
नई दिल्ली 7 मई 2026:विश्व थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर यह कहानी एक ऐसी जंग की है, जिसमें बीमारी को हराकर एक बच्ची ने फिर से सामान्य और स्वस्थ जीवन पाया है। पश्चिम बंगाल के हुगली की रहने वाली चित्रलेखा हलदर आज स्कूल जाती है, खेलती है और अपने बचपन को पूरी तरह जी रही है। लेकिन एक समय था जब उसकी ज़िंदगी बार-बार अस्पतालों के चक्कर और उपचार की अनिश्चितताओं तक सीमित थी। 14 वर्षीय चित्रलेखा बचपन में थैलेसीमिया मेजर का पता चला था।एक गंभीर आनुवंशिक रक्त विकार, जिसमें मरीज को जीवनभर नियमित रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है। परिवार के लिए यह स्थिति कठिन और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण थी।चित्रलेखा के पिता चन्दन हलदर बताते हैं,एक समय ऐसा था जब हमें लगता था कि हमारी बेटी का बचपन हमेशा अस्पतालों तक ही सीमित रह जाएगा। हम पूरी तरह टूट चुके थे।जीवनदायी ट्रांसप्लांट ने बदली किस्मत साल 2016 में चित्रलेखा की ज़िंदगी में निर्णायक मोड़ आया, जब उनका हैप्लोआइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। इस प्रक्रिया में उनके पिता स्वयं डोनर बने। यह जटिल और संवेदनशील ट्रांसप्लांट डॉ सरिता रानी जयसवाल के नेतृत्व में धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। चन्दन हलदर बताते हैं कि डॉ. सरिता रानी जायसवाल
ने दिन-रात मेहनत कर मेरी बेटी की जान बचाई। यह प्रक्रिया उन्होंने पूरी निष्ठा और विशेषज्ञता के साथ की।एक इलाज से मिला पूरा जीवन यह ट्रांसप्लांट सिर्फ एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए उम्मीद, सामान्य जीवन और भविष्य में विश्वास की वापसी थी। आज चित्रलेखा आठवीं कक्षा की छात्रा है और पढ़ाई, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में पूरी तरह सक्रिय है। विश्व थैलेसीमिया दिवस हमें यह संदेश देता है कि इस बीमारी के प्रति जागरूकता, समय पर जांच और उन्नत चिकित्सा तकनीकों के माध्यम से बेहतर परिणाम संभव हैं। सही समय पर निदान और विशेषज्ञ देखरेख में किया गया बोन मैरो ट्रांसप्लांट थैलेसीमिया मेजर के उपचार में एक प्रभावी विकल्प बन चुका है। धर्मशिला नारायणा हॉस्पिटल जैसे उन्नत चिकित्सा संस्थानों में उपलब्ध सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम के कारण अब कई बच्चे एक नया, स्वस्थ और सामान्य जीवन जी पा रहे हैं। डॉ. सरिता रानी जायसवाल जैसे चिकित्सकों ने अनेक परिवारों को उम्मीद और नई रोशनी दी है।

