
नई दिल्ली,:। समावेशी विकास और सतत आजीविका की दिशा में एक अहम पहल करते हुए नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (NAB) ने आर.के. पुरम, नई दिल्ली में ‘कैफ़े बियॉन्ड आइज़’ की शुरुआत की। यह अनोखा कैफ़े पूरी तरह दृष्टिबाधित युवाओं द्वारा संचालित किया जाएगा।
इस पहल को आगे बढ़ाते हुए NAB ने तत्सत फाउंडेशन के सहयोग से एक फूड कार्ट योजना की भी घोषणा की है, जिसके तहत अगले पांच वर्षों में 500 दृष्टिबाधित युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
इस कार्यक्रम को मशहूर शेफ अश्वनी कुमार सिंह का मार्गदर्शन प्राप्त है, जो प्रतिभागियों को कुकिंग और हॉस्पिटैलिटी से जुड़े प्रोफेशनल प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रशिक्षण में खास तौर पर सटीकता, मसल मेमोरी और संवेदनशीलता आधारित कुकिंग तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है, ताकि युवा आत्मनिर्भर बन सकें।
लॉन्च कार्यक्रम के दौरान शेफ अश्वनी कुमार सिंह ने लाइव मास्टरक्लास भी दी, जिसमें उन्होंने बिना दृष्टि के खाना बनाने की बारीकियां समझाईं। इस प्रशिक्षण में स्वाद, सुगंध, स्पर्श और ध्वनि को कुकिंग के मुख्य आधार के रूप में अपनाने पर जोर दिया गया। साथ ही ‘तासीर’ की वैदिक अवधारणा से भी प्रशिक्षुओं को अवगत कराया गया, जिससे वे संतुलित और पौष्टिक भोजन तैयार कर सकें।
शेफ अश्वनी कुमार सिंह ने कहा, “खाना बनाना केवल देखने पर निर्भर नहीं, बल्कि जुनून, अनुशासन और संवेदनशील समझ पर आधारित कला है। दृष्टिबाधित युवा अपनी अन्य इंद्रियों के माध्यम से असाधारण दक्षता दिखा सकते हैं।”
NAB के महासचिव प्रशांत वर्मा ने कहा, “यह पहल समावेशन की सच्ची भावना को दर्शाती है, जहां सहानुभूति नहीं बल्कि अवसर के माध्यम से सशक्तिकरण होता है।”
वहीं, तत्सत फाउंडेशन की निदेशक डॉ. सुमी गुप्ता ने कहा कि यह पहल शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता का रास्ता खोलेगी।

शुभम हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी लिमिटेड के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक संजय चतुर्वेदी ने भी इस पहल को समाज के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए समर्थन व्यक्त किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और कैफ़े में काम कर रहे युवाओं के आत्मविश्वास और क्षमता को करीब से देखा। यह पहल न केवल रोजगार का अवसर दे रही है, बल्कि आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना भी मजबूत कर रही है।
‘कैफ़े बियॉन्ड आइज़’ और प्रस्तावित फूड कार्ट योजना के माध्यम से NAB और तत्सत फाउंडेशन देशभर में दृष्टिबाधित युवाओं के लिए नए अवसरों के द्वार खोलने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह पहल साबित करती है कि असली दृष्टि आंखों में नहीं, बल्कि हौसले और कौशल में होती है।

