मुद्दे की बात :–डबल इंजन की सरकार और सूखी टंकियां –: लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-+:आलोक गौड़


नई दिल्ली l प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपनी मंत्रिपरिषद के सदस्यों के साथ ही देशवासियों को सलाह दी थी कि भीषण गर्मी में खूब पानी पीजिए। प्यास न लगे तब भी पानी पीजिए। शरीर में पानी की कमी मत होने दीजिए। यह सलाह चिकित्सा विज्ञान के अनुरूप है। समस्या सलाह में नहीं है। समस्या यह है कि देश की राजधानी दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा इस समय पानी के लिए संघर्ष कर रहा है।
सवाल यह नहीं है कि लोगों को पानी पीना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि लोगों को पानी मिलेगा कहां से?
दिल्ली में जल संकट कोई नई घटना नहीं है। लगभग हर वर्ष गर्मियों में पानी का मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ जाता है। लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं। इस बार बहाने कम हैं और जवाबदेही ज्यादा है।
दिल्ली सरकार का आरोप है कि हरियाणा यमुना में दिल्ली के हिस्से का पूरा पानी नहीं छोड़ रहा। इसके कारण वज़ीराबाद जलाशय का जलस्तर सामान्य स्तर से नीचे चला गया है और जल शोधन संयंत्रों की उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है। परिणामस्वरूप राजधानी के अनेक हिस्सों में पानी की आपूर्ति बाधित हो रही है।
यदि यह आरोप सही है तो मामला बेहद गंभीर है l क्योंकि दिल्ली को पानी देना हरियाणा की सदाशयता का विषय नहीं है। यह कानूनी दायित्व है। 12 मई 1994 को यमुना जल बंटवारे को लेकर हुए अंतरराज्यीय समझौते में दिल्ली के हिस्से का पानी निर्धारित किया गया था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया कि दिल्ली की पेयजल आपूर्ति बाधित नहीं की जा सकती। जुलाई 2024 में भी सर्वोच्च न्यायालय ने मानवीय आधार पर दिल्ली को अतिरिक्त पानी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।
इसलिए यदि दिल्ली का पानी रोका जा रहा है तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं बल्कि न्यायिक आदेशों और अंतरराज्यीय समझौतों के पालन का प्रश्न भी है। लेकिन यहीं से दूसरा और अधिक असुविधाजनक प्रश्न खड़ा होता है। जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी तब भाजपा लगातार आरोप लगाती थी कि दिल्ली के साथ अन्याय हो रहा है। तब भाजपा नेताओं को दिल्ली के हिस्से की हर बूंद याद रहती थी। तब अदालतों के आदेशों की चर्चा होती थी। तब हरियाणा की जवाबदेही पर सवाल उठते थे। आज केन्द्र में भाजपा है।दिल्ली में भाजपा है। हरियाणा में भाजपा है। ऐसी स्थिति में यदि दिल्ली पानी के लिए तरस रही है तो जवाबदेही किसकी है? यह वही राजनीतिक दल है जो वर्षों से “डबल इंजन सरकार” का सिद्धांत जनता के सामने रखता रहा है। चुनावी मंचों से कहा जाता रहा है कि जहां केन्द्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होगी वहां विकास तेजी से होगा, समन्वय बेहतर होगा और समस्याओं का समाधान आसान होगा। यह दावा गलत नहीं लगता। लेकिन फिर दिल्ली का जल संकट एक असुविधाजनक सवाल खड़ा करता है।
यदि केन्द्र, दिल्ली और हरियाणा में एक ही दल की सरकार होने के बावजूद राजधानी को अपने हिस्से का पानी नहीं मिल रहा तो डबल इंजन की अवधारणा का व्यावहारिक लाभ आखिर कहां दिखाई दे रहा है?
लोकतंत्र में राजनीतिक नारों का मूल्य तभी है जब वे जमीन पर परिणाम में बदलें।
यदि परिणाम नहीं दिखते तो नारे प्रश्नों के घेरे में आ जाते हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न प्रशासनिक तैयारी का है। क्या सरकारों को यह नहीं मालूम था कि मई और जून में तापमान बढ़ेगा? क्या यह पहली गर्मी है? क्या यह पहली बार है जब दिल्ली में पानी की मांग बढ़ी है? क्या पहली बार जलाशयों का स्तर गिरा है?


उत्तर स्पष्ट है,नहीं।
फिर हर वर्ष संकट आने के बाद ही सक्रियता क्यों दिखाई देती है? हमारे यहां शासन व्यवस्था की एक पुरानी बीमारी है। अधिकांश सरकारें समस्या की रोकथाम पर नहीं, समस्या के बाद प्रतिक्रिया देने पर विश्वास करती हैं। चेतावनी मिलने के बाद तैयारी नहीं होती। संकट पैदा होने के बाद बैठकें होती हैं। स्थिति बिगड़ने के बाद समीक्षा होती है। जनता परेशान होने लगती है तब प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। यह प्रवृत्ति केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। वायु प्रदूषण हो, बाढ़ हो, जल संकट हो या फिर गर्मी की लहरl हम अक्सर आग लगने के बाद कुआं खोदते हैं। प्रश्न यह है कि यदि वज़ीराबाद जलाशय का स्तर लगातार गिर रहा था तो वैकल्पिक योजनाएं पहले क्यों नहीं बनाई गईं? यदि हरियाणा के साथ विवाद की आशंका थी तो कानूनी और प्रशासनिक हस्तक्षेप समय रहते क्यों नहीं हुआ? यदि संकट अनुमानित था तो जनता को भरोसेमंद रोडमैप क्यों नहीं दिया गया? दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के सामने अब राजनीतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक परीक्षा है।
यदि दिल्ली के हिस्से का पानी रोका जा रहा है तो उन्हें सर्वोच्च न्यायालय जाना चाहिए। उन्हें यह दिखाना चाहिए कि दिल्ली की जनता का हित दलगत संबंधों से ऊपर है। यदि अदालत के आदेशों का पालन नहीं हो रहा तो अदालत का दरवाजा खटखटाना सरकार का दायित्व है। और यदि पानी नहीं रोका जा रहा तो फिर दिल्ली सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि संकट का वास्तविक कारण क्या है।
लोकतंत्र में अस्पष्टता सबसे बड़ा संकट पैदा करती है।
दिल्ली के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि राजधानी पानी के लिए क्यों तरस रही है। प्रधानमंत्री पानी पीने की सलाह दे रहे हैं।
सरकारें विकास के दावे कर रही हैं। डबल इंजन के फायदे गिनाए जा रहे हैं। लेकिन आम नागरिक का सवाल बहुत सीधा है। यदि सरकारें इतनी मजबूत, समन्वित और सक्षम हैं तो फिर देश की राजधानी में पानी का संकट बार-बार क्यों पैदा होता है?
यह सवाल किसी दल के खिलाफ नहीं है। यह सवाल शासन के पक्ष में है। क्योंकि नागरिकों को राजनीतिक नारे नहीं, बुनियादी सुविधाएं चाहिए।
उन्हें भाषण नहीं, पानी चाहिए। और पानी किसी सरकार की कृपा नहीं, नागरिक का अधिकार है l

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top