

आलोक गौड़, वरिष्ठ लेखक, सम्पादक।
नई दिल्ली l राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा के बाद अब केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने भी लाखों घरों में मातम पहुंचाया दिया है l
देश में अब शिक्षा नहीं, बच्चों के भविष्य के साथ खतरनाक प्रयोग हो रहे हैं। और दुखद यह है कि यह प्रयोग कोई निजी संस्था नहीं बल्कि खुद केन्द्र की सरकार कर रही है। पहले राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हुआ,लाखों विद्यार्थियों के साथ ही उनके परिवारों का भरोसा भी टूटा, कई बच्चों ने आत्महत्या कर ली, हजारों परिवार बर्बाद हो गए। सरकार ने तब भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई। अब केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की “ऑन-स्क्रीन मार्किंग” नाम की नई डिजिटल व्यवस्था ने लाखों स्कूली विद्यार्थियों और अभिभावकों को सड़क पर ला खड़ा किया है।
आज देशभर में लाखों घरों में एक ही सवाल गूंज रहा है कि जो बच्चे पूरे साल टॉप कर रहे थे, जिन्होंने संयुक्त प्रवेश परीक्षा जैसी कठिन परीक्षा निकाल ली, वही बच्चे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षा में अचानक असफल कैसे हो गए? भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित और जीव विज्ञान जैसे विषयों में अप्रत्याशित रूप से इतने कम अंक कैसे आ गए कि बच्चों का आत्मविश्वास टूट गया, मां-बाप सदमे में आ गए और कई घरों में मातम जैसा माहौल बन गया?
क्या पूरा देश यह मान ले कि अचानक लाखों बच्चे पढ़ाई भूल गए? या फिर सच्चाई यह है कि सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने बिना तैयारी के ऐसी डिजिटल व्यवस्था थोप दी जिसने बच्चों की मेहनत को निगल लिया? असलियत बेहद भयावह है। सत्र खत्म होने के अंतिम समय में “ऑन-स्क्रीन मार्किंग” लागू कर दी गई। शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया। कई वरिष्ठ शिक्षक कंप्यूटर आधारित मूल्यांकन प्रणाली को ठीक से समझ ही नहीं पाए। ऊपर से रोजाना 20-25 उत्तर पुस्तिकाएं जांचने का दबाव, लगातार आठ घंटे स्क्रीन पर बैठने की मजबूरी, रविवार तक छुट्टी नहीं। यानी शिक्षक मूल्यांकन नहीं कर रहे थे, बल्कि एक असफल डिजिटल व्यवस्था के बोझ तले पिस रहे थे। स्थिति इतनी बदतर थी कि कई उत्तर पुस्तिकाएं उलटी स्कैन हुईं, कई जगह पन्ने गायब मिले, कई उत्तर धुंधले दिखाई दिए और कई विद्यार्थियों की अधूरी उत्तर पुस्तिकाएं ही अपलोड कर दी गईं। सोचिए, जिस बच्चे ने रातें जागकर परीक्षा दी, उसका भविष्य किसी धुंधली स्कैन कॉपी और सर्वर की खराबी के भरोसे छोड़ दिया गया।
और फिर सरकार कहती है—कि डिजिटल इंडिया”।
सबसे शर्मनाक तथ्य यह है कि 13 मई 2026 को परिणाम घोषित होने से एक दिन पहले तक उत्तर पुस्तिकाओं की जांच चल रही थी। यानी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को निष्पक्ष मूल्यांकन से ज्यादा जल्दी परिणाम घोषित करने की थी। देश की सबसे बड़ी बोर्ड परीक्षा को ऐसा निपटाया गया मानो कोई सरकारी औपचारिकता पूरी की जा रही हो। लेकिन असली क्रूरता इसके बाद शुरू हुई। जिन बच्चों को लग रहा है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, उनसे कहा गया—पैसे जमा करो। प्रति उत्तर पुस्तिका 700 रुपये और प्रति प्रश्न 100 रुपये। यानी गलती बोर्ड करे, मानसिक यातना विद्यार्थी झेले और कीमत भी वही चुकाए। और अगर गलती साबित हो जाए तब भी फीस वापस नहीं होगी। यह शिक्षा व्यवस्था है या सरकारी वसूली तंत्र?
देश पहले ही राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक से जल रहा है। कोटा से लेकर दिल्ली तक बच्चों की आत्महत्याओं की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। अभिभावक डर में जी रहे हैं कि कहीं उनका बच्चा भी अवसाद का शिकार न हो जाए। लेकिन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और उनकी व्यवस्था को इन बच्चों की टूटती मानसिक स्थिति दिखाई नहीं देती। उन्हें सिर्फ प्रेस वार्ताएं, विज्ञापन और डिजिटल क्रांति के नारे दिखाई देते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश को बताना चाहिए कि आखिर बच्चों के भविष्य के साथ यह निर्ममता कब तक चलेगी? क्या भारत के विद्यार्थी अब सरकारी प्रयोगशाला के चूहे बन चुके हैं? पहले प्रश्नपत्र लीक, फिर गलत मूल्यांकन, फिर पुनर्मूल्यांकन के नाम पर वसूलीl क्या यही “अमृतकाल” है?
सबसे खतरनाक बात यह है कि इस व्यवस्था ने मेहनत पर से भरोसा खत्म करना शुरू कर दिया है। जब बच्चा देखता है कि टॉप करने के बाद भी उसे असफल घोषित किया जा सकता है, जब अभिभावक देखते हैं कि वर्षों की मेहनत किसी सर्वर त्रुटि, अधूरी स्कैनिंग और जल्दबाजी में किए गए मूल्यांकन की भेंट चढ़ सकती है, तब व्यवस्था के प्रति गुस्सा पैदा होता है। और जब विद्यार्थियों का गुस्सा सड़कों पर उतरता है तो उसकी जिम्मेदार केवल विपक्ष नहीं, सत्ता भी होती है।
आज देश का विद्यार्थी सिर्फ अंक नहीं मांग रहा, न्याय मांग रहा है। अभिभावक सिर्फ पुनर्मूल्यांकन नहीं मांग रहे, जवाबदेही मांग रहे हैं। और यदि केन्द्र सरकार अब भी नहीं चेती तो याद रखिए कि जिस देश में बच्चों का भविष्य व्यवस्था की लापरवाही से बर्बाद होने लगे, वहां केवल शिक्षा व्यवस्था नहीं टूटती, पूरे लोकतंत्र का नैतिक आधार दरकने लगता है।
