अलोक गौड़, वरिष्ठ लेखक, संपादक।



नई दिल्ली l लोकतंत्र सिर्फ सरकारों से नहीं चलता, जनता की चेतना से भी चलता है। जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं और सत्ता को जवाबदेही से मुक्त कर देते हैं, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलने लगता है। आज देश जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, उसके लिए केवल सत्ता को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। कहीं न कहीं हम भी इस दौर के सहभागी रहे हैं।
हमने भावनाओं को तथ्यों से ऊपर रखा। नारों को नीतियों से बड़ा मान लिया। चुनावी भाषणों को उपलब्धियों का पर्याय समझ बैठे। परिणाम यह हुआ कि बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसे बुनियादी प्रश्न लगातार पीछे धकेले जाते रहे और समाज को ऐसे मुद्दों में उलझाया गया जिनसे आम आदमी के जीवन में कोई वास्तविक सुधार नहीं आता।
आज स्थिति यह है कि लाखों पढ़े-लिखे युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। मध्यमवर्ग बढ़ते टैक्स और महंगाई के दबाव में है। किसान लागत, कर्ज और बाजार की अनिश्चितता के बीच संघर्ष कर रहा है। छोटे व्यापारियों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है। इसके बावजूद सार्वजनिक विमर्श का बड़ा हिस्सा वास्तविक समस्याओं पर नहीं, भावनात्मक ध्रुवीकरण पर केंद्रित दिखाई देता है।
यह चिंता का विषय है कि लोकतंत्र में असहमति को धीरे-धीरे संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। सरकार से सवाल पूछना विरोध नहीं, लोकतांत्रिक दायित्व होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा वातावरण बना है जहाँ आलोचना को राष्ट्रविरोध से जोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी जनता के भरोसे पर टिकी होती है। संसद में बहस का स्तर, मीडिया की स्वतंत्रता, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रियाओं में जनता का विश्वास l यह सभी लोकतंत्र के मूल स्तंभ हैं। यदि इन पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं तो यह केवल राजनीतिक विमर्श का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए।
वास्तविकता यह है कि किसी भी लोकतंत्र में सत्ता उतनी ही जवाबदेह रहती है जितनी जनता सजग रहती है। जब नागरिक कठिन प्रश्न पूछना बंद कर देते हैं, तब शासन व्यवस्था प्रचार और छवि प्रबंधन तक सीमित होने लगती है। ऐसे में विकास का आकलन आँकड़ों से कम और नारों से अधिक किया जाने लगता है।
आज आवश्यकता किसी एक दल या व्यक्ति के विरोध की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनः केंद्र में लाने की है। देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत है जो समर्थन करें तो विवेक के साथ और विरोध करें तो तथ्यों के आधार पर। लोकतंत्र में अंधसमर्थन उतना ही खतरनाक होता है जितना अंधविरोध।
यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि कई बार हमने भी भावनाओं में बहकर आवश्यक सवालों को नजरअंदाज किया। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह आत्मसुधार का अवसर देता है।
देश व्यक्ति-पूजा से नहीं, संस्थाओं की मजबूती और जागरूक नागरिकों से आगे बढ़ता है। और शायद अब समय आ गया है कि हम ताली बजाने से पहले सवाल पूछना फिर से सीखें।

