्थान दिया। आज इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शंकराचार्य सही हैं या गलत।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उन्हें अपनी बात कहने का अधिकार है?
क्या एक शंकराचार्य सरकार से अलग राय रख सकता है?
क्या धर्माचार्य का काम केवल समर्थन करना है? क्या असहमति को देशद्रोह और आलोचना को षड्यंत्र मान लेने से लोकतंत्र मजबूत होगा?और सबसे बड़ा सवाल है कटघरे में कि आखिर है कौन? शंकराचार्य?
या फिर सच बोलने की वह परंपरा जिससे हर दौर की सत्ता असहज रही है?
क्योंकि यदि सच बोलने वाले एक-एक करके कटघरे में खड़े किए जाने लगें, तो याद रखिए, समस्या उन लोगों में नहीं होती जो प्रश्न पूछ रहे होते हैं। समस्या उस व्यवस्था में होती है जो प्रश्न सुनना नहीं चाहती। और जब व्यवस्था प्रश्न सुनना बंद कर देती है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे चुनावों से चलने वाली व्यवस्था तो रह जाता है, लेकिन विचारों से चलने वाला लोकतंत्र नहीं रह जाता। यही इस पूरे विवाद का सार है।मुद्दा किसी शंकराचार्य का नहीं है।
मुद्दा असहमति का है।
मुद्दा अभिव्यक्ति का है।
मुद्दा लोकतंत्र का है।
और यही वास्तव में मुद्दे की बात है।

