मुद्दे की बात :-सिर्फ पुल नहीं गिर रहे, लोकतंत्र भी मलबे में दब रहा है:- लेखक वरिष्ठ सम्पादक :- आलोक गौड़


नई दिल्ली l उत्तर प्रदेश में निर्माणाधीन पुल गिर गया। छह मजदूर मर गए। कई घायल हैं। कुछ परिवार ऐसे उजड़ गए जिनके घरों में अब शायद चूल्हा भी न जले। लेकिन सत्ता को फर्क नहीं पड़ा। टीवी स्टूडियो में चीखने वाले राष्ट्रभक्त एंकरों की आवाज नहीं फटी। किसी मंत्री की आंख नम नहीं हुई। किसी ने यह नहीं पूछा कि आखिर “विश्वगुरु” बनने का दावा करने वाले देश में पुल उद्घाटन से पहले ही क्यों टूट रहे हैं? एक्सप्रेसवे पहली बारिश में क्यों बह रहे हैं? और विकास के नाम पर जनता की जान से खिलवाड़ कब तक चलता रहेगा?
असल में यह हादसा नहीं, व्यवस्था का एक्सरे है। उस मॉडल का एक्सरे जिसे पिछले कुछ वर्षों से “डबल इंजन विकास” कहकर बेचा जा रहा है। बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक पुलों का गिरना सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं है। यह उस भ्रष्टाचार की खुली किताब है जिसके हर पन्ने पर कमीशन, दलाली, सांठगांठ और राजनीतिक संरक्षण लिखा हुआ है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि जनता का एक बड़ा हिस्सा अब इन सवालों में रुचि ही नहीं रखता। उसे यह जानने से कोई मतलब नहीं कि पुल क्यों गिरा। मजदूर क्यों मरे। किस ठेकेदार को फायदा हुआ। किस अफसर ने आंखें बंद कीं। किस मंत्री ने संरक्षण दिया। उसे बस इस बात से खुशी मिलती है कि ईद पर मुसलमानों को परेशानी हुई। उन्हें खुले में नमाज नहीं पढ़ने दी गई। कुर्बानी को विवाद बना दिया गया। यानी रोटी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार, मजदूरों की मौत — सब पीछे। सबसे बड़ा मुद्दा बस यही कि नफरत का कारोबार चलता रहे। यही इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है।


सत्ता समझ चुकी है कि अगर जनता को धर्म और नफरत के नशे में उलझाए रखो तो वह कभी पुल गिरने पर सवाल नहीं पूछेगी। वह कभी यह नहीं पूछेगी कि हजारों करोड़ की परियोजनाओं में घटिया सामग्री क्यों लग रही है। वह कभी यह नहीं पूछेगी कि हर हादसे के बाद जांच समिति बनती है लेकिन दोषी जेल क्यों नहीं जाते। वह कभी यह नहीं पूछेगी कि विकास का पैसा आखिर जा कहां रहा है। आज स्थिति यह है कि देश में सवाल पूछना लगभग अपराध बना दिया गया है। आप सरकार से पूछिए कि बेरोजगारी क्यों बढ़ रही हैl आपको राष्ट्रविरोधी कहा जाएगा। पूछिए कि महंगाई क्यों बेलगाम है l आपको एजेंडा वाला घोषित कर दिया जाएगा। पूछिए कि पुल क्यों गिर रहे हैं l कहा जाएगा कि आप देश की छवि खराब कर रहे हैं। यानी सरकार गलती करे और जनता सवाल भी न पूछे! इससे बड़ा लोकतांत्रिक मजाक क्या हो सकता है?
विडंबना देखिए। जिन मजदूरों की मौत हुई, वे वही लोग हैं जिनके नाम पर चुनावी भाषण दिए जाते हैं। वही गरीब, मेहनतकश, पसीना बहाने वाले लोग जिनकी तस्वीरें पोस्टरों में लगाई जाती हैं। लेकिन जब वे मरते हैं तो उनकी मौत महज आंकड़ा बन जाती है। क्योंकि इस व्यवस्था में गरीब आदमी जिंदा भी सस्ता है और मरने के बाद उससे भी सस्ता। यह नया भारत है। यहां पुल गिरने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि टीवी पर कौन “जय श्रीराम” ज्यादा जोर से बोल रहा है। यहां बेरोजगार युवा की डिग्री से ज्यादा महत्व उसकी धार्मिक पहचान का है। यहां अस्पताल में ऑक्सीजन कम पड़ जाए तो भी सत्ता बच जाती है, लेकिन अगर कोई पत्रकार सवाल पूछ ले तो पूरा आईटी सेल उसके पीछे पड़ जाता है। दरअसल यह सिर्फ राजनीतिक संकट नहीं है। यह सामाजिक पतन भी है। लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने से नहीं चलता। लोकतंत्र सवाल पूछने से चलता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जनता के एक हिस्से को इस तरह प्रशिक्षित कर दिया गया है कि वह हर असफलता का बचाव करने लगे। पुल गिर जाए, बचाव। सड़क धंस जाए, बचाव। पेपर लीक हो जाए, बचाव। महंगाई बढ़ जाए, बचाव। यानी नागरिक धीरे-धीरे समर्थक में बदल दिया गया है। और जब नागरिक समर्थक बन जाता है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। याद रखिए, इतिहास में तानाशाहियां अचानक पैदा नहीं हुईं। उन्हें जनता की चुप्पी ने पैदा किया। पहले लोगों को डराया गया। फिर सवाल पूछने वालों को बदनाम किया गया। फिर मीडिया को नियंत्रित किया गया। फिर जनता को धर्म और राष्ट्रवाद की भावनात्मक खुराक दी गई। और अंत में पूरा समाज इतना संवेदनहीन हो गया कि उसे अन्याय सामान्य लगने लगा।
आज भारत उसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है।
आप सोचिए, अगर किसी राज्य में बार-बार पुल गिर रहे हैं तो इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह नहीं कि सिर्फ इंजीनियर निकम्मे हैं। इसका मतलब है कि पूरी व्यवस्था में सड़ांध है। ठेके देने से लेकर गुणवत्ता जांच तक हर स्तर पर भ्रष्टाचार है। लेकिन कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्योंकि सत्ता और ठेकेदारी का गठजोड़ अब लोकतंत्र से भी ज्यादा ताकतवर हो चुका है।
और मीडिया? उसका एक बड़ा हिस्सा अब पत्रकारिता नहीं, पीआर एजेंसी बन चुका है। मजदूरों की मौत पर बहस नहीं होगी, लेकिन कौन सा अभिनेता किस मंदिर गया — उस पर घंटों डिबेट चलेगी। पुल गिरने पर सवाल नहीं होंगे, लेकिन कौन सा विपक्षी नेता क्या खा रहा था — यह राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाएगा। यह सब संयोग नहीं है। यह सुनियोजित राजनीति है। जनता को असली मुद्दों से भटकाए रखो ताकि सत्ता से जवाब न मांगा जाए।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल जनता से है। आखिर कब तक? कब तक धर्म के नाम पर अपने ही अधिकारों की बलि देते रहोगे? कब तक भ्रष्टाचार को राष्ट्रवाद समझते रहोगे? कब तक मजदूरों की लाशों पर विकास के नारे लगते देखोगे? कब तक अपने बच्चों के भविष्य को नफरत की राजनीति के हवाले करते रहोगे?
याद रखिए, जिस दिन जनता सवाल पूछना बंद कर देती है, उसी दिन सत्ता निरंकुश हो जाती है। फिर पुल ही नहीं गिरते, संस्थाएं भी गिरने लगती हैं। अदालतें कमजोर होने लगती हैं। मीडिया बिकने लगता है। विश्वविद्यालय डरने लगते हैं। और अंत में पूरा लोकतंत्र मलबे में बदल जाता है।
आज फैसला जनता को करना है। उसे तय करना है कि वह नागरिक बनकर जिएगी या अंधभक्त बनकर। क्योंकि आने वाली पीढ़ी यह जरूर पूछेगी कि जब देश में डर का माहौल बनाया जा रहा था, जब सवाल पूछना गुनाह बनता जा रहा था, जब विकास के नाम पर भ्रष्टाचार हो रहा था, तब तुम क्या कर रहे थे? क्या तुम चुप थे?
क्या तुम डर गए थे?
या फिर तुमने सच बोलने का साहस किया था? क्योंकि इतिहास सिर्फ नेताओं को याद नहीं रखता, वह जनता की कायरता और बहादुरी दोनों का हिसाब रखता है।
और यह हिसाब बहुत निर्मम होता है।

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